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इब्न-ए-इंशा: उर्दू ज़बान को नई रुह और नया लहज़ा बख़्शने वाले मुतअल्लिम फ़लसफ़ी

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने लफ़्ज़ों की सादगी, सोच की गहराई और अंदाज़-ए-बयां की नर्मी से हमेशा के लिए दिलों में जगह बना लेते हैं। इब्न-ए-इंशा ऐसा ही एक नाम है वो शख़्स जिसने उर्दू ज़बान को एक नई रुह दी, एक नया लहजा बख़्शा। वो शायर भी थे, नज़्म नवीस भी, हाज़िर जवाब व्यंग्यकार भी और एक मुतअल्लिम फ़लसफ़ी भी। उनकी लेखनी में हंसी भी थी और हक़ीक़त का दर्द भी, हल्के से तंज़ में भी गहरी सोच छिपी रहती थी। इब्न-ए-इंशा ने ये साबित किया कि अदब का मक़सद सिर्फ़ इल्म या तफ़रीह नहीं, बल्कि इंसान की रुह को छूना है। उनकी शख़्सियत में हंसी और हिक़मत का ऐसा मेल था जो आज भी उर्दू अदब को ज़िंदा रखे हुए है।

आग़ाज़-ए-ज़िंदगी और तालीमी सफ़र

इब्न-ए-इंशा का असली नाम शेर मोहम्मद ख़ान था। 15 जून 1927 को पंजाब के ज़िला जालंधर के एक कस्बे फिल्लौर में उनकी पैदाइश हुई। बचपन से ही उनमें इल्म और अदब की ललक थी। तालीम पूरी करने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से उर्दू में एमए किया। इसी दौरान उन्होंने लिखने की शुरुआत की और जल्द ही उर्दू अदब के अफ़क़ार में उनका नाम चमकने लगा।

‘कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा’

इब्न-ए-इंशा

तक़सीम-ए-हिंद के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जहां उन्होंने सरकारी मुलाज़मत के साथ-साथ लेखन का सिलसिला जारी रखा। उनकी तालीम और तजुर्बे ने उनके सोचने और लिखने के ढंग को वुसअत दी। इसलिए उनके मज़ामीन में सामाजिक शऊर, तहज़ीब और इंसानियत का तसव्वुर हमेशा साफ़ दिखाई देता है।

अदबी सफ़र और अंदाज़-ए-बयां

इब्न-ए-इंशा का अदबी सफ़र सरकारी नौकरी के साथ शुरू हुआ। वे यूनाइटेड नेशन के साथ भी वाबस्ता रहे और कई मुल्कों का दौरा किया। इन सफ़रों ने उनकी नज़र और तजुर्बे को एक नई गहराई दी।

‘इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें
हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा’

इब्न-ए-इंशा

उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी ख़ूबी ये थी कि वो सख़्त हक़ीक़तों को भी हंसी के लिबास में बयान करते थे। उनका हर मज़मून, हर सफ़ह, हर जुमला-ज़िंदगी की सादगी और इंसान की मासूमियत से भरा होता था। वे अपनी बात को इतना सहज बनाकर कहते थे कि मुश्किल बातें भी दिल में उतर जाती थीं। यही वजह है कि उनका हर लफ़्ज़ आज भी एक मुस्कुराती सीख बनकर याद किया जाता है।

हास्य और तंज़ की नई रवायत

इब्न-ए-इंशा को उर्दू का सबसे नफ़ीस हास्य और व्यंग्य लेखक माना जाता है। उनका तंज़ तल्ख़ नहीं होता था; वो मोहब्बत में लिपटा हुआ आईना होता था  जो समाज को दिखाता तो है, मगर चुभता नहीं। उनके अफ़सानों और मज़ामीन में तंज़ और तबस्सुम का ऐसा तालमेल मिलता है कि पाठक हंसते-हंसते सोचने लगता है। वो अक्सर कहा करते थे कि “हंसी एक ज़रिया है, जिससे ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें भी आसान लगने लगती हैं।” उनके लेखों में यही फ़लसफ़ा झलकता है कि समाज की कमज़ोरियों को समझाने के लिए तलवार नहीं, मुस्कान काफ़ी है।

सफ़रनामा: हंसी में लिपटी दुनिया की तस्वीर

इब्न-ए-इंशा का सफ़रनामा उर्दू अदब का एक नया दरवाज़ा खोलता है। उन्होंने दुनिया के कई मुल्कों की सैर की और हर जगह की तहज़ीब, आदतों, और लोगों की फ़ितरत को हास्य और हिकमत के संगम में पिरोया। उनकी किताबें जैसे “आवारा गर्द की डायरी” और “दुनिया गोल है” सिर्फ़ सफ़र का बयान नहीं, बल्कि ज़िंदगी को देखने का अंदाज़ हैं। वो अपने हर तजुर्बे में इंसान को तलाशते हैं। उनके सफ़रनामे में न कोई दिखावा है, न बनावट, बस एक सच्ची नज़र और एक शफ़क़त भरा दिल। इसलिए जब हम उन्हें पढ़ते हैं, तो सिर्फ़ दुनिया नहीं घूमते, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को भी पहचानते हैं।

रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती’

इब्न-ए-इंशा

शायरी की दुनिया में इंशा

इब्न-ए-इंशा सिर्फ़ व्यंग्यकार नहीं, बल्कि एक दर्दमंद शायर भी थे। उनकी शायरी में इश्क़ भी है, जुदाई भी, तन्हाई भी है और उम्मीद भी। उनके अशआर आम ज़बान में होते, मगर असर दिल के सबसे गहरे कोनों तक पहुंचता। उनकी शायरी का रंग रूमानी होते हुए भी दार्शनिक था। वो इश्क़ को महज़ जज़्बा नहीं, बल्कि इंसान की रूह की तलब मानते थे। उन्होंने उर्दू शायरी को शहरों और दरबारों से निकालकर आम ज़िंदगी में उतारा। ताकि हर इंसान उसमें खुद को देख सके।

अहम रचनाएं और असर

इब्न-ए-इंशा की मशहूर किताबें हैं। ‘उर्दू की आख़िरी किताब’, ‘खुमार-ए-ग़ालिब’, ‘दिल-ए-वहीशी’, ‘आवारा गर्द की डायरी’ और ‘दुनिया गोल है’। इन रचनाओं ने उर्दू अदब में नया तर्ज़-ए-बयां पैदा किया। ‘उर्दू की आख़िरी किताब’ में उन्होंने तालीम, समाज और सियासत पर ऐसा शरारती तंज़ किया जो आज भी उतना ही ताज़ा लगता है। उनकी किताबें हमें हंसाती भी हैं और सोचने पर मजबूर भी करती हैं। उन्होंने ये साबित किया कि अदब सिर्फ़ ख़ूबसूरती का नाम नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी का एहसास भी है  और लेखक का फ़र्ज़ है कि वो समाज की रूह को ज़िंदा रखे।

फ़िक्र, इंसानियत और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

इब्न-ए-इंशा के तसव्वुर में ‘इंसान’ हमेशा मरकज़ में रहा। उन्होंने किसी मज़हबी या सियासी हद को अपने अदब पर हावी नहीं होने दिया। उनके लेखों में हर जगह इंसानियत, बराबरी और मोहब्बत का पैग़ाम नज़र आता है। वो कहते थे कि ज़िंदगी को बहुत संजीदगी से नहीं, बल्कि समझदारी और तबस्सुम के साथ जीना चाहिए। उनकी तहरीरें सिखाती हैं कि तमीज़ और हंसी, दोनों मिलकर ज़िंदगी को आसान बना सकती हैं। इब्न-ए-इंशा कट्टर सोच के मुख़ालिफ़ थे और हमेशा खुले ज़हन, आज़ाद खयाल और रूहानी मोहब्बत के हामी रहे।

सियासत, पत्रकारिता और अवामी रिश्ता

इब्न-ए-इंशा ने रेडियो पाकिस्तान और कई अख़बारों में काम किया। उनकी आवाज़, उनका लहज़ा और उनका अंदाज़-ए-बयां सुनने वालों को अपनी तरफ़ खींच लेता था। उनका मानना था कि पत्रकारिता भी अदब की तरह इंसान की बेहतरी का ज़रिया हो सकती है। उन्होंने साबित किया कि तंज़ और तहरीर के ज़रिए भी समाज को आईना दिखाया जा सकता है वो भी बिना किसी तल्ख़ी के। उनकी बातें नसीहत की तरह नहीं, बल्कि दोस्त की तरह लगती थीं।  जो मुस्कुराते हुए सच्चाई बता जाता है।

आख़िरी सफ़र और विरासत

इब्न-ए-इंशा का ज़िंदगी का सफ़र बहुत लंबा नहीं रहा। 11 जनवरी 1978 को महज़ 50 साल की उम्र में वो इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। मगर उनका असर अब भी बाक़ी है  उनके अल्फ़ाज़ अब भी ज़िंदा हैं, उनकी सोच अब भी नई पीढ़ी के लिए रहनुमा है। उनकी तहरीरें पढ़ते हुए एहसास होता है कि उन्होंने हंसी को एक फ़लसफ़ा बना दिया था।  ऐसा फ़लसफ़ा जो इंसानियत, तमीज़ और मोहब्बत पर यक़ीन रखता है।

‘हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हां याद रहेगा’

इब्न-ए-इंशा

ये भी पढ़ें: शकेब जलाली: जिनकी ज़िन्दगी अधूरी ग़ज़ल थी लेकिन लफ़्ज़ एहसास बनकर उतरे 

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