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500 दीनार, एक भक्त और “सच्चा गुरु लाधो रे” की पुकार

बाबा बकाला का 9 मंज़िला भोरा साहिब गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी की तपस्या से जुड़ी पाक जगह हैं। मैं नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को दिल से नमन करता हूं। उनकी ज़िंदगी और उनकी विरासत अमृतसर ज़िले के बाबा बकाला की इस पाक जगह से गहराई से जुड़ी हुई है। ये जगह ब्यास पुल से कुछ मील की दूरी पर है। मुझे अमृतसर ज़िले के बाबा बकाला शहर में मौजूद पवित्र गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब जाने का मौक़ा मिला। बाबा बकाला का सिख इतिहास में एक ख़ास मुक़ाम है और इसका रिश्ता नौवें सिख गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी से है।

मेरे लिए ये सफ़र सिर्फ़ एक सफ़र नहीं था, बल्कि एक रूहानी एहसास था। यहां पहुंचकर दिल को सुकून मिला और मन में गुरु के लिए अकीदत और भी गहरी हो गई। इस लेख में बाबा बकाला का दिलचस्प इतिहास, सच्चे नौवें गुरु की तलाश की कहानी और गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब की अहमियत के बारे में जानेंगे। साथ ही, इस यादगार सफ़र की तस्वीरों के ज़रिए इस पाक जगह की ख़ूबसूरती और रूहानी एहसास को करीब से समझने की कोशिश करेंगे।

सिख रूहानियत का एक अहम ऐतिहासिक केंद्र

बाबा बकाला एक ऐसा शहर है, जिसका सिख इतिहास में ख़ास मुकाम है। 1640 के दशक में छठे सिख गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी यहां रहें। बाद में नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी भी यहीं रहने लगे। उस दौर में बाबा बकाला एक खुशहाल और रौनक भरा शहर था। यहां ख़ूबसूरत सरोवर, कुएं और ‘बाओलियां’ (सीढ़ियों वाले कुएं) हुआ करते थे। चारों तरफ़ सुकून और ख़ुशहाली का माहौल महसूस होता था।

Pic Credit: Social Media

श्री गुरु तेग बहादुर जी ने बाबा बकाला में अपनी माता और पत्नी के साथ सादगी, सिमरन और इबादत भरी ज़िंदगी गुज़ारी। इसके साथ ही उन्होंने अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां भी निभाई। वो पूरब की तरफ़ पटना (बिहार), असम और दिल्ली जैसे कई इलाक़ों का सफ़र पर भी गए। दिल्ली में उनकी मुलाक़ात आठवें सिख गुरु, श्री गुरु हरकृष्ण जी से दो बार हुई। श्री गुरु हरकृष्ण जी को प्यार से ‘बाल गुरु’ भी कहा जाता है।

भ्रम और कई दावेदार

दिल्ली में रहते हुए आठ साल की उम्र में श्री गुरु हरकृष्ण जी चेचक की बीमारी से बीमार पड़ गए। जब उनसे उनके बाद आने वाले गुरु के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इशारे में सिर्फ़ इतना कहा— “बाबा बकाले”। इसका मतलब था कि अगला गुरु बाबा बकाला में मिलेगा। 30 मार्च 1664 को श्री गुरु हरकृष्ण जी ज्योति जोत समा गए। उनके इस इशारे का मतलब साफ़ न होने की वजह से कई लोग ख़ुद को नौवां सिख गुरु बताने लगे।

करीब 22 लोगों ने ख़ुद को असली गुरु होने का दावा किया। इनमें श्री गुरु तेग बहादुर जी के प्रभावशाली भतीजे धीर मल भी शामिल थे। इतने सारे दावेदार सामने आने से सिख संगत के सामने बड़ी उलझन खड़ी हो गई। लोगों के लिए ये समझना मुश्किल हो गया कि इन सबके बीच असली गुरु कौन हैं।

Pic Credit : ABP Sanjha

बाबा मखन शाह लुबाना का आना

इस उलझन और अफ़रा-तफ़री के बीच बाबा मखन शाह लुबाना का आना एक अहम मोड़ साबित हुआ। वो झेलम ज़िले के रहने वाले एक कारोबारी थे। एक बार सफ़र के दौरान उनका जहाज़ तेज़ तूफ़ान में फंस गया। अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने पूरे दिल से वाहेगुरु और गुरु नानक देव जी से अरदास की। उन्होंने मन्नत मानी कि अगर उनका जहाज़ सही-सलामत सबसे नज़दीकी बंदरगाह तक पहुंच गया, तो वो गुरु के चरणों में 500 दीनार भेंट करेंगे।

उनकी अरदास क़ुबूल हुई और जहाज़ सही-सलामत किनारे पहुंच गया। अपना वादा पूरा करने के लिए बाबा मखन शाह लुबाना दिल्ली पहुंचे। वहां उन्हें गुरु हरकृष्ण जी के ज्योति जोत समाने की ख़बर मिली और पता चला कि अगला गुरु बाबा बकाला में है।

Pic Credit: SikhNet

असली गुरु की पहचान

अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बाबा मखन शाह लुबाना ने हर दावेदार को सिर्फ़ दो-दो दीनार देने का फैसला किया। उन्हें यक़ीन था कि असली गुरु वही होंगे, जिन्हें उनकी 500 दीनार देने की मन्नत के बारे में खुद पता होगा। जिन लोगों ने ख़ुद को गुरु बताया था, उन्होंने दो सोने के सिक्के पाकर ही संतोष कर लिया। उनमें से किसी ने भी बाबा मखन शाह को पहचानकर ये नहीं बताया कि उन्होंने 500 दीनार देने की मन्नत मानी थी।

