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इज्तिहाद: धार्मिक विज्ञान की जीवित आयाम

जब धर्म स्थिर और ठहरा हुआ प्रतीत होता है, तो धार्मिक व्याख्याएँ (Religious Interpretations) कभी भी किसी स्थान या समय में निश्चित नहीं होनी चाहिए। व्याख्याशास्त्र और धार्मिक व्याख्या का धार्मिक विज्ञान (Religious Science) किसी भी धर्म का ‘जीवित आयाम’ (living dimension) है। यह ज्ञान की शाखा निरंतर प्रवाह में होती है, पुनर्कल्पित और गतिशील होती है, और मानवीय अनुभवों पर आधारित होती है।

शास्त्रीय मुस्लिम न्यायविदों के विहित दृष्टिकोण के अनुसार, इज्तिहाद एक कानूनी इस्लामी सिद्धांतकार, फकीह या न्यायविद् की शैक्षिक क्षमता के अनुसार एक बौद्धिक गतिविधि है, जिसका उद्देश्य उम्माह के बड़े लाभ के लिए नए न्यायशास्त्रीय दृष्टिकोण या राय खोजना है।

प्रामाणिक हदीस संग्रह साहिह अल-बुखारी, मुस्लिम और अबू-दाऊद में बताई गई एक प्रामाणिक भविष्यवाणी परंपरा यह है: “यदि कोई विद्वान इज्तिहाद (कानून के मूल स्रोतों से इस्लामी नियमों का निष्कर्षण) बनाता है और वह सही निष्कर्ष पर पहुंचता है, तो उसे दो पुरस्कार प्राप्त होंगे। और अगर वह गलती करता है, गलत नतीजे पर पहुंचता है, तो भी उसे एक इनाम मिलेगा।”

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