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पंजाबी ग़ज़ल के मास्टर Muhinderdeep Grewal

Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) उनका पेन नेम है, जबकि उनके ऑफिशियल दस्तावेज़ों में नाम गुरदीप सिंह ग्रेवाल दर्ज है। उनका पैतृक गांव धांदरा है। बचपन में ही उनके वालिद का इंतक़ाल हो गया था। इसके बाद उनकी परवरिश लुधियाना के सिद्धवां बेट के पास बसे सलेमपुर गांव में उनके नाना के घर हुई। उन्होंने जगरांव के लाजपत राय मेमोरियल कॉलेज से B.Sc. नॉन-मेडिकल की तालीम हासिल की। इसके बाद गुरु हरगोबिंद खालसा कॉलेज ऑफ एजुकेशन, गुरु सर साधर से B.Ed. किया। तालीम पूरी करने के बाद वो सरकारी स्कूल में उस्ताद बन गए।

शायरी लिखने के शौक़ की वजह से उन्होंने जगरांव में रहने वाले मशहूर ग़ज़लकार प्रिंसिपल तख़्त सिंह को अपना उस्ताद बनाया। पंजाबी ग़ज़ल की दुनिया में Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) का एक अहम नाम है। उनका पहला शायरी संग्रह ‘लहू बोलदा है’ था और दूसरा शायरी संग्रह ‘सफ़र दी रुत’। इसके बाद उनकी शायरी और ग़ज़ल के पांच और मजमूए भी पब्लिश हुए। Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) ने जगरांव-रायकोट तहसील रोड पर अपना घर बनाया। उनके घर की वजह से इस इलाके का नाम आगे चलकर ‘गुरदीप नगर’ के नाम से मशहूर हो गया।

Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) 1970-71 में लुधियाना आए थे। इसके बाद से ही वो हमारे दोस्त रहे हैं। कुलवंत जगरांव और Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) की साहित्यिक जोड़ी ने हमें लिखने और साहित्य को समझने का एक नया अंदाज़ सिखाया। वो प्रो. मोहन सिंह मेमोरियल फाउंडेशन से भी जुड़े रहे और इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। वो जस्वाल के शुरुआती साथियों में से भी एक थे। Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) को सर्वसम्मति से सेंट्रल पंजाबी राइटर्स एसोसिएशन (रजि.) का जनरल सेक्रेटरी भी चुना गया। वो पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना के लाइफ मेंबर हैं। आजकल वो अपने छोटे बेटे के साथ अमेरिका के शिकागो में रहते हैं।

गुरदियाल रोशन जी ने Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) के बारे में लिखा है कि वो 1970 के दशक में शुरू हुए पंजाबी ग़ज़ल आंदोलन की देन हैं। उनकी ग़ज़लों में रंग भी है और जज़्बा भी। वो एक ऐसे ग़ज़लकार हैं, जो मोहब्बत के साथ-साथ समाज में बदलाव की बात भी करते हैं। Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे और पंजाब के शिक्षा विभाग में लेक्चरर के तौर पर काम करने के बाद रिटायर हुए। उन्हें पंजाब के कई बड़े ग़ज़लकारों की सोहबत में रहने का मौक़ा मिला। उनकी ग़ज़लों को खूब पसंद किया गया और उन्हें उस्ताद पंडित तख़्त सिंह समेत कई बड़े साहित्यकारों की सरपरस्ती और दुआएं मिली।

Muhinderdeep Grewal (महिंदरदीप ग्रेवाल) ने अंग्रेज़ी में भी एक शायरी संग्रह लिखा और पब्लिश किया। आज उम्र ज़्यादा होने और तबीयत ठीक न रहने की वजह से उनकी क़लम पहले की तरह नहीं चलती। कभी साहित्यिक सरगर्मियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले महिंदरदीप ग्रेवाल को अपनी ज़िंदगी में कई सम्मान भी मिल चुके हैं।

महिंदरदीप ग्रेवाल की ग़ज़लें
1.
दूर हैं तूं, मगर नज़र पहुंची,
मेरे दर तों ओह तेरे दर पहुंची।
एह नज़र की, कमाल की इस दा,
इस घर तों ओह उस घर पहुंची।
मैं सी अनजान, तुर पिया फिर वी,
मैनूं लै के तेरी डगर पहुंची।
फड़ के उंगली ओह लै गई मैनूं,
बण के मेरी ओह हमसफ़र पहुंची।
तेरे बोलण ने आऊण दा ही कहया,
मेरे घर तक्क तेरी ख़बर पहुंची।


2.
एह किधरों आ रही है दूर तों सदा कोई,
कित्ते उडीक तां होवेगी उस जगह कोई।
एह मेरे हथ किवें भिज गए ने चेहरे ’ते,
मैं वरहा रिहा हां जां एह वरह रही घटा कोई।
भटक रिहा हां मैं जिस राह ’ते बिना रुक के,
सफ़र एह केहा है जिस दा नहीं सिरा कोई।
एह मेरी तरप है जां लहर है समुंदर दी,
कदों बनी, कदों मिट जाए न पता कोई।
कोई तां चिंग जेही फूट पई है रूह अंदर,
अजीब सेक जिहा जिस्मां ’च मग्ग पिया कोई।
मैं उड़दे पंछियां दी दार दे विच शामिल हां,
ओह केहड़ा देश घरों जित्थों बुला रिहा कोई।

स्टोरी – गुरभजन सिंह गिल

इस लेख को अंग्रेज़ी में भी पढ़े

ये भी पढ़ें: पंजाबी कवि बुल्ले शाह की दास्तान- मोहब्बत, सूफ़ियाना रंग और सादगी की मिसाल

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