उर्दू शायरी की दुनिया में नवाज़ देवबंदी का नाम उन मक़बूल शाइरों में शुमार होता है, जिनके अशआर सीधे दिल में उतर जाते हैं। उनकी शायरी में मोहब्बत की नर्मी, ज़िंदगी की हक़ीक़त, इंसानी जज़्बात और हौसले का पैग़ाम एक साथ मिलता है। आसान अल्फ़ाज़ में गहरी बातें कहना उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी है। यही वजह है कि उनका कलाम मुशायरों से लेकर ग़ज़ल-नशीनों तक बेहद पसंद किया जाता है।
नवाज़ देवबंदी का असली नाम मोहम्मद नवाज़ ख़ान है। उनकी पैदाइश 16 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के देवबंद में हुयी। अदब और इल्म से लगाव बचपन से ही था। उन्होंने उर्दू ज़बान और अदब में आला तालीम हासिल की। जामिया उर्दू अलीगढ़ से डी.लिट., अदीब कामिल और मुअल्लिम उर्दू की डिग्रियां हासिल कीं, जबकि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से उर्दू में एम.ए., पीएच.डी. और बी.कॉम. की तालीम पूरी की।
नवाज़ देवबंदी सिर्फ़ एक शायर ही नहीं, बल्कि बेहतरीन ग़ज़ल-निगार भी हैं। उनकी लिखी कई ग़ज़लों को मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी, जिससे उनका कलाम दुनिया भर के शायरी-प्रेमियों तक पहुंचा। साल 2008 में गायक सचिन शर्मा के ग़ज़ल एल्बम “अमानत” के गीत भी उन्होंने ही लिखे।
पिछले कई दशकों में नवाज़ देवबंदी ने भारत और विदेशों में 5 हज़ार से ज़्यादा मुशायरों और कवि सम्मेलनों में शिरकत की है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, ओमान, बहरीन, सिंगापुर और पाकिस्तान समेत कई देशों में उन्होंने अपनी शायरी से उर्दू अदब का परचम बुलंद किया।
उनकी मशहूर किताबों में “पहला आसमान” और “सवानेह उलमा-ए-देवबंद” शामिल हैं। इन किताबों में उनकी फ़िक्र, अदबी नज़र और इंसानी जज़्बात की गहराई साफ़ दिखाई देती है।
साल 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें अदब के मैदान में शानदार ख़िदमात के लिए “यश भारती सम्मान” से नवाज़ा। यह सम्मान उनकी अदबी पहचान और शायरी की मक़बूलियत का सबूत है।
शाम महके तिरे तसव्वुर से,
शाम के बाद फिर सहर महके।
नवाज़ देवबंदी की शायरी का सबसे बड़ा कमाल यह है कि वह आम ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों को बड़े असरदार अंदाज़ में बयान करते हैं। उनके अशआर में ग़रीबी का दर्द भी है, मोहब्बत की ख़ुशबू भी और मुश्किल वक़्त में हौसला बढ़ाने वाला पैग़ाम भी।
उनका यह मशहूर शेर ग़रीबी की तल्ख़ हक़ीक़त को बेहद सादा लेकिन असरदार अंदाज़ में पेश करता है।
भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए,
मां ने फिर पानी पकाया देर तक।
मोहब्बत के एहसास को वह इन अल्फ़ाज़ में बयान करते हैं।
तेरे आने की जब ख़बर महके,
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके।
ज़िंदगी में हिम्मत और हौसले की अहमियत को उन्होंने इन ख़ूबसूरत अशआर में बयान किया।
सफ़र में मुश्किलें आएं तो जुरअत और बढ़ती है,
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है।
इसी तरह मंज़िल पाने के लिए लगातार कोशिश की ज़रूरत को वह यूं बयान करते हैं।
मंज़िल पे न पहुंचे उसे रस्ता नहीं कहते,
दो-चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते।
नवाज़ देवबंदी की शायरी की सबसे बड़ी ताक़त उसकी सादगी और असर है। उनका कलाम किसी एक तबक़े के लिए नहीं, बल्कि हर उम्र और हर सोच के इंसान के लिए है। यही वजह है कि उनके अशआर आज भी मुशायरों में ख़ूब दाद पाते हैं और सोशल मीडिया पर भी बार-बार साझा किए जाते हैं।
आज नवाज़ देवबंदी उर्दू अदब की उन अहम आवाज़ों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी क़लम से मोहब्बत, इंसानियत, उम्मीद और ज़िंदगी के ख़ूबसूरत एहसासात को नई पहचान दी। उनकी शायरी आने वाली नस्लों के लिए भी उतनी ही मायने रखती है, जितनी अपने दौर में रखती थी। उनके अशआर यह एहसास दिलाते हैं कि सच्ची शायरी वही है जो दिल को छू ले, इंसान को सोचने पर मजबूर कर दे और ज़िंदगी को बेहतर बनाने का हौसला दे।
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