उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं, जिनके अशआर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि देर तक दिल और ज़ेहन में गूंजते रहते हैं। राज़ चांदपुरी भी ऐसे ही शायर थे। उनका असली नाम मुहम्मद सादिक़ था। 1892 में जन्मे राज़ चांदपुरी ने ग़ज़ल और नज़्म के ज़रिए उर्दू अदब में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में ज़िंदगी के तजुर्बे, इंसानी फ़ितरत, ख़ुदी और रिश्तों की पेचीदगियों की झलक दिखाई देती है।
राज़ चांदपुरी, मशहूर शायर सीमाब अकबराबादी के शुरुआती शागिर्दों में शामिल थे। उन्होंने सीमाब अकबराबादी से बाक़ायदा इस्लाह ली और शायरी की बारीकियों को समझा। यही वजह है कि उनकी शायरी में फ़न के साथ-साथ फ़िक्र की गहराई भी नज़र आती है। वे सिर्फ़ लफ़्ज़ों को सजाने वाले शायर नहीं थे, बल्कि अपनी बात को असरदार अंदाज़ में कहने की कोशिश करते थे।
राज़ चांदपुरी की पहली मालूम किताब ‘नवा-ए-राज़’ 1961 में इलाहाबाद के अदारा-ए-अनीस से प्रकाशित (शाया) हुई। लेकिन उनकी शायरी और शख़्सियत को समझने के लिए उनकी ज़िंदगी और उनके उस्ताद सीमाब अकबराबादी के साथ उनके रिश्ते को जानना भी ज़रूरी है। उनकी ज़िंदगी और अदबी सफ़र पर बाद में सरवर आलम रज़ ने ‘राज़ चांदपुरी’ नाम से एक किताब लिखी, जिसे किताब घर ने प्रकाशित किया। इसे राज़ चांदपुरी की ज़िंदगी और फ़न पर केंद्रित किताबों में गिना जाता है।
राज़ की शायरी की ख़ास बात यह है कि वह आम ज़िंदगी के सवालों को बेहद सादगी से सामने रखते हैं।
“पछताने से क्या हासिल, पछताने से क्या होगा,
कुछ तूने किया होगा, कुछ तुझसे हुआ होगा।”
इन पंक्तियों में इंसान को अपने किए और अपनी ज़िम्मेदारी की तरफ़ देखने का संदेश मिलता है। शायर सिर्फ़ पछतावे में डूबे रहने के बजाय अपने अमल को समझने की बात करते हैं।
इसी तरह वह ज़िंदगी के मक़सद पर सवाल उठाते हुए कहते हैं।
“जीने का मज़ा जब है जीने का हो कुछ हासिल,
यूं लाख जिए कोई तो जीने से क्या होगा।”
यह शेर बताता है कि सिर्फ़ सांस लेते रहना ज़िंदगी नहीं है। असल मायने तब पैदा होते हैं, जब इंसान की ज़िंदगी में कोई मक़सद, कोई हासिल और कोई सार्थकता हो।
“दिलरुबा भी वो दिलनवाज़ भी है,
और फिर सबसे बेनियाज़ भी है।”
यहां मोहब्बत की कशिश के साथ उस शख़्स की बेनियाज़ी भी दिखाई देती है, जो दिल के क़रीब होकर भी अपने अंदाज़ में आज़ाद है।
राज़ चांदपुरी की शायरी का एक और पहलू इंसान और उसकी ‘ख़ुदी’ से जुड़ा है। वह सवाल करते हैं कि इंसान अपनी ख़ुदी और अपने दावे को किस हद तक समझता है। उनके अशआर में ऐसे सवाल बार-बार उभरते हैं, जो पाठक को ख़ुद अपने भीतर झांकने पर मजबूर करते हैं।
यही राज़ चांदपुरी की शायरी की ख़ूबसूरती है सादा लफ़्ज़, गहरी बात और ज़िंदगी को देखने का एक अलग नज़रिया। उनकी शायरी आज भी उन पाठकों के लिए मायने रखती है, जो उर्दू अदब में सिर्फ़ मोहब्बत नहीं, बल्कि इंसानी फ़िक्र और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी तलाशते हैं।
ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं


