कोई भी पहली बार में विजयगढ़ किला (Vijaygarh Fort) को अपनी ट्रेवल लिस्ट में नहीं रखता। इसका नाम आप तक धीमे-धीमे पहुंचता है। किसी पुरानी Travel Diary के पन्ने से, किसी नॉवेल की एक लाइन से, या किसी fellow traveler की ज़ुबानी, जो इसके टूटे हुए प्रवेश द्वारों (Entrances) के सामने खड़ा हुआ और कुछ ऐसा महसूस किया जिसे वो शब्दों में नहीं बांध सका।
आप यहां चौड़े राजमार्गों और रंग-बिरंगे साइनबोर्ड के सहारे नहीं पहुंचते। यहां का रास्ता धीरे-धीरे संकरा होता जाता है, पेड़ आपके करीब आ जाते हैं, और शोर धीरे-धीरे हल्का होकर खत्म हो जाता है। ये किला किसी चमकते-दमकते स्मारक की तरह अपना तआरुफ़ नहीं देता। ये कुछ हिचकिचाता हुआ सा नजर आता है, जैसे उसे अपने अस्तित्व पर ही पूरा यकीन न हो। इसकी प्राचीरें लताओं में आधी डूबी हैं, इसके पत्थर मौसम की मार से ढीले पड़ चुके हैं, फिर भी इसकी मुद्रा इतनी मज़बूत है मानो उसने अभी ये तय नहीं किया है कि अपने विनाश को स्वीकार करना है या नहीं। इसको लेकर एक बहुत ही फेमस सीरियल चंद्रकांता (Famous serial Chandrakanta) भी डीडी नेशनल पर पेश किया जा चुका है।
कहां है विजयगढ़ किला
विजयगढ़ किला उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले, चतरा ब्लॉक के मऊ कलां गांव में मौजूद स्थित है। रॉबर्ट्सगंज से लगभग तीस किलोमीटर साउथ-ईस्ट में, ढांड्राउल बांध के पास, कैमूर पर्वतमाला की पहाड़ियों से सटा ये किला वाराणसी से करीब एक सौ पांच किलोमीटर दूर है, जहां सड़क मार्ग के बाद थोड़ी पैदल यात्रा भी करनी पड़ती है।
इसके बनाने वालों ने ये ज़मीन संयोग से नहीं चुनी थी। आसपास की पहाड़ियां एक नैचुरल सेफ्टी लाइन है। घने जंगलों ने छुपने और आगे बढ़ती सेनाओं के खिलाफ सामरिक बढ़त दोनों प्रदान किए। किले की दीवारों के पास बने जलाशयों ने घेराबंदी के समय सैनिकों के लिए और तपती गर्मी के महीनों में यात्रियों व तीर्थयात्रियों के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की। आज भी इसके टूटे आंगनों में राजसी इरादों, सैन्य योजनाओं और अंग्रेज अधिकारियों के लिखे किस्सों की खामोश गूंज सुनाई देती है।

कहानियों और पत्थरों की नींव
हर पुराने किले की एक कहानी होती है। विजयगढ़ की कहानी महाकाव्यों के ज़माने से जुड़ती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि ये पहाड़ी महाभारत काल के किसी राजा से जुड़ी है। ये परंपरा है या इतिहास, इसे विद्वान चुपचाप बहस का विषय बनाए रखते हैं। पहाड़ी अपना राज़ खुद रखती है।
ज़मीन पर मिले सबूत बताते हैं कि शुरुआती मध्यकाल में यहां आदिवासी सरदार और छोटे राजा बसे। उन्होंने इस ऊंचाई को चुना और इसे रास्तों, नदियों, अनाज और सेना की आवाजाही पर नजर रखने वाली चौकी बना दिया। करीब चौदह-पंद्रह सदियों से यहां के बिखरे पत्थर कई भाषाएं और कई नाम सुन चुके हैं।
इस किले का नाम एक राजपूत शासक विजय पाल से जुड़ा है। माना जाता है कि ग्यारहवीं सदी के आसपास उन्होंने इस किले को नए सिरे से बनवाया या बड़ा विस्तार कराया। उन्होंने इसे विजय का किला कहा। आज जब हम इसके खंडहरों के बीच खड़े होते हैं, तो ये नाम अजीब लगता है। लेकिन ये नाम कभी हकीकत का बयान नहीं था। यह इरादे का ऐलान था – एक जिद कि यह चट्टान और यह ऊंचाई ताकत की निशानी बनी रहेगी।
रणनीति के लिए दीवारों, पानी और घुमावदार रास्तों की चाल
किले के निर्माता सीधी रेखाओं में नहीं सोचते थे। यहां के रास्ते सीधे चढ़ने के बजाय मुड़ते और पलटते हैं, जिससे दुश्मन को धीमा होने, फैलने और अपने आप को उजागर करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। दरवाजों को इस तरह रखा गया था कि हमलावरों को सीधी नज़र न मिले। अंदर के क्षेत्र तब तक छिपे रहते थे जब तक सामने न पहुंच जाया जाए। दीवारों की मोटाई किसी सजावट की नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानी कहती है जिन्होंने शायद पिछली हारों से सीखा था कि जीवित रहना बल पर उतना ही निर्भर करता है जितना कि छुपने की कला पर।
पानी को पत्थरों की तरह ही गंभीरता से लिया गया था। किले के पास मौजूद रामसागर जैसे तालाब डेली यूज़ और उन दिनों के लिए पानी संचित करते थे जब द्वार बाहरी ख़तरों के खिलाफ बंद रहते थे। हर बूंद योजना का हिस्सा थी। उस काल के हर किले में ये दूरदर्शिता आम नहीं थी। ये विजयगढ़ को एक ऐसी संरचना के रूप में marked करता है जिसे केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए डिज़ाइन किया गया था।

