कुछ लोग एक ज़बान में भी अपनी बात ठीक से नहीं कह पाते, और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक साथ चार-चार ज़बानों में अपने दिल का दर्द, अपनी सोच, अपना फ़लसफ़ा उतार देते हैं बड़ी सादगी से, बिना किसी दिखावे के। सत्यपाल आनंद ऐसे ही एक इंसान थे। उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी- इन चारों ज़बानों में उन्होंने जो कुछ लिखा, वो सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं थे, बल्कि एक पूरी ज़िंदगी का हासिल था। एक ऐसी ज़िंदगी, जो बंटवारे के ज़ख़्मों से शुरू होकर, दुनिया भर की यूनिवर्सिटीज़ के दरवाज़ों से होते हुए, आख़िर में टोरंटो की एक शांत शाम में जाकर थमी।
सत्यपाल आनंद का जन्म 24 अप्रैल 1931 को कोट सारंग नाम की एक जगह में हुआ, जो उस वक़्त पंजाब प्रांत, ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था आज यह पाकिस्तान में है। वहीं उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम पाई, और 1947 में रावलपिंडी से स्कूली पढ़ाई पूरी की। ज़रा सोचिए वही 1947, जब पूरा बरसों पुराना घर, गली-मोहल्ला, दोस्त-रिश्तेदार, सब कुछ एक रात में बदल गया। बंटवारे ने उनके परिवार को भी अपनी जड़ें उखाड़कर लुधियाना ले जाने पर मजबूर कर दिया।
लेकिन शायद यही वो दर्द था, जिसने आगे चलकर उनकी क़लम को इतनी गहराई दी। लुधियाना में ही उन्होंने अपनी असली पढ़ाई शुरू की, और चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एमए किया। वो भी शानदार नंबरों के साथ। बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में पहली पीएचडी की, और फिर अमेरिका जाकर ट्रिनिटी यूनिवर्सिटी, टेक्सास से फिलॉसफ़ी में दूसरी डॉक्टरेट हासिल की। एक शख़्स, दो डॉक्टरेट, और एक दिल जो हमेशा किताबों और अल्फ़ाज़ों के इर्द-गिर्द धड़कता रहा।
आनंद साहब ने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाने में लगाया और सिर्फ़ एक जगह नहीं, बल्कि दुनिया भर में। 1961 में चंडीगढ़ से शुरुआत करने के बाद वो वॉशिंगटन डीसी की यूनिवर्सिटी ऑफ़ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ़ कोलंबिया पहुंचे, फिर कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया, फिर इंग्लैंड की ओपन यूनिवर्सिटी। 1992 से 1995 तक सऊदी अरब में तकनीकी शिक्षा विभाग में भी उन्होंने ख़िदमात अंजाम दीं।
उनके शागिर्द और दोस्त उन्हें प्यार से “एयरपोर्ट प्रोफे़सर” कहते थे क्योंकि वो हर दावत क़ुबूल कर लेते थे, चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो। ब्रिटेन, जर्मनी, तुर्की, डेनमार्क, नॉर्वे जहां भी बुलावा आया, वो अपना बैग उठाकर निकल पड़ते। यह सिर्फ़ सफ़र का शौक़ नहीं था, बल्कि तालीम और अदब के लिए एक ऐसा जुनून था, जो उम्र के साथ कभी कम नहीं हुआ।
जब क़लम ने बग़ावत भी की
उनकी अदबी ज़िंदगी की शुरुआत भी कम दिलचस्प नहीं। सिर्फ़ 22 साल की उम्र में, जब ज़्यादातर नौजवान अभी अपनी राह तलाश रहे होते हैं, सत्यपाल आनंद ने 1953 में अपनी पहली अफ़सानों की किताब छपवा दी थी। इसके बाद के दो-तीन सालों में उन्होंने एक शायरी का मजमूआ और कई नॉवेल भी उर्दू में लिख डाले। मानो अल्फ़ाज़ उनके अंदर से थमने का नाम ही नहीं ले रहे हों।
मगर एक सच्चे लेखक की पहचान यही होती है कि वो सिर्फ़ तारीफ़ बटोरने के लिए नहीं लिखता- वो सच कहने से भी नहीं डरता। 1957 में जब उनका हिंदी नॉवेल “चौक घंटाघर” छपा, तो पंजाब सरकार को यह इतना नागवार गुज़रा कि उस पर पाबंदी लगा दी गई, और उनकी गिरफ़्तारी का हुक्म तक जारी हो गया। ज़रा सोचिए- एक युवा लेखक, जिसकी अभी क़लम ही तराशी जा रही थी, उसे इतनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी। लेकिन इसी विवाद ने शायद उन्हें और मज़बूत बना दिया, और आगे चलकर उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी — हर ज़बान के अदीबों-शायरों ने दिल खोलकर उनके काम की तारीफ़ की।
वो ग़ज़ल से ज़्यादा नज़्में लिखना पसंद करते थे शायद इसलिए कि नज़्म में जो बात खुलकर, बिना किसी बंदिश के कही जा सकती है, वो शायद ग़ज़ल की तंग बहर में मुमकिन नहीं। उनकी शायरी इतिहास, पौराणिक कहानियों और मशरिक़-मग़रिब की मिली-जुली तहज़ीब से रंगी हुई थी जैसे उनके अंदर पूरब और पश्चिम, दोनों एक साथ सांस लेते हों।
एक नज़्म, जिसने दुनिया को झकझोर दिया
उनकी अंग्रेज़ी नज़्म “Thus Spake The Fish” को संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रायोजित एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता — “अर्थ प्रिज़र्वेशन डे सेलिब्रेशन” में पुरस्कार के लिए चुना गया। यह नज़्म एक मरती हुई मछली की ज़ुबानी लिखी गई है, जो समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा का सहारा लेकर इंसान द्वारा प्रकृति और समुद्री जीवन के शोषण पर गहरा तंज़ कसती है। एक ऐसी नज़्म, जो सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती, महसूस की जाती है।
2 अगस्त 2025 को, टोरंटो, ओंटारियो (कनाडा) में, 94 साल की उम्र में उनकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। एक लंबी, भरपूर और बेहद बारीक बुनी हुई ज़िंदगी का सफ़र यहीं आकर थम गया। मगर जो अल्फ़ाज़ उन्होंने पीछे छोड़े, वो थमने वाले नहीं — वो आज भी उन किताबों के पन्नों में सांस लेते हैं, जिन्हें उन्होंने चार ज़बानों में लिखा।
सत्यपाल आनंद की कहानी सिर्फ़ एक लेखक की कहानी नहीं है यह एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने बंटवारे के दर्द को नफ़रत बनने नहीं दिया, बल्कि उसे अदब में ढाल दिया। जिसने चार अलग-अलग ज़बानों को कभी दीवार नहीं बनने दिया, बल्कि हर ज़बान में एक ही दिल की धड़कन सुनाई। शायद यही वजह है कि आज, उनके जाने के बाद भी, उनकी नज़्में और उनके अफ़साने उन तमाम पढ़ने वालों से बात करते रहेंगे, जो साहित्य में सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि एक ज़िंदा इंसान की सांसें तलाश करते हैं।
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