सिख धर्म के इतिहास की शुरुआत श्री गुरु नानक देव जी की पाक और इंसानियत से भरी सोच से हुई। पहले पांच Sikh Guru (सिख गुरू) गुरुओं ने समाज में एक अकाल पुरख के वजूद, बराबरी, जात-पात से ऊपर उठकर साथ रहने, सेवा और रहम-दिली की ऐसी मज़बूत बुनियाद रखी, जिसने सदियों से दबे-कुचले लोगों के अंदर आत्म-सम्मान और अपने हक़ के लिए खड़े होने का हौसला पैदा किया।
लेकिन साल 1606 में लाहौर में पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जन देव जी की महान शहादत ने सिख इतिहास को एक नया मोड़ दिया। इस बड़ी कुर्बानी के बाद सिख समुदाय के सामने एक अहम सवाल खड़ा हुआ—जब अमन, सच्चाई और धर्म पर ज़ुल्म होने लगे, तो क्या सिर्फ़ ख़ामोश रहना ही काफी है? या फिर ज़ुल्म और नाइंसाफी का सामना करने के लिए रूहानी ताकत के साथ अपनी हिफाज़त की ताकत भी ज़रूरी है?
मीरी-पीरी का सिद्धांत
इस ऐतिहासिक सवाल का जवाब छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने बहुत दूर की सोच के साथ दिया। सिर्फ़ 11 साल की उम्र में गुरुगद्दी संभालते हुए उन्होंने मीरी और पीरी की दो तलवारें धारण कीं। पीरी को रूहानी ताक़त का प्रतीक माना गया, जबकि मीरी दुनिया और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी की निशानी बनी। गुरु साहिब ने श्री हरमंदिर साहिब के सामने श्री अकाल तख़्त साहिब की स्थापना की। यहां धार्मिक बातों के साथ-साथ कौम और समाज से जुड़े मामलों पर भी विचार होने लगा।
गुरु साहिब ने सिखों को घुड़सवारी, शस्त्र विद्या और शारीरिक रूप से मज़बूत बनने के लिए प्रेरित किया। उनका संघर्ष किसी राज्य या सत्ता को हासिल करने के लिए नहीं था, बल्कि मज़लूमों की हिफ़ाज़त के लिए था। ग्वालियर के किले में बंद 52 राजाओं को रिहा करवाने के बाद गुरु साहिब को ‘बंदी छोड़ दाता’ कहा गया। उन्होंने यह संदेश दिया कि असली ताक़त सिर्फ़ अपने लिए नहीं होती, बल्कि दूसरों को भी आज़ादी दिलाने में होती है।

करुणा और सेवा का मेल
सातवें पातशाह श्री गुरु हरिराय साहिब जी ने सिख समुदाय को ये सिखाया कि ताकत का मतलब कभी भी सख्ती या घमंड नहीं होता। 2200 घुड़सवारों की फौजी ताकत को कायम रखते हुए भी उन्होंने अपनी ज़िंदगी दया, मोहब्बत और कुदरत की हिफाज़त के लिए समर्पित कर दी। उन्होंने एक बड़ा दवाखाना बनवाया, जहां दुर्लभ जड़ी-बूटियों से ज़रूरतमंद लोगों का मुफ़्त इलाज किया जाता था। जब मुग़ल शहज़ादे दारा शिकोह को इलाज की ज़रूरत पड़ी, तो गुरु साहिब ने सियासी खतरे के बावजूद उनकी जान बचाई। ये साफ़ पैग़ाम था कि किसी दुखी इंसान की मदद करते वक़्त उसकी जात, मज़हब या सियासत नहीं देखी जाती।

बाल प्रीतम की निस्वार्थ सेवा
आठवें पातशाह श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब जी ने बहुत छोटी उम्र में गुरगद्दी संभालकर ये दिखा दिया कि इल्म और रहनुमाई उम्र के मोहताज नहीं होते। जब दिल्ली की संगत के बुलावे पर गुरु साहिब दिल्ली पहुंचे, उस वक़्त शहर में चेचक और हैज़े की भयानक बीमारी फैली हुई थी। गुरु साहिब ने बिना किसी भेदभाव के दिन-रात बीमार लोगों की देखभाल की और उन्हें रूहानी सहारा दिया। लोगों की सेवा करते हुए गुरु साहिब खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गए और साल 1664 में सिर्फ़ आठ साल की उम्र में ज्योति-जोत समा गए। दिल्ली का ऐतिहासिक गुरुद्वारा बंगला साहिब आज भी उनकी इंसानी सेवा, रहम-दिली और बेगरज़ मदद की ज़िंदा मिसाल है।