जैसे-जैसे पवित्र नदी के किनारे बसे प्राचीन शहर से जुड़े क्षेत्रीय राजाओं का प्रभाव बढ़ा, किला एक सैन्य संरचना से व्यापक जागीरों और चौकियों के नेटवर्क का एक हिस्सा बन गया। मुगल सत्ता जब पूरे मानचित्र पर फैल रही थी, किले ने खुद को ढाल लिया। उसने प्रतिनिधियों को जगह दी, एक मैनेज्ड चौकी के रूप में सेवा दी, और अपनी पत्थर की पहचान के मूल भार को खोए बिना इतना झुक गया कि उपयोगी बना रह सके।
धीमी आवाज में लड़े गए युद्ध
विजयगढ़ की लड़ाइयां वे नहीं हैं जो इतिहास की किताबों के पन्ने भरती हैं। ये लड़ाइयां धीमी आवाज में सांस लेती हैं। जंगली ढलानों पर छोटी झड़पें, चुप्पी में की गई रोकथाम, पीढ़ियों तक चले गठजोड़ और टूटते रिश्ते। उन सदियों में जब उत्तर और मध्य भारत में क्षेत्रीय ताकतों और उत्तर-पश्चिम से आने वाली फौजों के बीच बार-बार टकराव होते थे, इतनी ऊंचाई पर एक किला होने का मतलब था उन रास्तों पर काबू रखना जिनसे सेना भी गुजरती थी और रसद भी जाती थी। स्थानीय परंपरा विजयगढ़ को तुर्क और अफगान अभियानों से जोड़ती है, हालांकि उन टकरावों के रिकॉर्ड बहुत कम मिलते हैं।
बाद में काशी नरेश बलवंत सिंह और चेत सिंह जैसे नाम इस किले के इतिहास से जुड़े। जब चेत सिंह का अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध ढह गया, तो जागीरों के बंटवारे ने सीधे विजयगढ़ को प्रभावित किया। अधिकार अब पुराने जमींदार परिवारों और नए राजनीतिक मालिकों के बीच बंट गया। किला किसी एक यादगार घेरे में नहीं गिरा। ये धीरे-धीरे पीढ़ियों में अपनी ताकत खोता गया, जब तक कि उसकी दीवारों से दिया गया आख़िरी आदेश खामोशी में नहीं डूब गया।
चंद्रकांता और कल्पना का किला
इसका काल्पनिक जीवन (Fantasy life) पूरी आव़ाज में बोलता है। उन्नीसवीं सदी के एक हिंदी उपन्यासकार ने विजयगढ़ को एक रोमांच-प्रेम कहानी के सेंटर में रखा। इस कहानी में तिलिस्म थे, छुपे रास्ते थे, बहादुर योद्धा थे और एक राजकुमारी थी जिसका नाम था चंद्रकांता। किताब छपने के बाद भी लंबे वक्त तक लोगों की यादों में बसा रहा। उस उपन्यास ने इस किले को एक इमोशनल हकीकत दी, जो कोई युद्ध का नक्शा नहीं दे सकता था। जिन रीडर्स ने कभी इसकी दीवारें नहीं देखी थीं, वे भी इसे वफादारी, धोखे और प्रेम की background के रूप में पेंट करने लगे।

इसका असर आज भी जारी है। लोकल गाइड कुछ कोनों की ओर इशारा करके ज़मीनी सुरंगों और जादुई प्लेस की बात करते हैं, जो असल ज़मीन के बजाय उपन्यास से ली गई हैं। इस क्षेत्र में पर्यटन योजनाकार चंद्रकांता सर्किट बनाने की बात करते हैं, जिसमें विजयगढ़ केंद्र में होगा। यात्री उस कहानी के असली स्थान पर आएंगे जिसने कभी एक पूरी पीढ़ी को रात भर जगाए रखा। अभिलेख और कल्पना (Records and imagery) यहां इस कदर घुल-मिल गए हैं कि अलग करना मुश्किल है। और इस मिक्सअप ने किले को दूसरी तरह की प्रसिद्धि दी है,जो युद्ध में जीत से नहीं, बल्कि एक अच्छी कहानी की ताकत से बनी है।
विजयगढ़ किले पर फोकस करना
इस किले ने महाकाव्य परंपरा देखी, आदिवासी बस्तियां देखीं, राजपूत महत्वाकांक्षा देखी, क्षेत्रीय राजशाही देखी, मुगल प्रशासन देखा, अंग्रेजों के राजस्व रिकॉर्ड देखे, तीर्थयात्रा के रास्ते देखे और एक शानदार नॉवेल के पन्ने देखे। ये उनमें से किसी एक का नहीं है। यही इसकी सबसे ईमानदार पहचान है। इस तरह की जगहें हर उस नाम को पीछे छोड़ देती हैं जो हम उन पर चस्पा करते हैं। और वे खड़ी रहती हैं, चुपचाप, बिना किसी रस्म के उन उद्देश्यों के खत्म हो जाने के बाद भी लंबे वक्त तक, जिनके लिए उन्हें बनाया गया था।
तो अगली बार जब आप सोनभद्र की ओर जाएं, तो थोड़ा और आगे बढ़ें। मऊ कलां गांव में उस पहाड़ी की तलाश करें जहां पेड़ों ने दीवारों को गले लगा रखा है। वहां खड़े होकर सुनें। शायद आपको सिर्फ हवा की आवाज सुनाई दे। शायद कुछ और। विजयगढ़ अपना राज खुद बताएगा, अगर आपके पास सुनने का धैर्य है।
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