अब बाबा मखन शाह के सामने बड़ा सवाल था—अगर इनमें से कोई भी असली गुरु नहीं है, तो फिर असली गुरु कहां हैं? तभी एक बच्चे ने उन्हें बताया कि पास ही एक संत, तेग बहादुर जी, ध्यान में बैठे हैं। उन्होंने खुद को गुरु होने का कोई दावा नहीं किया था। बाबा मखन शाह उन्हें मिलने के लिए वहां पहुंच गए।

Pic Credit: Wikipedia

ज़िंदगी बदल देने वाला लम्हा

बाबा मखन शाह लुबाना श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास पहुंचे और उन्हें भी दो सोने की मोहरें भेंट कीं, जैसे उन्होंने बाकी दावेदारों को दी थी। तभी गुरु तेग बहादुर जी ने उन्हें रोकते हुए प्यार से कहा कि उन्होंने अपनी मन्नत पूरी नहीं की है। गुरु जी ने उन्हें याद दिलाया कि तूफ़ान के दौरान अपनी जान बचाने की दुआ करते हुए उन्होंने 500 सोने की मोहरें भेंट करने की मन्नत मानी थी। ये सुनकर बाबा मखन शाह लुबाना भावुक हो गए। उन्होंने तय किया कि वो सबको बताएंगे कि उन्हें असली गुरु मिल गए हैं।

गुरु जी ने उन्हें समझाया कि ऐसा करने पर शायद उन्हें लोगों के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़े, लेकिन बाबा मखन शाह अपने फैसले से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने चेहरे पर राख लगाई और छत पर चढ़कर पूरे गांव को पुकारकर कहा— “गुरु लाधो रे”, यानी “गुरु मिल गए।” ये लुबानकी भाषा के शब्द हैं, जिसे लबाना समुदाय बोलता है। बाबा मखन शाह की इस हिम्मत के बाद खुद को गुरु बताने वाले बाकी सभी लोग वहां से चले गए। इसी घटना के बाद ये जगह आगे चलकर बाबा बकाला के नाम से मशहूर हुई।

Pic Credit: SikhiWiki

गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब

रूहानी एहसास से जुड़ी ये पाक जगह वो स्थान है, जहां श्री गुरु तेग बहादुर जी ने 26 साल, 9 महीने और 13 दिन रहकर प्रभु का नाम सिमरन किया और ध्यान लगाया। गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब सिख इतिहास के इसी अहम दौर की याद दिलाता है। आज इस गुरुद्वारे की 9 मंज़िला इमारत उस रूहानी ऊंचाई और परमात्मा से गुरु जी के गहरे जुड़ाव की निशानी मानी जाती है, जो उन्होंने यहां रहते हुए महसूस किया। यहां का शांत माहौल, लगातार गूंजती गुरबाणी और इस पाक जगह की रूहानी फ़िज़ा दिल को गहराई से छू जाती है। यहां आकर मेरे मन में गुरु जी के लिए अकीदत और भी बढ़ गई और एक अलग ही सुकून महसूस हुआ।

Pic Credit: Discover Sikhism

अकीदत और सुकून से भरा मेरा सफ़र

जब मैंने गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब में कदम रखा, तो दिल शुक्रगुज़ारी के एहसास से भर गया। इस पाक ज़मीन पर खड़े होकर मुझे लगा कि मैं वाकई ख़ुशनसीब हूं। यही वो जगह है, जहां सच्चे गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी ने ज़िंदगी के कई साल बिताए, सिमरन किया और इंसानियत को अपनी रूहानी सीख दी। इस जगह का गहरा इतिहास और रूहानी अहमियत दिल को छू गई।

यहां आकर गुरु जी के लिए मेरी अकीदत और गहरी हुई और यक़ीन भी मज़बूत हुआ। गुरुद्वारे का पूरा माहौल प्यार, एकता और अकीदत से भरा हुआ था। अलग-अलग जगहों और तबकों से आए श्रद्धालु यहां सिर झुकाने और सुकून पाने के लिए जमा हुए थे। यहां हर किसी को सिख धर्म की हमेशा राह दिखाने वाली सीखों में सुकून और उम्मीद मिलती महसूस हुई।

Pic Credit: The Tribune

आख़िरी बात

बाबा बकाला के गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब का मेरा सफ़र हमेशा याद रहेगा। इस जगह से मिले रूहानी सुकून और गुरु जी से जुड़े एहसास की यादें मेरे दिल में हमेशा रहेंगी। बाबा मखन शाह लुबाना की असली गुरु की तलाश सिख संगत की अटूट अकीदत और यक़ीन की एक मिसाल है। वहीं, गुरुद्वारा श्री भोरा साहिब का शांत माहौल और इससे जुड़ा गहरा इतिहास आज भी लोगों को सुकून और सही राह की तलाश में रौशनी देता है। दुआ है कि श्री गुरु तेग बहादुर जी की रहमत और उनकी सीख हमें हमेशा सही राह दिखाती रहे और इंसानियत, प्यार, रहम-दिली, एकता और हमेशा रहने वाले सुकून की तरफ़ ले जाए।

लेख: KBS सिधु

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: दिल्ली में ‘वीर जी दा डेरा’ करीब 35 सालों से लोगों की कर रहा सेवा

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