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Shraddha Agarwal: सुन नहीं सकती थीं, अब Sign Language से बच्चों को सिखा रहीं अंग्रेज़ी

हम सब के लिए स्कूल एक ऐसी जगह होती है, जहां हम सीखते हैं, दोस्त बनाते हैं और अपने सपनों की शुरुआत करते हैं। लेकिन सोचिए, अगर क्लास में टीचर की बात ही समझ न आए, तो क्या होगा? Shraddha Agarwal की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। लेकिन उन्होंने इस मुश्किल को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया, बल्कि इसे अपनी ताक़त बना लिया। आज वही लड़की, जो कभी क्लास में अकेला महसूस करती थी, एक ऐसा प्लेटफार्म बना चुकी है, जो लाखों बच्चों की ज़िंदगी बदल सकता है – SignSetu।

बचपन की ख़ामोश जद्दोजहद

Shraddha Agarwal का बचपन चेन्नई के एक क्लासरूम में गुज़रा, लेकिन ये क्लासरूम उनके लिए बाकी बच्चों जैसा नहीं था। हर दिन उनके लिए एक नई मुश्किल लेकर आता था। वो सुन नहीं सकती थीं इसलिए टीचर की बात समझना उनके लिए आसान नहीं था। वो टीचर के होंठों को ध्यान से देखती थी, ताकि समझ सकें कि क्या पढ़ाया जा रहा है। कई बार “doctor” और “daughter” जैसे शब्द उन्हें एक जैसे लगते थे, क्योंकि दोनों होंठों से एक जैसे दिखते थे।

क्लास खत्म होने के बाद वो अपने दोस्तों के पास जाती और पूछती कि आज क्या पढ़ाया गया। फिर जल्दी-जल्दी नोट्स लिखती। दिन के आखिर तक वो बहुत थक जाती थी। जब बाकी बच्चे अपना होमवर्क शुरू कर देते थे, तब तक श्रद्धा सुबह की पढ़ाई को समझने की कोशिश ही कर रही होती थी। ये रोज़ की कहानी थी थकान, उलझन और एक गहरी ख़ामोशी।

स्कूल में अकेलापन और मुश्किलें

Shraddha Agarwal ने अपनी शुरुआती पढ़ाई एक ऐसे स्कूल से की, जहां साइन लैंग्वेज में पढ़ाया जाता था। वहां उन्हें समझने में आसानी होती थी, क्योंकि वो उनकी अपनी भाषा थी। लेकिन जब उन्होंने मेनस्ट्रीम स्कूल में एडमिशन लिया, तो सब कुछ बदल गया। वहां पढ़ाई सिर्फ बोलकर होती थी। टीचर अक्सर ब्लैकबोर्ड की तरफ मुंह करके पढ़ाते थे। विज़ुअल मदद बहुत कम होती थी। ऐसे माहौल में पढ़ना Shraddha Agarwal के लिए बहुत मुश्किल था।

वो Lip-Reading और दोस्तों के नोट्स के सहारे पढ़ाई करती रहीं, लेकिन यो तरीका पूरा नहीं था। सबसे ज़्यादा मुश्किल था अकेलापन। क्लास में सब बात करते थे, हंसते थे, लेकिन Shraddha Agarwal उस बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाती थी। उन्हें लगता था जैसे वह भीड़ में होते हुए भी अकेली हैं।

मेहनत से मिली कामयाबी

इन सब मुश्किलों के बावजूद Shraddha Agarwal ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने सपनों को ज़िंदा रखा और आगे बढ़ती रही। उन्होंने 2018 में Stella Maris College से कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 2019 में University of Warwick से एंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स किया। ये सफ़र आसान नहीं था। उन्हें हर चीज़ समझने में दूसरों से ज़्यादा वक्त लगता था। लेकिन उन्होंने दोगुनी मेहनत की और अपने लक्ष्य हासिल किए। उनकी कहानी बताती है कि अगर इरादा मज़बूत हो, तो मुश्किल रास्ते भी आसान हो जाते हैं।

परेशानी से पैदा हुआ हल – SignSetu

श्रद्धा ने अपनी पढ़ाई के दौरान एक बड़ी बात समझी। उन्होंने देखा कि उनके जैसे बहुत से बच्चे हैं, जो सुन नहीं सकते और पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं। भारत में लाखों ऐसे बच्चे हैं, जो 12वीं तक पढ़ने के बाद भी ठीक से पढ़ और लिख नहीं पाते। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि उन्हें उनकी अपनी भाषा, यानी साइन लैंग्वेज में पढ़ाया ही नहीं जाता। स्कूलों में बहुत कम टीचर होते हैं जो साइन लैंग्वेज जानते हो। ऐसे में ये बच्चे क्लास में पीछे रह जाते हैं और उनका आत्मविश्वास भी कम हो जाता है।

