उर्दू अदब की फ़ेहरिस्त में एक ऐसी शख़्सियत हैं जिन्होंने अपनी सेहत की तमाम कमज़ोरियों के बावजूद अदब को इतना कुछ दिया कि उनकी शायरी आज भी ताज़ा महसूस होती है। राजेन्द्र मनचंदा बानी उन्हीं में से एक थे एक ऐसा शायर जिसका जिस्म भले ही नाज़ुक रहा हो, मगर जिसके अल्फ़ाज़ में गज़ब की ताक़त थी।
मुल्तान से दिल्ली तक का सफ़र
बानी साहब की पैदाइश 1932 में मुल्तान में हुई, जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। लेकिन 1947 की तक़सीम ने उनके परिवार को भी अपने साथ बहा दिया, और वो हिंदुस्तान आकर दिल्ली में बस गए। यही शहर उनका आख़िरी ठिकाना भी बना, जहां 1981 में उन्होंने आख़िरी सांस ली।
पढ़ाई और पेशा
बानी साहब ने पंजाब यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने टीचिंग को अपना पेशा बनाया और एक स्कूल में मास्टर साहब के तौर पर अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी। दिलचस्प बात यह है कि एक इक्नॉमिक्स के स्टूडेंट का दिल शायरी में इस क़दर रम गया कि आज उन्हें एक अर्थशास्त्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक बड़े शायर के तौर पर याद किया जाता है।
शायरी में एक नया रास्ता
बानी साहब की शायरी को नवशास्त्रीय ग़ज़ल की तर्ज़ पर रखा जाता है। इसका मतलब यह है कि उन्होंने पुराने, घिसे-पिटे बिम्बों जैसे चांद, शमा, परवाना वगैरह का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी एक अलग और मौलिक ज़बान गढ़ी। उनकी ख़ासियत यह भी थी कि वो हिंदी लफ़्ज़ों का बड़ी सफ़ाई और महारत से इस्तेमाल करते थे, जिससे उनकी शायरी में एक ताज़गी और नयापन आ जाता था।
सफ़र में तन्हा क़दम उठाना मुश्किल है
साथ तुम्हारे कभी न थकने वाला मैं
यह सिर्फ़ एक इश्क़िया शेर नहीं, बल्कि ज़िंदगी के सफ़र में साथ की अहमियत को बयान करता एक गहरा फ़लसफ़ा भी है।
बीमार जिस्म, मज़बूत हौसला
बानी साहब की सेहत उनकी पूरी ज़िंदगी उनका साथ नहीं दे सकी। वो जिस्मानी तौर पर काफ़ी कमज़ोर रहे और बीमारियों से जूझते रहे। लेकिन उनका ज़ेहन और हौसला हमेशा मज़बूत बना रहा। शायद यही वजह है कि उनकी शायरी में दर्द और तन्हाई के साथ-साथ एक अजीब सी उम्मीद और तजस्सुस भी नज़र आता है।
सिलसिला रौशन तजस्सुस का उधर मेरा भी है
ऐ सितारो उस ख़ला में इक सफ़र मेरा भी है
महज़ 49 साल की उम्र में, 1981 में, बानी साहब इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। लेकिन इतनी छोटी सी ज़िंदगी में भी उन्होंने अदब को तीन नायाब तोहफ़े दिए। ‘हर्फ़-ए-मोएतबर’ (1972), ‘हिसाब-ए-रंग’ (1976), और उनके इंतक़ाल के बाद शाया हुआ मजमुआ ‘शफ़क़-ए-शज्जर’।
राजेन्द्र मनचंदा बानी की शायरी आज भी उन पाठकों को अपनी तरफ़ खींचती है जो पुराने घिसे-पिटे अंदाज़ से हटकर कुछ नया और असली तलाश करते हैं। एक कमज़ोर जिस्म में बसी उनकी मज़बूत शायरी आज भी उर्दू अदब की एक अनमोल मीरास है।
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