डॉक्टर अब्दुर्रहमान बिजनोरी हमारी इल्मी और अदबी तारीख़ का एक अहम नाम है। वे एक साथ महक़्क़िक़ (शोधकर्ता), नाज़ुक-फ़हम नाक़िद (आलोचक), बड़े मुफ़क्किर, क़ानूनदां, तालीम के माहिर, बड़े मुतर्जिम (अनुवादक), उम्दा नस्रनिगार और नए अंदाज़ के शायर थे। उनकी उम्र बहुत छोटी थी, फिर भी इस कम वक़्त में उन्होंने इल्म-ओ-अदब के कई मैदानों में अपनी सूझ-बूझ के गहरे निशान छोड़े।
पैदाइश और ख़ानदान
अब्दुर्रहमान बिजनोरी सिवाहारा, ज़िला बिजनोर के एक मोहतरम ख़ानदान में पैदा हुए। इस ख़ानदान के बुज़ुर्ग अरब से हिजरत करके ईरान के सूबे आज़रबाइजान में आ बसे थे, फिर बाद में इसी ख़ानदान का एक बुज़ुर्ग हिंदुस्तान आया और यहीं क़ाज़ी के ओहदे पर मशहूर हुआ। उसी की नस्ल सिवाहारा में आज तक बसी है।
पैदाइश की तारीख़ को लेकर मोहक़्क़िक़ों में मतभेद है किसी ने 1885, किसी ने 10 जून 1885, तो डॉक्टर सैयद हामिद हुसैन ने भोपाल रियासत के पुराने सरकारी रिकॉर्ड के हवाले से 10 जून 1887 लिखा है।
बचपन और तालीम
बिजनोरी की शुरुआती तालीम घर पर उनकी वालिदा आमना ख़ातून की निगरानी में हुई, जो ख़ुद एक आलिम की बेटी थीं और दीनी इल्म में माहिर थीं। बाद में जब उनके वालिद क़ाज़ी नूरुल-इस्लाम (जो अंग्रेज़ सरकार में मुलाज़िम थे और “ख़ान बहादुर” के ख़िताब से नवाज़े गए) क्वेटा गए, तो बिजनोरी भी तालीम के लिए उनके साथ क्वेटा चले गए।
1902 में बिजनोरी ने क्वेटा हाई स्कूल से10वीं क्लास का इम्तिहान पास किया। इसके बाद वे आगे की तालीम के लिए अलीगढ़ गए और मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज में दाख़िला लिया। यहीं से 1904 में उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से इंटर का इम्तिहान पास किया, और 1906 में बी.ए. की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने उसी कॉलेज से क़ानून की तालीम जारी रखी और 1909 में एल.एल.बी. का इम्तिहान भी पास कर लिया।
बचपन से ही बिजनोरी बहुत ज़हीन, संजीदा और सोच-विचार करने वाले इंसान थे। वे अपने मुल्क से मोहब्बत रखने वाले, विदेशी हुकूमत से नाराज़ और अपनी मादरी ज़बान उर्दू के दीवाने थे। अलीगढ़ में रहते हुए उनकी ज़हनी सलाहियतें ख़ूब निखरीं और वे कॉलेज में बेहद मक़बूल हो गए।
अलीगढ़ में सरगर्मियां
1907 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जो 5 महीने की हड़ताल हुई, उसमें बिजनोरी अगुआ थे।
जनवरी 1908 में वे यूनियन क्लब के नायब सदर (उप-अध्यक्ष) बिला-मुक़ाबला चुने गए और इस ओहदे की शान बढ़ाई।
उन्हें “कैम्ब्रिज स्पीकिंग प्राइज़” जैसे कई इनाम मिले, जो हर साल उस तालिबे-इल्म को मिलता था जो अंग्रेज़ी में सबसे बेहतरीन तक़रीर करता।
उन्होंने तसद्दुक़ अहमद शेरवानी, सैयद महमूद और अब्दुर्रहमान सिद्दीक़ी के साथ मिलकर “इख़वान-उस-सफ़ा” नाम की एक ख़ुफ़िया जमात बनाई थी, जिसका मक़सद तलबा को अंग्रेज़ों के रोब से आज़ाद करना और उनमें वतन-परस्ती जगाना था। एक मर्तबा उन्होंने सर सैयद की मज़ार पर क़सम खाई थी कि जब तक अंग्रेज़ों को मुल्क से न निकाल दें, चैन से नहीं बैठेंगे।
भोपाल रियासत में ख़िदमत
1914 में हिंदुस्तान लौटने पर बिजनोरी ने वकालत के बजाय कोई ऐसा काम चाहा जिससे मुल्क को फ़ायदा हो, लेकिन मौक़ा न मिलने पर मुरादाबाद में वकालत शुरू की।
1 अक्टूबर 1916 को नवाबज़ादा हमीदुल्लाह ख़ां (भोपाल के चीफ़ सेक्रेटरी) की पेशकश पर बिजनोरी भोपाल में मुशीर-ए-तालीम (शिक्षा सलाहकार) बनकर आए। रियासत के इलाक़ों का दौरा कर तालीमी हालात का जायज़ा लिया।
1 जनवरी 1918 को “क़ानून तालीम जबरिया शहर भोपाल” तैयार कराया, जो नवाब सुल्ताना जहां ने मंज़ूर किया।
ग़रीब तबक़े के लिए एक सस्ता कॉलेज (“सुल्तानिया कॉलेज”) देहरादून में बनाने की तजवीज़ पेश की, जिसे कई बड़ी हस्तियों का समर्थन मिला। मगर अंग्रेज़ हुक्काम की मंज़ूरी न मिलने से यह मंसूबा पूरा न हो सका।
अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू और “दीवान-ए-ग़ालिब”
भोपाल में रहते हुए बिजनोरी ने अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू को मज़बूत बनाने में मौलवी अब्दुल हक़ का बहुत साथ दिया। उन्होंने दीवान-ए-ग़ालिब का एक मुस्तनद नुस्ख़ा तैयार करने का काम शुरू किया और करीब एक साल में इसकी तफ़सीली भूमिका (मुक़द्दमा) लिख डाली।
अगस्त 1918 में भोपाल में ग़ालिब के दीवान का एक पुराना नुस्ख़ा मिला जिसमें बहुत-सा भुला हुआ कलाम शामिल था। मगर इसी दौरान 1918 का “जंगी बुख़ार” (इन्फ़्लूएंज़ा महामारी) पूरे हिंदुस्तान में फैल गया और बिजनोरी व उनकी बीवी दोनों इसकी चपेट में आ गए। पहले उनकी बीवी जमीला बी का इंतक़ाल हुआ, और चार दिन बाद, 7 नवंबर 1918 को बिजनोरी भी चल बसे। उन्हें भोपाल के लाल घाटी क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया। उस वक़्त उनकी उम्र सिर्फ़ 31-33 साल के क़रीब थी।
उनकी वफ़ात के बाद ग़ालिब पर लिखा उनका मुक़द्दमा “महासिन-ए-कलाम-ए-ग़ालिब” के नाम से जनवरी 1921 में अंजुमन के रिसाले “उर्दू” में छपा, और उसी साल किताबी शक्ल में भी शाया हुआ। इसमें बिजनोरी ने पश्चिमी दार्शनिकों के हवाले से ग़ालिब की शायरी को बेमिसाल साबित किया और ग़ालिब को “रब्ब-उन-नौ” (एक तरह का देवत्व) और दीवान-ए-ग़ालिब को “इलहामी किताब” क़रार दिया।
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