इंसानी हक़ की हिफाज़त
नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने दूर-दराज़ के इलाकों का सफ़र किया और लोगों को बेखौफ़ होकर जीने का पैग़ाम दिया। उन्होंने फ़रमाया कि सच्चा ज्ञानी वही है जो “भै काहू कउ देत नहि, नहि भै मानत आन” यानी न किसी को डराता है और न किसी से डरता है। जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के ज़ुल्म और ज़बरदस्ती धर्म बदलवाने की कोशिशों के ख़िलाफ़ कश्मीरी पंडित मदद की गुहार लेकर गुरु साहिब के पास पहुंचे, तो गुरु साहिब ने एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसकी दुनिया के इतिहास में कोई दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है।
उन्होंने अपने मज़हब से अलग एक दूसरे समुदाय के तिलक-जनेऊ और धार्मिक आज़ादी के बुनियादी हक़ की हिफाज़त के लिए साल 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में अपना सिर कुर्बान किया। उनके साथ भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी ने भी बेइंतहा ज़ुल्म और तकलीफ़ें सहीं और शहादत हासिल की।
ख़ालसा पंथ की स्थापना
श्री गुरु तेग बहादुर जी की कुर्बानी के बाद श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिर्फ़ नौ साल की उम्र में गुरगद्दी संभाली। उन्होंने सिख समुदाय को इल्म, हौसले और आत्म-सम्मान से मज़बूत किया। साल 1699 में बैसाखी के दिन श्री आनंदपुर साहिब की धरती पर उन्होंने संगत के सामने अपना शीश देने के लिए कहा और पांच प्यारों को चुना। इसके बाद उन्होंने खंडे की पाहुल छकाकर ख़ालसा पंथ की स्थापना की।

अलग-अलग इलाकों से आए इन पांच प्यारों को बराबर का दर्जा दिया गया। सिख मर्दों को ‘सिंह’ और औरतों को ‘कौर’ नाम दिया गया। गुरु साहिब ने ऐसा ‘संत-सिपाही’ तैयार किया, जो दिल से प्रभु की भक्ति में डूबा रहे, लेकिन ज़ुल्म के सामने मज़बूती से खड़ा भी हो सके। इसके बाद गुरु साहिब ने खुद भी पांच प्यारों से अमृत छका। इससे ‘आपे गुरु चेला’ की एक अनोखी मिसाल कायम हुई।
बड़ी कुर्बानी और नैतिक जीत
ख़ालसा के उसूलों की असली परीक्षा जंग के मैदान में हुई। साल 1704 में आनंदपुर साहिब का किला छोड़ने के बाद गुरु साहिब का परिवार सरसा नदी के किनारे एक-दूसरे से बिछड़ गया। बड़े साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह चमकौर की जंग में शहीद हुए। वहीं छोटे साहिबज़ादे बाबा ज़ोरावर सिंह और बाबा फ़तेह सिंह ने अपना धर्म छोड़ने से इनकार कर दिया और सरहंद में उन्हें ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया गया। माता गुजरी जी भी ठंडे बुर्ज में ज्योति-जोत समा गईं।
इतनी बड़ी जुदाई और कुर्बानी के बावजूद गुरु साहिब के दिल में किसी के लिए नफ़रत पैदा नहीं हुई। पीर बुधू शाह, नबी ख़ान और ग़नी ख़ान जैसे मुसलमान भी उनके सच्चे हमदर्द और मददगार रहे। औरंगज़ेब को लिखे ‘ज़फ़रनामा’ में गुरु साहिब ने साफ़ किया कि ये लड़ाई किसी मज़हब के ख़िलाफ़ नहीं थी, बल्कि ज़ुल्म और नाइंसाफी के ख़िलाफ़ थी। उनका मक़सद इंसाफ़, सच्चाई और सही रास्ते के लिए खड़ा होना था।

सदा रहने वाले गुरु/अमर गुरु
साल 1708 में नांदेड़ में ज्योति-जोत समाने से पहले दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने रूहानी गुरुगद्दी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सौंप दी। गुरु नानक देव जी से शुरू हुई पवित्र रौशनी अब ‘शब्द-बाणी’ के रूप में हमेशा के लिए कायम हो गई। दस गुरुओं की ये पूरी यात्रा हमें सिखाती है कि रहम-दिली और ताकत एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ये सोच सिर्फ़ बीते वक़्त की कहानी नहीं है, बल्कि आज भी इंसानियत को बेखौफ़ रहने, आपसी भाईचारा बनाए रखने और सबकी भलाई के लिए मज़बूती से खड़े होने का रास्ता दिखाती है।
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