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झील से चटाई तक: कश्मीर की 300 साल पुरानी परंपरा है Waguv Mat, सांस्कृतिक विरासत की जीती-जागती मिसाल

कश्मीर की खूबसूरत वादियों में पश्मीना और सिल्क के अलावा एक और ख़ास चीज छुपी हुई है, जो सदियों से कश्मीरी घरों की शान रही है वो है वागुव मैट (Waguv mat)। लोकल लैंग्वेज में इसे ‘वागो’ कहा जाता है, और ये सिर्फ एक फर्श की चटाई नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत की जीती-जागती मिसाल है।

300 साल पुरानी परंपरा, प्रकृति का अनमोल तोहफा

तीन सदियों से ज्यादा वक्त से ये परंपरा कश्मीरी घरों में जिंदा है। ये मैट (Waguv mat) झेलम नदी और डल झील के किनारे उगने वाले प्राकृतिक घास (Typha angustifolia) और चावल के पुआल से बनाई जाती है। इसकी ख़ासियत ये है कि सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडी रहती है, जिससे यह घरों के लिए बेहद ख़ास बन जाती है।

आज भी श्रीनगर के खोजबाग और मलूरा गांव के लगभग 300 परिवार इस कला को संजोए हुए हैं। भले ही आज मॉडर्न कार्पेट और सिंथेटिक फ्लोरिंग ने जगह ले ली हो, लेकिन ये कारीगर अपनी विरासत को खत्म नहीं होने देना चाहते। ये परंपरा सस्टेनेबिलिटी, हस्तकला और सामुदायिक भावना का बेहतरीन मिश्रण है, जिसकी आज के दौर में सख्त ज़रूरत है।

वागुव का इतिहास और सांस्कृतिक महत्व

वागुव (Waguv mat) बुनाई की शुरुआत 300 साल पहले हुई, जब कश्मीर के लोगों को अपने घरों के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो नेचर से जुड़ाव रखे। उस वक्त कार्पेट या मॉडर्न फ्लोरिंग नहीं थी, इसलिए लोगों ने आसपास उगने वाली घास और नरकुल का इस्तेमाल किया।

एक लोकल कारीगर बताते हैं: ‘हमारे दादा-परदादा ये काम करते थे, और आज की नई पीढ़ी भी इसे आगे बढ़ा रही है।’ यह सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों की पहचान है।

वागुव सिर्फ इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। कश्मीरी संस्कृति में मेहमानों का स्वागत इन्हीं मैट्स पर बैठकर किया जाता था। घर में आने वाले मेहमानों के लिए सबसे बढ़िया वागुव बिछाई जाती थी, जो सम्मान और मेहमाननवाजी को दिखाती है।  

बुजुर्गों का मानना है कि वागुव मैट (Waguv mat) पर बैठने से मन को सुकून और आराम मिलता है। कई लोग इसे कमर दर्द और अच्छी नींद के लिए फायदेमंद मानते हैं। ये सिर्फ एक चटाई नहीं, बल्कि कश्मीर की लाइफ स्टाइल का अहम हिस्सा है।

झील से लेकर चटाई तक: वागुव बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया

वागुव मैट बनाने का प्रोसेस कश्मीर की प्राकृतिक झीलों से शुरू होती है। पुरुष ‘डांग काठ’ नाम की लंबी घास और नरकुल को इकट्ठा करते हैं, जो झीलों के किनारे उगती है।

इस घास को काटने का सही समय बेहद जरूरी है: ’हम घास को एक खास तरीके से काटते हैं, फिर उसे अच्छी तरह सुखाते और भिगोते हैं, उसके बाद बुनाई शुरू होती है।’

इसके बाद महिलाएं एक साथ बैठकर बुनाई करती हैं। ये प्रोसेस बेहद मेहनतभरा है, हर एक मैट में घंटों की मेहनत और कलाकारी छुपी होती है।

वागुव मैट (Waguv mat)बनाने की पूरा प्रोसेस 100 फीसदी ऑर्गेनिक है। न कोई केमिकल, न मशीन, सब कुछ हाथों से बनाया जाता है, जिससे हर मैट अनोखी और ख़ास बन जाती है।

क्यों खतरे में है यह पुरानी कला?

आज के वक्त में वागुव मैट की परंपरा खत्म होने के कगार पर है। मशीन से बने सस्ते कार्पेट और मैट्स ने इसकी जगह ले ली है। युवा पीढ़ी अब इस पारंपरिक काम को नहीं अपना रही।

एक कारीगर चिंता जताते हुए कहते हैं: ‘आजकल लोग कार्पेट पसंद करते हैं, लेकिन अगर कश्मीर की संस्कृति को बचाना है, तो लोगों को वागुव को अपनाना होगा।’ 

आखिर क्यों ज़रूरी है वागुव को बचाना?

  • पर्यावरण के लिए फ्रेंडली: पूरी तरह प्राकृतिक, बायोडिग्रेडेबल और जीरो कार्बन फुटप्रिंट।
  • स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद: केमिकल-फ्री, जोड़ों के दर्द में आराम देती है।
  • कश्मीर की पहचान: सदियों पुरानी विरासत को बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

अगर सरकार और समाज साथ दें, तो वागुव मैट न सिर्फ कश्मीर, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना सकती है। ये सिर्फ एक चटाई नहीं, बल्कि कश्मीर की रूह  है, जिसे हमें बचाना ही होगा। क्योंकि विरासत सिर्फ याद रखने के लिए नहीं, बल्कि जीने और आगे बढ़ाने के लिए होती है। 

Also Read: Tawheeda Akhtar: Weaving Hope and Empowerment Through Shining Star Boutique

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