हकीम अहमद शुजा उर्दू अदब के उन चंद शख़्सियतों में से थे, जिन्होंने शायरी, नस्र, ड्रामा और फिल्मी नग़मों यानी हर मैदान में अपना लोहा मनवाया। उनकी पैदाइश 4 नवंबर 1893 को हुई थी (कुछ हवालों में 12 जुलाई 1896 भी दर्ज है)।
शुजा साहब एक ऐसे ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जो सदियों से इल्म और तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) से जुड़ा रहा। कहा जाता है कि उनके बुज़ुर्ग अरब, अफ़ग़ानिस्तान और तुर्की से हिंदुस्तान आए थे। मुग़ल बादशाह अकबर के दौर में यह ख़ानदान लाहौर के भाटी गेट इलाक़े में शाही हकीम (यानी तिब्ब यूनानी इलाज पद्धति के माहिर) के तौर पर मशहूर हुआ। उनके वालिद, हकीम शुजा-उद-दीन, ख़ुद एक सूफ़ी बुज़ुर्ग और उर्दू सहाफ़त (पत्रकारिता) के पहले लोगों में शुमार होते थे।
तालीम और शुरुआती ज़िंदगी
बदक़िस्मती से, शुजा साहब के मां-बाप उनके बचपन में ही चल बसे। उनकी परवरिश एक बड़े भाई ने की। घर पर अरबी और क़ुरआन की तालीम के बाद उन्होंने लाहौर के सेंट्रल मॉडल स्कूल से पढ़ाई शुरू की, फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एफ़.ए और मेरठ कॉलेज से बी.ए किया, आख़िर में मास्टर्स डिग्री भी हासिल की।
कुछ अर्से हैदराबाद (दक्कन) की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में लेक्चरर रहे, मगर दिल न लगा तो वापस लाहौर लौट आए। 1920 में पंजाब असेंबली से जुड़े और तरक़्क़ी करते हुए असेंबली के सेक्रेट्री के ओहदे तक पहुंचे।
अदबी ख़िदमात
शुजा साहब की तहरीरें बेहद वसीअ (व्यापक) दायरे की हैं।
1922-23 में उन्होंने “हज़ार दास्तान” नाम का एक अदबी रिसाला निकाला, और बच्चों के लिए “नूनहाल” नाम का मैगज़ीन भी शुरू किया।
उन्होंने इम्तियाज़ अली ताज और आग़ा हश्र कश्मीरी जैसे उस्तादों के साथ मिलकर कई ड्रामे लिखे।
पंजाबी ज़बान में क़ुरआन के शुरुआती तर्जुमों में से एक उन्हीं का काम था।
उन्होंने “अफ़्सह-उल-बयान” नाम से क़ुरआन की तफ़सीर लिखनी शुरू की, मगर सिर्फ़ पहले पांच पारों की तफ़सीर ही मुकम्मल कर पाए।
फ़िल्मी दुनिया से रिश्ता
1950-60 के दशक में शुजा साहब का रुझान फ़िल्मों की तरफ़ बढ़ा। शायद इसलिए भी क्योंकि उनके बेटे अनवर कमाल पाशा उस दौर के मशहूर फ़िल्म डायरेक्टर थे। “तू लाख चले री गोरी” और “हम भी पढ़े हैं राहों में” जैसे मशहूर नग़मे असल में उनकी नज़्में थीं, जिन्हें बाद में फ़िल्मों के लिए ढाला गया। दिलचस्प बात यह है कि कुछ नग़मे ग़लती से क़तील शिफ़ाई जैसे शायरों के नाम कर दिए गए, जबकि असल तख़्लीक़ शुजा साहब की ही थी।
हैरत-ए-नज़्ज़ारा आख़िर बन गईं रवानीयां,
ख़ाक के ज़र्रों में आती हैं नज़र गुलज़ारियां।
जब से देखा है तुझे, इक दर्द है दिल में निहां,
ऐ सबा! ले जा तू ही उन तक मेरी बेकरारियां।
अलविदा ऐ क़ाफ़िले वालों, मुझे अब छोड़ दो,
मेरी क़िस्मत में लिखी हैं दश्त की वीरानियां।
उनकी शुरुआती काविशों में कुंदन लाल सहगल की गाई “हैरत-ए-नज़्ज़ारा आख़िर” का ज़िक्र भी आता है, और उन्होंने बहराम ख़ान, शीश महल जैसी बॉलीवुड फ़िल्मों के साथ-साथ पाकिस्तान की शुरुआती फ़िल्म “शाहिदा” (1949) की कहानी भी लिखी।
ज़बान की ख़िदमत
1948 से 1969 तक वह “मजलिस-ए-ज़बान-ए-दफ़्तरी” (ऑफ़िशियल लैंग्वेज कमेटी) के सेक्रेट्री रहे। उनकी निगरानी में हज़ारों अंग्रेज़ी इस्तिलाहात (शब्दावली) का उर्दू तर्जुमा किया गया। यह काम आज भी पाकिस्तान के सरकारी दफ़्तरों में इस्तेमाल होता है।
आख़िरी सफ़र
हकीम अहमद शुजा 4 जनवरी 1969 को लाहौर में इस दुनिया से रुख़्सत हुए और मियानी साहब क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुए। उनका शुमार आग़ा हश्र कश्मीरी, इम्तियाज़ अली ताज, अबुल कलाम आज़ाद, अल्लामा इक़बाल जैसी शख़्सियतों के हमअस्र (समकालीन) साथियों में होता था। जो ख़ुद इस बात की गवाही है कि वह अपने दौर के कितने अहम अदीब थे।
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