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निसार अकबराबादी: शायरी में इश्क़ और तसव्वुफ़ का रंग पिरोने वाले शायर 

निसार अकबराबादी उर्दू अदब के उन शायरों में शुमार होते हैं, जिनकी शायरी में इश्क़, तसव्वुफ़ और रूहानी एहसास का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म हासिल करने, पढ़ाने और शायरी की ख़िदमत में गुज़ारी।

इल्मी माहौल में परवरिश

निसार अकबराबादी ने अपने वालिदैन के साये में परवरिश पाई। शुरुआती तालीम अपने वालिद से हासिल की और बाद में अपने दौर के दूसरे उलेमा से मुख़्तलिफ़ उलूम पढ़े। उन्हें फ़ारसी और अरबी पर अच्छी महारत हासिल थी और हिन्दी ज़बान से भी अच्छी तरह वाक़िफ़ थे।

किताबों का मुतालिआ उनके मिज़ाज का हिस्सा था। शुरुआत में उन्होंने अपने वालिद की विरासत से गुज़रान किया, लेकिन बाद में दर्स-ओ-तदरीस को अपना पेशा बना लिया। वह मदरसों के तलबा को अंग्रेज़ी भी पढ़ाते थे। ज़िंदगी के आख़िरी दौर में उन्हें नवाब मुहम्मद इस्माईल ख़ान के यहां मुअल्लिम की ज़िम्मेदारी मिली। नवाब साहिब उनकी बहुत इज़्ज़त और क़द्र करते थे।

मुशायरों से शायरी तक

नौजवानी में ही निसार को शायरी का शौक़ पैदा हुआ। वह अपने दौर के कई मशहूर मुशायरों में शिरकत करते थे। राजा बलवान सिंह काशी के यहां होने वाली शायरों की महफ़िलों में भी वह जाते थे।

इसी तरह मेहर के मकान पर पंद्रह रोज़ा अदबी मजलिस होती थी, जिसमें उस दौर के कई शायर हिस्सा लेते थे। क़ाज़ी बाक़र अली ख़ान के बिरादरज़ादे मुंशी सैयद अली ख़ान ‘अफ़ज़ल’ के यहां भी बड़े पैमाने पर मुशायरे होते थे।

इन अदबी महफ़िलों ने निसार के अंदर शायरी के शौक़ को और मज़बूत किया। उन्होंने लगातार मश्क़-ए-सुख़न की और अपने कलाम को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहे।

शाह अकबर दानापुरी की सोहबत

निसार की शायरी में तसव्वुफ़ का गहरा रंग उनके रूहानी उस्ताद हज़रत शाह अकबर दानापुरी की सोहबत का नतीजा था। कुछ समय हज़रत मेहर से मश्वरा लेने के बाद उन्होंने शाह अकबर दानापुरी की ख़ास सोहबत हासिल की।

बाद में वह नक़्शबंदी अबुल-उलाई सिलसिले में हज़रत शाह अकबर दानापुरी के हाथ पर बैअत हुए। उन्हें इजाज़त और ख़िलाफ़त भी मिली। इसके बाद वह हज़रत अकबर के शागिर्दों के हल्क़े में शामिल हो गए।

शाह अकबर दानापुरी की रूहानी तालीम का उनकी शायरी पर गहरा असर पड़ा। उनके कलाम में इश्क़-ए-हक़ीक़ी, रूहानियत और तसव्वुफ़ के रंग साफ़ दिखाई देते हैं।

उस दौर के कई बड़े उस्तादों और शायरों के बीच अदबी मुक़ाबला रहता था, लेकिन निसार अकबराबादी की शख़्सियत कुछ अलग थी। मिर्ज़ा अनीस, सैयद तसव्वुफ़ हुसैन वासिफ़ और शैख़ आली जैसे बड़े लोग भी उनका एहतराम करते थे।

निसार भी अपने उस्तादों और हम-असरों के साथ बेहद ख़ुलूस से पेश आते थे। उनके अंदर इल्म के साथ-साथ अदब और विनम्रता भी थी।

ग़ज़ल पढ़ने का ख़ास अंदाज़

निसार अकबराबादी का ग़ज़ल पढ़ने का अंदाज़ भी बहुत अलग था। वह अपनी ग़ज़ल को बहुत आहिस्ता-आहिस्ता और तहतुल-लफ़्ज़ अंदाज़ में पढ़ते थे।

महफ़िल में मौजूद लोग उनके इस अंदाज़ से ख़ूब लुत्फ़अंदोज़ होते। बड़े शायर और अदबी लोग उन्हें “जीते रहो” जैसे हौसला-अफ़ज़ा जुमलों से दाद देते थे।

उनकी ख़ासियत यह थी कि वह अपने शागिर्दों और दूसरे उस्तादों के शागिर्दों के साथ भी बराबरी और मोहब्बत का बर्ताव करते थे।

शायरी में इश्क़ और रूहानियत

निसार के कलाम में इश्क़ का दर्द और रूहानी कैफ़ियत बार-बार सामने आती है। उनके इस शेर में जुदाई की बेचैनी और बहार के ख़त्म हो जाने का एहसास देखा जा सकता है।

नौ-असीर-ए-फ़ुर्क़त हूं, विस्ल-ए-यार मुझ से पूछ
हो गई ख़िज़ां दम में, सब बहार मुझ से पूछ

उनकी शायरी में दुनिया की चमक-दमक से बेनियाज़ी और इश्क़ की कैफ़ियत भी दिखाई देती है।

बाग़-ओ-बहिश्त-ओ-हूर-ओ-जन्नत अबरारों को कीजिए इनायत
हमें नहीं कुछ उसकी ज़रूरत, आप के हम दीवाने हैं

ख़्वाब है न बेदारी, शुक्र है न होशियारी
लुत्फ़-ए-लज़्ज़त-ए-कैफ़-ए-बे-ख़ुमार मुझ से पूछ

 सब खुल गया तिलिस्म-ए-जहां का, जो राज़ था
जिस पर्दे को उठाया, वही पर्दा-साज़ था

निसार अकबराबादी की कई तसानीफ़ का ज़िक्र मिलता है। इनमें “मलफ़ूज़ात-ए-हज़रत शाह अकबर दानापुरी”, “मज़ाक़-ए-इश्क़” और “ख़ुमार-ए-इश्क़” ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। इसके अलावा उनका एक मुकम्मल दीवान, एक ग़ैर-मुकम्मल दीवान और फ़ारसी कलाम का मजमूआ भी बताया जाता है।

आख़िरी दौर और इंतिक़ाल

ज़िंदगी के आख़िरी दौर में निसार अकबराबादी अमराज़ में मुब्तिला रहे। आख़िरकार 27 अप्रैल 1921 ईस्वी को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।

उनकी रिहलत पर हज़रत शाह मोहसिन अकबराबादी ने क़ितआ-ए-तारीख़ भी लिखा।

निसार अकबराबादी की ज़िंदगी इल्म, अदब और रूहानियत का ख़ूबसूरत संगम थी। उन्होंने शायरी को सिर्फ़ जज़्बात के इज़हार का ज़रिया नहीं बनाया, बल्कि उसमें इश्क़, तसव्वुफ़ और इंसानी एहसास को भी जगह दी। यही वजह है कि उनका नाम उर्दू अदब की रूहानी शायरी की दुनिया में आज भी एहतराम से लिया जाता है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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