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Bharole (भड़ोले) की महक: पंजाब की मिट्टी और लोक कला की कहानी

पंजाब की मिट्टी और वहां के लोगों का रिश्ता हमेशा से बहुत गहरा रहा है। पुराने ज़माने में पंजाब के गांवों की ज़िंदगी कुदरत के बेहद करीब थी। घरों की दीवारों से लेकर रसोई के सामान तक, हर चीज़ में मिट्टी की ख़ूबसूरती और हुनर दिखाई देता था। ये सिर्फ़ सजावट नहीं थी, बल्कि पंजाबी औरतों की मेहनत, सलीका और अपने घर-परिवार के लिए मोहब्बत का भी इज़हार था।

जब लोहे के ड्रम और स्टील के डिब्बे आम नहीं थे, तब गेहूं, मक्का और दाल जैसे अनाज को संभालकर रखने के लिए बड़े-बड़े मिट्टी के Bharole (भड़ोले) बनाए जाते थे। इन्हें ज़्यादातर घर के अंदर या रसोई के पास रखा जाता था, ताकि अनाज नमी, कीड़ों और दूसरे नुकसान से महफूज़ रह सके।

इसी रिवायत की एक ख़ूबसूरत मिसाल था भड़ोला

Bharole (भड़ोले) बनाना कोई आसान काम नहीं था। इसके लिए हुनर, सब्र और कड़ी मेहनत की ज़रूरत पड़ती थी। पंजाबी औरतें चिकनी मिट्टी, भूसे और कई बार गोबर को मिलाकर एक गाढ़ा मिश्रण तैयार करती थी। भूसा Bharole (भड़ोले) को मज़बूती देता था और सूखने के बाद उसमें दरारें पड़ने से बचाता था।

Bharole (भड़ोले) एक ही बार में नहीं बनाया जाता था। इसे परत-दर-परत तैयार किया जाता था। पहले एक परत बनाई जाती, उसे अच्छी तरह सूखने दिया जाता और फिर उसके ऊपर दूसरी परत चढ़ाई जाती। इसी तरह धीरे-धीरे पूरा Bharole (भड़ोले) आकार लेता था। इस तरीके से बना Bharole (भड़ोले) मज़बूत भी होता था और लंबे समय तक चलता था।

लेकिन Bharole (भड़ोले) की ख़ासियत सिर्फ़ उसकी मज़बूती नहीं थी। जब मिट्टी थोड़ी गीली होती थी, तब औरतें अपनी उंगलियों की मदद से उस पर ख़ूबसूरत नक़्क़ाशी और डिज़ाइन बनाती थी। त्रिकोण, गोल आकृतियां और कई तरह के जियोमेट्रिक पैटर्न उसकी सतह पर उभर आते थे। ये डिज़ाइन सिर्फ़ सजावट नहीं थे, बल्कि पंजाब की लोक कला और औरतों के हुनर की एक ख़ूबसूरत पहचान थे।

Pic Credit: Wikipedia

भड़ोलों पर पक्षियों की आकृतियां क्यों बनाई जाती थी?

Bharole (भड़ोले) पर की गई नक़्क़ाशी में अक्सर मोर, कबूतर, तोता, फूल और बेल-बूटों की आकृतियां बनाई जाती थी। ये सिर्फ़ सजावट नहीं थी, बल्कि खुशहाली, बरकत और अच्छे दिनों की निशानी मानी जाती थी। जब Bharole (भड़ोले) पूरी तरह सूख जाता था, तो उस पर सफेद मिट्टी की एक परत चढ़ाई जाती थी। इससे उस पर बनी नक़्क़ाशी और डिज़ाइन और भी साफ़ और ख़ूबसूरत दिखाई देते थे।

