भारत की सांस्कृतिक विरासत में छाया-कठपुतली कला एक अनमोल धरोहर है। आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) की चमड़े की कठपुतली (The Leather Shadow-Puppetry Art) परंपरा देश की सबसे क़दीम छाया-नुमाइशों में शुमार होती है। ये सिर्फ़ तमाशा नहीं, बल्कि लोक-कथाओं को एक पुश्त से दूसरी पुश्त तक मुंतक़िल करने, इल्म बांटने और समाज को आईना दिखाने का एक अनोखा ज़रिया है।

आस्था और कला का संगम
बाक़ी हुनरों की तरह इस फ़न में भी मज़हबी अक़ीदे और रिवायतें रची-बसी हैं। ज़्यादातर पेशकशें रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों की दास्तानें बयान करती थीं, जिनमें मक़ामी रस्में और दंत-कथाएं घुली-मिली होती थीं। हुनरमंद गांव-दर-गांव सफ़र करते और दिनों तक चलने वाले मुख़्तलिफ़ तमाशे दिखाते। लेकिन आज टीवी और सिनेमा के दौर में यह फ़न ख़त्म होने के कगार पर है और इनकी पेशकशें नाम-मात्र रह गई हैं।

चमड़े से जान डालने का सफ़र
पारंपरिक तौर पर कठपुतली बनाने में तीस से चालीस दिन लगते थे। चमड़ा हासिल करने से लेकर आख़िरी मरहले तक। मगर पानी की क़िल्लत, केमिकल से रंगाई और छोटे माशूबात की तरफ़ रुख़ करने की वजह से अब दो-तीन दिन में ही दरमियाना साइज़ की शै बन जाती है।
सफ़र शुरू होता है बाज़ार से ताज़ा बकरी की खाल लाने से। खाल को दो-तीन घंटे ठंडे पानी में भिगोया जाता है, फिर काट-छांट कर सपाट किया जाता है। गर्म पानी से धोकर कुछ घंटों धूप में सुखाया जाता है। मेहनत-तलब मरहलों से गुज़रकर ये खाल एक साफ चर्म-पत्र में तब्दील हो जाती है। इसके बाद शक्लों के ख़ाके चॉक से उकेरे जाते हैं।

नक़्क़ाशी और रंग-आमेज़ी
ख़ाके तैयार होने पर चमड़े में छोटी-छोटी खिड़कियां काटी जाती हैं। रोशनी के आगे रखने पर ये खिड़कियां डीटेल्स उभारती हैं और ऐसी चमक पैदा करती हैं जैसे शै पर ज़ेवर सजे हों। फूल-पत्तियों जैसे बारीक डिज़ाइन भी तराशे जाते हैं।
अब बारी आती है बांस की निब से स्याही में ख़त खींचने की। बांस की पतली चिप्पियां तराशकर निब जैसी बनाई जाती हैं, और बारीक डीटेल्स भी इन्हीं क़लमों से उकेरी जाती हैं। इस हिस्से पर सजावट के लिए सूराख़ भी बनाए जाते हैं।
फिर शुरू होती है रंगों की बारात। लाल, हरा, गेरूआ और ज़र्द जैसे शोख़ रंग ब्रश से भरे जाते हैं। यह काम बड़ी मुश्किल और वक़्त-तलब है। दिलचस्प बात यह है कि आदमियों की शक्लें और संत आम तौर पर पीले रंग में ही दिखाए जाते हैं। रंगाई के बाद ख़त एक बार फिर स्याही में ताज़ा किए जाते हैं।

जोड़-तोड़ और हरकत
आख़िर में अलग-अलग हिस्से काटकर सिए जाते हैं ताकि तमाशे के वक़्त उन्हें हिलाया-डुलाया जा सके। सर और बाज़ू अलग-अलग काटकर एक-दूसरे से बांधे जाते हैं। फिर उसे डंडियों पर चढ़ाकर रस्सियों से बांधा जाता है, जिससे हरकत को आज़ादी मिले और कारीगर की उंगलियों में कहानी ज़िंदा हो उठे।
लफ़्ज़ों से आगे
ये फ़न सिर्फ़ चमड़ा और रंग नहीं बल्कि रोशनी और साये का वो जादू है जिसमें सदियों की दास्तानें, अक़ीदे और हुनर के चिराग़ अब भी टिमटिमाते हैं। ज़रूरत है इन हुनरमंदों को संभालने की, वरना एक पूरी विरासत अंधेरे में गुम हो जाएगी।
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