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मेहर अली शाह: इश्क़, तसव्वुफ़ और इल्म की रौशन आवाज़

मेहर अली शाह का नाम पंजाब की सूफ़ियाना रिवायत, उर्दू-फ़ारसी अदब और इस्लामी इल्म की दुनिया में बड़े एहतराम से लिया जाता है। वह एक सूफ़ी बुज़ुर्ग, आलिम, रहनुमा और शायर थे, जिनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इश्क़-ए-हक़ीक़ी, तसव्वुफ़ और इल्म की ख़िदमत में गुज़रा।

पीर मेहर अली शाह की पैदाइश 14 अप्रैल 1859 को पंजाब में हुई। वह चिश्तिया सिलसिले से जुड़े हुए थे और ख़्वाजा शम्सुद्दीन सियालवी के मुरीद और ख़लीफ़ा बने। बाद में हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की से भी उन्हें रूहानी फ़ैज़ हासिल हुआ।

इल्म की तलाश में सफ़र

मेहर अली शाह ने अपनी शुरुआती तालीम ख़ानक़ाह और मक़ामी मदरसे में हासिल की। उर्दू और फ़ारसी सीखने के बाद उन्होंने कम उम्र में ही आला तालीम का इरादा किया। वह लखनऊ, रामपुर, कानपुर, अलीगढ़ और सहारनपुर जैसे इल्मी मराकिज़ में गए।

अलीगढ़ में उन्होंने करीब ढाई साल तक तालीम हासिल की। इल्म का शौक आगे चलकर उनकी शख़्सियत की सबसे बड़ी पहचान बनी। वह सिर्फ़ किताबों के आलिम नहीं थे, बल्कि अपने इल्म को रूहानी तजुर्बे और अमल से जोड़कर देखते थे।

तसव्वुफ़ और इश्क़ की राह

मेहर अली शाह की ज़िंदगी में तसव्वुफ़ को ख़ास मुक़ाम हासिल था। वह इब्न अरबी की तालीम और वहदत-उल-वुजूद के फ़लसफ़े से गहरी दिलचस्पी रखते थे। उनका मानना था कि इंसान को अपने अंदर झांककर अपने रब की पहचान की तरफ़ बढ़ना चाहिए।

उनकी शायरी में भी इश्क़, जुदाई, तड़प और रूहानी कैफ़ियत की झलक मिलती है। उनके कलाम में महबूब सिर्फ़ दुनियावी महबूब नहीं, बल्कि कई जगह रूहानी और हक़ीक़ी इश्क़ का प्रतीक बनकर सामने आता है।

उनके मशहूर पंजाबी कलाम में इश्क़ की इसी कैफ़ियत को महसूस किया जा सकता है।

“जब से लाग तोर संग नैन पिया
नींद गई, आराम नहीं सारी सारी रैन पिया”

इस कलाम में आशिक़ की वह हालत बयान होती है जिसमें महबूब की याद के सामने दुनिया की तमाम राहतें बे-मानी हो जाती हैं।

इल्म और क़लम से ख़िदमत

मेहर अली शाह ने उर्दू, फ़ारसी और पंजाबी में कई अहम किताबें लिखीं। उनकी तहरीरों में अक़ीदे, तसव्वुफ़, फ़िक़्ह और रूहानी मसाइल पर गहरी बहस मिलती है।

उनकी मशहूर किताबों में ‘सैफ़-ए-चिश्तियाई’, ‘शम्स-उल-हिदाया’, ‘तहक़ीक़-उल-हक़’, ‘तस्फ़िया माबैन सुन्नी व शिया’, ‘फ़तावा महरिया’ और ‘मकलूज़ात-ए-महरिया’ शामिल हैं।

उनका क़लम सिर्फ़ बहस के लिए नहीं था, बल्कि लोगों की इस्लाह और दीन की समझ को बेहतर बनाने का ज़रिया भी था।

ख़ुद पर क़ाबू ही असली दरवेशी

मेहर अली शाह की तालीमात में नफ़्स की इस्लाह को बहुत अहमियत हासिल थी। उनके मशहूर कथन का मतलब है।

“दरवेश वह है जो अपने नफ़्स-ए-अम्मारा की हर तरग़ीब के ख़िलाफ़ अमल करे।”

यानी असली दरवेश वही है जो अपने अंदर की बुरी ख़्वाहिशों और ग़लत रुझानों को क़ाबू में रखे। इंसान के लिए सबसे बड़ी जंग अक्सर बाहर नहीं, बल्कि उसके अपने नफ़्स के साथ होती है।

उनकी नज़र में रूहानी तरक़्क़ी सिर्फ़ ज़िक्र और इबादत तक महदूद नहीं थी, बल्कि अपने किरदार को बेहतर बनाना और अपने नफ़्स पर क़ाबू पाना भी उसका अहम हिस्सा था।  

पीर मेहर अली शाह का विसाल 11 मई 1937 को हुआ। उनकी आख़िरी घड़ियों से जुड़ी रिवायतों में आता है कि उन्होंने आख़िरी वक़्त में “अल्लाह” का ज़िक्र किया और क़िब्ले की तरफ़ रुख़ किया।

आज भी गोलरा शरीफ़ में उनकी दरगाह पर अकीदतमंद बड़ी तादाद में हाज़िरी देते हैं। हर साल उनका उर्स मनाया जाता है, जिसमें दूर-दराज़ से लोग शरीक होकर फ़ैज़ हासिल करने आते हैं।

हमेशा ज़िंदा रहने वाली विरासत

मेहर अली शाह की विरासत सिर्फ़ उनकी दरगाह तक महदूद नहीं। उनकी किताबें, शायरी, रूहानी तालीमात और इल्मी ख़िदमात आज भी लोगों को मुतास्सिर करती हैं।

उनकी ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि इल्म इंसान को समझ देता है, इश्क़ उसे रूहानी गहराई देता है और नफ़्स पर क़ाबू उसे असली आज़ादी की तरफ़ ले जाता है।

पीर मेहर अली शाह की पूरी ज़िंदगी इसी तलाश का एक रौशन सफ़र थी। इल्म से इश्क़ तक और इश्क़ से हक़ीक़त तक।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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