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ढाका की मलमल: चांदनी की चादर जो अंगूठी से गुज़र जाती थी

सोचिए एक ऐसी साड़ी जो उंगली की अंगूठी से गुज़र जाए या माचिस की डिब्बी में समा जाए। ये कोई कहानी नहीं, बल्कि हकीकत थी ढाका की मलमल (Dhaka muslin) की। ये वो कपड़ा था जिसे देखकर यकीन नहीं होता था कि ये असली है। इतना महीन, इतना हल्का कि शरीर पर ऐसा लगता मानो बदन पर बस पानी लगा हो। 14वीं सदी के महान शायर अमीर खुसरो ने इसके बारे में क्या खूब कहा था- “इसका सौ गज़ कपड़ा सुई की नाक से गुजर सकता है, इतनी महीन है इसकी बनावट… ये इतना शफ़ाफ़ और हल्का है कि ऐसा लगता है जैसे इंसान ने कोई कपड़ा नहीं पहना, बल्कि बदन पर सिर्फ पानी मल लिया हो।”

ढाका मलमल (Image-Wikipedia)

ढाका मलमल की ख़ासियत क्या थी?

ढाका मलमल की ख़ासियत उसकी बेमिसाल महीनता में थी। इसके धागों की गिनती 800 से 1200 तक होती थी, जो आज के किसी भी सूती कपड़े से कई गुना ज़्यादा है। इस कमाल के कपड़े का राज़ था एक नायाब कपास की झाड़ी- फूटी कार्पास। ये सिर्फ मेघना नदी के किनारे पाई जाती थी। इसके रेशे इतने बारीक थे कि इन्हें हाथ से कातना भी आसान नहीं था। बुनकर सुबह की नमी में कातते थे ताकि धागा टूटे नहीं। रात को तेल के दीये की रोशनी में, बिना देखे, सिर्फ अपने हाथों के एहसास और तजुर्बे से ये कपड़ा बुना जाता था। इतना नाज़ुक था कि तेज़ हवा का झोंका भी इसे बर्बाद कर सकता था। एक साड़ी बनाने में कई महीने, कभी कभी पूरा साल लग जाता था।

ये कपड़ा ‘शबनम’ ओस की तरह चमकता था, ‘नयनसुख’ आंखों को भाता था और ‘सीरबंद’ पगड़ी के लिए इस्तेमाल होता था। 1747 में अकेले ढाका से मलमल का निर्यात 28.5 लाख रुपये का था। यूरोपीय कंपनियों ने ढाका में अपनी फैक्ट्रियां खोलीं। डच (1663), अंग्रेज़ (1669), फ्रांसीसी (1682)।

ढाका मलमल (Image-Wikipedia)

बादशाहों और रानियों का पसंदीदा

मुगल दरबार में ये कपड़ा इज़्ज़त की निशानी था। बादशाह, शाही परिवार और अमीर लोग इसे पहनकर अपना रुतबा दिखाते थे। बादशाह औरंगज़ेब के बारे में एक किस्सा मशहूर है- उन्होंने अपनी बेटी ज़ेबुन्निसा को नामुनासिब कपड़े पहनने पर डांटा। राजकुमारी ने जवाब दिया कि वो मलमल की सात परतें पहने हुए हैं। इतनी महीन थी ये चादर।

जल्द ही इसकी शोहरत हिंदुस्तान की सरहदों से बाहर भी फैल गई। अंग्रेज़ व्यापारी इसे यूरोप ले गए। वहां की रानियों और अमीरों को ये इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे ‘बुनी हुई चांदनी’ का नाम दिया। 18वीं सदी तक मलमल भारत के सबसे कीमती निर्यातों में से एक थी। यूरोप में ये ‘बुना हुआ चांदनी’ कहलाता था और मैरी एंटोनेट, जोसेफिन बोनापार्ट और जेन ऑस्टेन इसे पहनती थीं। इतनी कीमती थी कि एक गज मलमल की कीमत आज के हिसाब से लगभग 70,000 पाउंड तक पहुंच जाती थी।


ढाका मलमल (Image-Wikipedia)

कैसे ख़त्म हो गई ये कारीगरी?

जब अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान पर कब्जा किया तो मलमल का मुकद्दर बदल गया। मशीनों से बना अंग्रेज़ी कपड़ा सस्ता और जल्दी बनने वाला था। मांग कम हुई तो हुनरमंद बुनकर बेरोज़गार हो गए। कहा जाता है कि कुछ के अंगूठे काट लिए गए, हालांकि इतिहासकार अब तक इस बात पर शक करते हैं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये उद्योग बर्बाद हो गया, हुनर ख़त्म हो गया, और नायाब फूटी कार्पास कपास भी खत्म हो गई।

ढाका मलमल (Image-Wikipedia)

अब क्या बचा है?

20वीं सदी की शुरूआत तक असली मलमल नाम को नहीं रही। लंदन और कोलकाता के म्यूज़ियम में इसके कुछ नमूने बचे हैं। सालों की रिसर्च के बाद, 2020 में बांग्लादेशी रिसर्चर्स ने इसके क़रीब एक कपड़ा दोबारा बनाने में कामयाबी पाई। लेकिन वो उस क़दर की महीनता और उस एहसास को शायद ही छू पाए।

ढाका मलमल (Image-Wikipedia)

ये कहानी क्यों ज़रूरी है?

ढाका की मलमल सिर्फ एक कपड़ा नहीं थी, ये हुनर, सब्र और मुहब्बत की निशानी थी। ये हमें सिखाती है कि जब हम अपनी जड़ों से कटते हैं, तो कितना कुछ खो देते हैं। ये वो कपड़ा था जिसमें एक पूरी सभ्यता की कारीगरी समाई थी। अगर हमने उसे बचा लिया होता, तो आज पूरी दुनिया को हम अपना हुनर दिखा सकते थे। ये सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि हमारी पहचान थी। और आज जब हम इसके बचे नमूनों को म्यूज़ियम में देखते हैं, तो ये हमें याद दिलाता है- हमने वो कीमती हीरा खो दिया, जो हमारी ही मिट्टी का था।

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