बुज़ुर्ग बताते हैं कि मिट्टी की ये कला सिर्फ़ Bharole (भड़ोले) तक सीमित नहीं थी। उस दौर में घर की कई ज़रूरी चीज़ें मिट्टी से बनाई जाती थी। दूध रखने और उससे बने सामान तैयार करने के बर्तन, सजावटी चूल्हे, ठंडा पानी रखने के घड़े और दही जमाने के बर्तन भी मिट्टी से ही तैयार किए जाते थे। इतना ही नहीं, रसोई की दीवारों और फर्श पर भी समय-समय पर सफेद मिट्टी का लेप किया जाता था। इससे रसोई साफ-सुथरी दिखती थी और उसकी ख़ूबसूरती भी बढ़ जाती थी।

भड़ोला सिर्फ़ परंपरा नहीं, समझदारी का भी नमूना था

Bharole (भड़ोले) सिर्फ़ पंजाब की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक समझदारी भरा तरीका भी छिपा था। मिट्टी में ऐसी ख़ासियत होती है कि वो तापमान और नमी को बैलेंस रखने में मदद करती है। इसी वजह से भड़ोले में रखा अनाज लंबे समय तक सुरक्षित और इस्तेमाल के लायक बना रहता था। आज के आधुनिक स्टोरेज सिस्टम और संरक्षण तकनीकों के आने से बहुत पहले, भड़ोले नेचुरल तरीके से अनाज को संभालकर रखने का काम करते थे।

सिर्फ़ इस्तेमाल के लिहाज़ से ही नहीं, बल्कि समाज और रिवायतों में भी भड़ोले की ख़ास अहमियत थी। अनाज से भरा हुआ भड़ोला घर की खुशहाली और बरकत की निशानी माना जाता था। लोगों का मानना था कि जिस घर का भड़ोला भरा रहता है, वहां कभी तंगी और कमी नहीं आती।

Pic Credit: The Better India

धीरे-धीरे खोती जा रही एक विरासत

आज पंजाब के गांवों की तस्वीर पहले जैसी नहीं रही। मिट्टी के घरों की जगह अब पक्के मकानों ने ले ली है। वहीं लोहे और प्लास्टिक के आधुनिक स्टोरेज सिस्टम आने के बाद रंग-बिरंगे मिट्टी के भड़ोले भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से लगभग गायब हो गए हैं। नई पीढ़ी के बहुत से बच्चों और युवाओं ने शायद भड़ोला कभी देखा भी नहीं होगा। जो कभी हर घर का अहम हिस्सा हुआ करता था, वो आज सिर्फ़ पुरानी तस्वीरों, बुज़ुर्गों की यादों और कुछ संग्रहालयों तक सिमट कर रह गया है। इसके साथ ही पंजाब की लोक कला, गांवों की सादगी और मिट्टी से जुड़ी एक खूबसूरत रिवायत भी धीरे-धीरे ओझल होती जा रही है।

अपनी जड़ों की ओर लौटने का वक़्त

एक समय था जब मिट्टी की कला पंजाब की ज़िंदगी का अहम हिस्सा हुआ करती थी। ये सादगी, कुदरत से जुड़ाव और टिकाऊ जीवनशैली की पहचान थी। वक्त के साथ लोगों के रहने-सहने के तरीके बदल गए, लेकिन हाथों से गढ़ी गई मिट्टी की गर्माहट और उस पर की गई नक़्क़ाशी की ख़ूबसूरती को मशीनें आज भी पूरी तरह नहीं दोहरा सकती। हो सकता है कि Bharole (भड़ोले) अब अनाज रखने के लिए दोबारा इस्तेमाल न हों, लेकिन वो हमारी यादों, हमारी पहचान और हमारी सांस्कृतिक विरासत के रूप में फिर से लौट सकते हैं।

आज जब लोग अपने घरों में पारंपरिक डिज़ाइन और विरासत से जुड़ी चीज़ों को जगह दे रहे हैं, तब Bharole (भड़ोले) जैसी मिट्टी की कलाकृतियां भी एक बार फिर पंजाबी घरों का हिस्सा बन सकती हैं। वो हमें याद दिलाती हैं कि पंजाब में मिट्टी सिर्फ़ एक चीज़ नहीं थी, बल्कि लोगों के हाथों से गढ़ी गई एक पूरी तहज़ीब और संस्कृति थी।

स्टोरी– गुरप्रीत सिंह

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

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