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हकीम मोमिन ख़ां मोमिन: उर्दू ग़ज़ल का नूर और शायराना जौहर

हकीम मोमिन ख़ां मोमिन उर्दू के उन चंद बाक़माल शायरों में से हैं, जिनकी बदौलत उर्दू ग़ज़ल को नई शान और लोकप्रियता मिली। मोमिन ने ग़ज़ल को ऐसे शिखर पर पहुंचाया कि मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे ख़ुद-नगर शायर भी उनके एक शेर पर अपना दीवान क़ुर्बान करने को तैयार हो जाते।

उनका असली नाम मोहम्मद मोमिन था और ताल्लुक़ उनका एक कश्मीरी घराने से था। उनके दादा हकीम मदार ख़ां शाह आलम के दौर में दिल्ली आए और शाही हकीमों में शामिल हो गए। उन्हें बादशाह की तरफ़ से जागीर मिली थी, जो नवाब फ़ैज़ ख़ां ने ज़ब्त कर दी थी, और उसके बदले उनके ख़ानदान को हज़ार रुपये सालाना पेंशन मिली।

तालीमी और शायराना परवरिश

मोमिन ने अरबी की तालीम शाह अब्दुल क़ादिर देहलवी से ली और फ़ारसी में भी महारत हासिल की। धार्मिक तालीम उन्होंने मक़तब में हासिल की, जबकि सामान्य ज्ञान, चिकित्सा, ज्योतिष, गणित, शतरंज और संगीत में भी उनकी गहरी रुचि थी।

जवानी में ही उन्होंने शायरी की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में शाह नसीर से संशोधन कराते रहे, लेकिन जल्दी ही अपने जज़्बात और भावनाओं की सच्चाई के दम पर दिल्ली के शायरों में अपनी ख़ास जगह बना ली।

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हकीम मोमिन ख़ां मोमिन

रंगीन मिज़ाज़ और महबूबा का असर

मोमिन की ज़िंदगी और शायरी पर दो चीज़ों का सबसे गहरा असर था। उनका रंगीन मिज़ाज और गहरी धार्मिकता। लेकिन उनका सबसे दिलचस्प पहलू था उनके इश्क़ी तर्जुबा । उनकी ग़ज़लों में साफ़ झलकता है कि यह शायर किसी ख़्याली महबूबा के इश्क़ में नहीं, बल्कि किसी जिंदा हुस्न-ओ-इश्क़ में गिरफ़्तार है।

मोमिन की कुल्लियात में छह मसनवीयां हैं, जो हर प्रेम प्रसंग की जीवंत तस्वीर पेश करती हैं। उनमें उनकी सबसे मशहूर महबूबा उम्मत-उल-फ़ातिमा, जिनका तख़ल्लुस “साहिब जी” था, का ज़िक्र मिलता है। ये पेशेवर तवाएफ़ थीं और दिल्ली ईलाज के लिए आई थीं। मोमिन, जो ख़ुद हकीम थे, उनकी नब्ज़ देखकर बीमार पड़ जाते थे।

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हकीम मोमिन ख़ां मोमिन

एक क़सीदा उन्होंने राजा पटियाला की शान में लिखा। राजा साहिब उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे, और जब मोमिन उनके आवास से गुज़रे, तो उन्हें बुलाया गया। बड़ी इज़्ज़त से बातचीत हुई और विदा करते समय उन्हें एक हथिनी पर सवार किया गया। मोमिन ने बाद में क़सीदे के ज़रिये शुक्रिया अदा किया।

शायरी की विविधता और ग़ज़ल में महानता

मोमिन ने क़सीदा, मसनवी और ग़ज़ल तीनों में महारत दिखाई। क़सीदा में वे सौदा और ज़ौक़ की ऊंचाई तक तो नहीं पहुंचे, लेकिन उर्दू के चुनिन्दा क़सीदा कहने वालों में शामिल हैं। मसनवी में वे दया शंकर नसीम और मिर्ज़ा शौक़ के बराबर हैं।

मोमिन की असली महानता उनकी ग़ज़ल में है। उनकी ग़ज़लें उत्साह, चंचलता, व्यंग्य और प्रतीकात्मकता की बेहतरीन मिसाल हैं। उनकी मोहब्बत असली और बेपरदा है, जिसमें वे अपने जज़्बात और हुस्न-ओ-इश्क़ की सच्चाई को सीधे शब्दों में बयान करते हैं।

उनकी मशहूर ग़ज़ल का एक शे’र है: “तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता”

मोमिन ने दो शादियां कीं, लेकिन पहली असफल रही। दूसरी शादी ख़्वाजा मीर दर्द के ख़ानदान की लड़की से हुई। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने इश्क़ से किनारा किया। 1851 में गंभीर चोट के बाद उनका इंतेकाल हुआ।

शब जो मस्जिद में जा फंसे ‘मोमिन’
रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के

हकीम मोमिन ख़ां मोमिन

मोमिन ख़ां मोमिन का योगदान उर्दू शायरी में हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी ग़ज़लें न सिर्फ़ रोमांस और इश्क़ का रंग पेश करती हैं, बल्कि तहज़ीब, संस्कृति और मानव भावनाओं की गहराई भी बयान करती हैं।

ये भी पढ़ें: ख़लील-उर-रहमान आज़मी: जब एक हिंदुस्तानी शायर बना ब्रिटिश स्कॉलर का टीचर 

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