क्या आपने कभी ऐसा कपड़ा छुआ है जो बादल को छूने का एहसास दे? जिसकी नज़ाकत में राजस्थान की मिट्टी की खुशबू और बुनकरों की मेहनत की लज़्ज़त समाई हो? अगर नहीं, तो आइए आपको मिलाते हैं कोटा डोरिया से। भारतीय वस्त्र कला का वो अनमोल जवाहर, जिसने अपनी बारीकी और हल्केपन से दुनिया भर के दिलों को मोह लिया है।

कोटा: जहां से शुरू होता है सफ़र
राजस्थान का कोटा शहर, जो अपनी विरासत और हुनर के लिए मशहूर है, कोटा डोरिया का गवाह है। ये कपड़ा सिर्फ़ एक वस्त्र नहीं, बल्कि राजस्थानी संस्कृति की रूह है। कोटा डोरिया का इतिहास करीब 250 से 300 साल पुराना है। पहले इसे’”कोटा मसूरिया’ के नाम से जाना जाता था, और इसकी बुनाई की कला मैसूर से निकलकर कोटा के पास बसे कैथून गांव तक पहुंची। राजपूत राजाओं और मुग़ल सेनापति राव किशोर सिंह की हिमायत ने इस कला को परवान चढ़ाया। यहां तक कि कोटा के राजघराने ने इसे अपनी शान बनाया, क्योंकि राजा-रजवाड़ों को ऐसा लिबास चाहिए था जो मरुस्थल की तपिश में भी राहत दे।

नाम में ही छिपा है राज़
‘डोरिया’ नाम आया इसकी बुनाई में बनने वाले चौकोर (खत) पैटर्न से। जिसे लोकल भाषा में ‘खत’ कहते हैं। यही ख़ास नक़्शा कोटा डोरिया की पहचान है। शुरुआत में ये कपड़ा सिर्फ़ सफ़ेद रंग में बुना जाता था, लेकिन वक़्त के साथ रंगों की बारात ने इसे जीवंत बना दिया।

ख़ूबियां जो इसे लाजवाब बनाती हैं
1. हल्कापन: कोटा डोरिया इतना हल्का है कि पहनते ही लगता है जैसे हवा ओढ़ ली हो। भारत की तपती गर्मियों के लिए ये बेहतरीन है।
2. मज़बूती: नाज़ुक दिखने के बावजूद ये कपड़ा टिकाऊ है। सही देखभाल के साथ सालों-साल चलता है।
3. कॉटन और सिल्क का संगम: पहले सिर्फ़ सूती धागों से बुना जाने वाला ये कपड़ा अब रेशम के धागों के साथ मिलकर एक नफ़ासत और चमक पैदा करता है।
4. रंगों का कैनवास: ये कपड़ा रंगों को ऐसे अपनाता है जैसे कोई कलाकार अपने कैनवास पर जादू करता है। सफ़ेद से लेकर गहरे रंगों तक, हर शेड में ये बेमिसाल लगता है।
5. जीआई टैग: जुलाई 2005 में कोटा डोरिया को जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला यानी इसकी असली पहचान सिर्फ़ कोटा क्षेत्र से जुड़ी है। ये प्रमाणपत्र इस विरासत की हिफ़ाज़त का ज़रिया बना।

एक हुनर जो पीढ़ियों से चला आ रहा है
कैथून गांव में लगभग हर घर में एक पिट लूम मिल जाएगा। यहां की बुनाई प्रोसेस बेहद बारीक और वक़्त-तलब है:
- वाइंडिंग: धागों को बॉबिन और पिर्न पर लपेटना।
- वार्पिंग: ताने के धागों की सही लंबाई और संख्या तय करना।
- डाइंग: धागों को रंगने का प्रोसेस।
- साइज़िंग: धागों को मज़बूती देने के लिए पतले चावल के पेस्ट और जंगली प्याज़ के रस का इस्तेमाल।
- ड्राफ़्टिंग-डेंटिंग: नक़्शे की योजना बनाना।
- वीविंग: धागों को बुनाई की मशीन पर पिरोना।
- डिज़ाइनिंग: हर टुकड़े को ख़ास बनाने के लिए नक़्क़ाशी।
कितने रूप, कितने रंग
कोटा डोरिया कई अंदाज़ों में बुना जाता है:
- सादा कोटा डोरिया :- रोज़मर्रा के लिए।
- ज़री वर्क वाला कोटा डोरिया :- शादियों और ख़ास मौक़ों के लिए।
- ब्लॉक प्रिंट कोटा डोरिया :- त्योहारों और कैज़ुअल पहनावे के लिए।
हर अंदाज़ अपनी अलग अदा और पहचान रखता है।

कैसे पहनें इसे?
कोटा डोरिया की साड़ी, दुपट्टा, स्कार्फ़। हर रूप में ये आपकी अलमारी में चार चांद लगा सकता है। डिज़ाइनर इसे मॉडर्न फ़ैशन के साथ जोड़कर नए-नए एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं।

शोहरत की दास्तान
कोटा डोरिया को लोकप्रियता दिलाने में मारवाड़ी समुदाय का बड़ा हाथ रहा। जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों में ये ख़ूब पसंद किया गया। राजस्थान सरकार ने भी इसकी तरक़्क़ी में अहम रोल निभाया। साल 2015 में बांग्लादेशी फ़ैशन डिज़ाइनर बीबी रसेल ने राजस्थान हेरिटेज वीक में कोटा डोरिया साड़ियां पेश करके इसे इंटरनेशनल पहचान दिलाई। ज़ेनब बानो और बशीरन बानो जैसे माहिर बुनकरों को भारत सरकार ने सम्मानित किया।
कोटा डोरिया सिर्फ़ कपड़ा नहीं ये राजस्थान की रूह, बुनकरों की मेहनत और पीढ़ियों की विरासत है। जब आप इसे पहनते हैं, तो आप सिर्फ़ एक वस्त्र नहीं ओढ़ते, आप एक तहज़ीब को अपने वजूद से जोड़ते हैं।
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