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पंडित दया शंकर नसीम: वो शायर जिसने ‘गुलज़ार-ए-नसीम’ से उर्दू मसनवी को नई पहचान दी

पंडित दया शंकर नसीम उर्दू अदब के उन ख़ास शायरों में शुमार होते हैं जिनकी शायरी में लखनवी तहज़ीब, ज़बान की नफ़ासत, ख़याल की बुलंदी और अल्फ़ाज़ की दिलकश रिआयत एक साथ नज़र आती है। 1811 ई. में लखनऊ में पैदा होने वाले नसीम का ताल्लुक़ एक शिक्षित और संभ्रांत पंडित परिवार से था। बचपन से ही उन्हें अदब और शायरी से गहरी दिलचस्पी थी।

ज़रूरी तालीम हासिल करने के बाद उन्होंने शाही फ़ौज में क्लर्क की हैसियत से काम किया। यह वह दौर था जब ग़ाज़ीउद्दीन हैदर और नसीरुद्दीन हैदर के ज़माने में लखनऊ अपनी रौनक़, ऐश-ओ-इशरत और अदबी सरगर्मियों के लिए मशहूर था। इसी अदबी माहौल में नसीम का शायराना ज़ौक़ परवान चढ़ा।

आतिश की शागिर्दी और शायरी का सफ़र

नसीम ने अपने अदबी ज़ौक़ की तस्कीन मशहूर शायर ख़्वाजा हैदर अली आतिश की शागिर्दी में की। आतिश उन उस्तादों में गिने जाते हैं जिन्होंने उर्दू ज़बान की सफ़ाई, इस्लाह और मुहावरे की पुख़्तगी पर ख़ास तवज्जो दी।

नसीम ने भी शुरुआत में ग़ज़ल कहने की मश्क़ की। उनके कई अशआर में ख़याल की ताज़गी और ज़बान की मिठास दिखाई देती है।

लाए उस बुत को इल्तिजा कर के
कुफ़्र टूटा ख़ुदा ख़ुदा कर के

बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए
यहीं से है काबा को सज्दा हमारा

उनकी ग़ज़लों में इश्क़, हुस्न, रूहानी कैफ़ियत और लखनवी अंदाज़-ए-बयां की झलक मिलती है। मगर नसीम की असल सलाहियत ग़ज़ल की ज़मीन से आगे बढ़कर मसनवी में खुली।

‘गुलज़ार-ए-नसीम’ ने दिलाई पहचान

नसीम की सबसे मशहूर कृति ‘गुलज़ार-ए-नसीम’ है। यही वह मसनवी है जिसने उन्हें उर्दू अदब में स्थायी मक़ाम दिलाया। इसे दबिस्तान-ए-लखनऊ की मसनवी निगारी की बेहतरीन मिसालों में शुमार किया जाता है।

‘गुलज़ार-ए-नसीम’ की कहानी इश्क़, तिलिस्म, रोमांच और जुदाई-विसाल से भरी हुई है। इसमें शहज़ादा ताज-उल-मुलूक और परी बकावली की मोहब्बत को केंद्र में रखा गया है। ताज-उल-मुलूक अपने अंधे वालिद की आंखों की रोशनी वापस लाने के लिए गुल-ए-बकावली की तलाश में निकलता है। इसी सफ़र में उसकी मुलाक़ात बकावली से होती है और दोनों एक-दूसरे के इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते हैं।

इसके बाद कहानी में तिलिस्मी जंगल, जुदाई, इम्तिहान, सज़ा और फिर मिलन के कई दिलचस्प मोड़ आते हैं। दास्तान में बहराम और हुस्नआरा की मोहब्बत की एक और कहानी भी शामिल है, जो मसनवी को और दिलचस्प बना देती है।

अल्फ़ाज़ का जादू और लखनवी रंग

‘गुलज़ार-ए-नसीम’ की सबसे बड़ी ख़ूबी केवल इसकी कहानी नहीं, बल्कि नसीम का अंदाज़-ए-बयां है। उन्होंने अल्फ़ाज़ को इस तरह बरता कि एक शब्द दूसरे शब्द से जुड़कर पूरी तस्वीर सामने खड़ी कर देता है। रिआयत-ए-लफ़्ज़ी, ज़िला, तश्बीह और इस्तिआरे का इस्तेमाल उनकी शायरी को ख़ास बनाता है।

हर शाख़ में है शगूफ़ा कारी
समरा है क़लम का हम्द-ए-बारी

इन अशआर में ‘शाख़’, ‘शग़ूफ़ा’, ‘समर’ और ‘क़लम’ जैसे अल्फ़ाज़ एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हैं कि पूरी मसनवी का ‘गुलज़ार’ सामने आ जाता है। यही नसीम की फ़नकारी है कि वे मामूली से अल्फ़ाज़ में भी कई तहों वाले मायने पैदा कर देते हैं।

उनकी शायरी में लखनऊ की तहज़ीब, उसकी नफ़ासत और उस दौर की सामाजिक फ़ज़ा भी महसूस होती है। यही वजह है कि ‘गुलज़ार-ए-नसीम’ सिर्फ़ एक इश्क़िया दास्तान नहीं, बल्कि अपने दौर की ज़बान और तहज़ीब का भी एक अदबी आईना बन जाती है।

नसीम की ग़ज़ल में इश्क़ और कैफ़ियत का एक अलग ही रंग दिखाई देता है।

जब हो चुकी शराब तो मैं मस्त मर गया
शीशे के ख़ाली होते ही पैमाना भर गया

एक और शेर में उनका ख़याल कुछ यूं सामने आता है।

ने क़ासिद-ए-ख़याल न पैक-ए-नज़र गया
उन तक मैं अपनी आप ही लेकर ख़बर गया

उनके अशआर में कभी इश्क़ की बेख़ुदी है, कभी हुस्न की कशिश और कभी इंसानी कैफ़ियत की गहरी तस्वीर।

छोटी उम्र, बड़ा अदबी मक़ाम

पंडित दया शंकर नसीम को ज़िंदगी ने बहुत लंबी मोहलत नहीं दी। महज़ 32 साल की उम्र में 1843 ई. में उनका इंतिक़ाल हो गया। मगर इतनी कम उम्र में उन्होंने उर्दू अदब को ऐसा अदबी सरमाया दिया जो आज भी ज़िंदा है।

नसीम की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने लखनवी ज़बान की नफ़ासत, अल्फ़ाज़ की रिआयत और तिलिस्मी इश्क़ की दास्तान को एक ऐसी मसनवी में ढाल दिया जिसने उन्हें उर्दू अदब में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

‘गुलज़ार-ए-नसीम’ आज भी इस बात की गवाही देता है कि अच्छी शायरी सिर्फ़ कहानी नहीं कहती, बल्कि अल्फ़ाज़ से एक पूरा जहांआबाद कर देती है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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