श्रद्धा ने सोचा कि इस समस्या का कोई हल होना चाहिए। उन्होंने देखा कि जो लर्निंग ऐप्स बाज़ार में हैं, वो सुनने में असमर्थ बच्चों के लिए नहीं बने हैं। इसी सोच से उन्होंने SignSetu शुरू किया। SignSetu एक ऐसा प्लेटफार्म है, जो साइन लैंग्वेज के ज़रिए अंग्रेज़ी सिखाता है। ये बच्चों को उनकी अपनी भाषा से सीखने का मौक़ा देता है।

सीखने का आसान और मज़ेदार तरीका

SignSetu का तरीका बहुत आसान और दिलचस्प है। हर लेसन करीब 15 मिनट का होता है। इसमें बच्चों को तस्वीरें, साइन लैंग्वेज वीडियो और अंग्रेज़ी शब्द एक साथ दिखाए जाते हैं। पहले बच्चों को शब्द सिखाए जाते हैं, फिर उन्हें प्रैक्टिस कराई जाती है और बाद में कहानियों के ज़रिए वाक्य बनाना सिखाया जाता है। इसमें गेम जैसे फीचर्स भी हैं- पॉइंट्स, बैज और इनाम। इससे बच्चों को पढ़ाई में मज़ा आता है। यहां बच्चों की स्पीड नहीं, बल्कि उनकी समझ को अहमियत दी जाती है।

2024 में SignSetu ने चेन्नई के स्कूलों में 15 दिन का एक ट्रायल किया। बच्चों ने रोज़ सिर्फ 15 मिनट इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। ट्रायल के बाद पता चला कि बच्चों को याद रखने की क्षमता 50 से 75% तक बढ़ गई। टीचर्स ने भी देखा कि बच्चे अब ज़्यादा एक्टिव हो गए हैं। वो जवाब देने लगे हैं और क्लास में हिस्सा लेने लगे हैं। ये बदलाव बच्चों के आत्मविश्वास में भी साफ दिखा।

मिला सम्मान और पहचान

SignSetu को 2025 में Youth Co: Lab India Award मिला। इसके अलावा इसे कई संस्थाओं से फंडिंग और सम्मान भी मिला। International Purple Fest में भी श्रद्धा को अपने स्टार्टअप को पेश करने का मौक़ा मिला। इन सब से ये साबित हुआ कि उनका काम सही दिशा में है। Shraddha Agarwal एक अहम सोच पर काम करती हैं—“Nothing about us without us।” इसका मतलब है कि किसी भी समुदाय के बारे में फैसला उसी की भागीदारी से होना चाहिए। इसलिए SignSetu की टीम में ऐसे लोग भी हैं, जो खुद सुन नहीं सकते। वो अपने अनुभव से इस प्लेटफार्म को बेहतर बनाते हैं।

चुनौतियां अभी बाकी हैं

SignSetu अब स्कूलों और सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहता है। इसका मक़सद है कि ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक ये प्लेटफॉर्म पहुंचे। सरकार भी साइन लैंग्वेज को पढ़ाई में शामिल करने की कोशिश कर रही है। अगर ये बदलाव सही तरीके से लागू हुए, तो लाखों बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है। भारत में अभी भी बहुत से स्कूलों में साइन लैंग्वेज जानने वाले टीचर नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। SignSetu को पूरे देश में फैलाने के लिए समय और सहयोग दोनों की ज़रूरत होगी

Shraddha Agarwal की कहानी सिर्फ एक लड़की की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह एक उम्मीद है। वह बच्ची, जो कभी क्लास में खुद को अकेला महसूस करती थी, आज लाखों बच्चों के लिए रास्ता बना रही है। उन्होंने अपनी मुश्किलों को अपनी ताकत बना लिया। SignSetu एक ऐसा पुल है, जो खामोशी और सीखने के बीच की दूरी को कम कर रहा है। यह हमें सिखाता है कि अगर हम किसी समस्या को दिल से समझें, तो उसका हल ज़रूर निकाल सकते हैं।

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