कुछ लोग ज़बान को सिर्फ़ इस्तेमाल करते हैं, और कुछ उससे मोहब्बत कर बैठते हैं। मनीष शुक्ला दूसरी तरह के लोगों में से हैं। उनका एक मशहूर शेर है कि उन्होंने उर्दू के बहाने से बात करने का हसीं तौर-तरीक़ा और सलीक़ा सीखा। यह शेर उनकी पूरी शख़्सियत का आईना है।
बात करने का हसीं तौर-तरीक़ा सीखा
हम ने उर्दू के बहाने से सलीक़ा सीखा
शुरुआती ज़िंदगी और पढ़ाई
मनीष शुक्ला 1971 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर में पैदा हुए। उनकी तालीम सहारनपुर और लखनऊ में हुई। लखनऊ यूनिवर्सिटी से उन्होंने एंथ्रोपोलॉजी यानी मानव-विज्ञान में एम.ए. किया। यह विषय इंसान, उसके समाज और उसकी तहज़ीब को समझने का इल्म है। शायद इसी पढ़ाई ने उनकी शायरी को इंसानी जज़्बात की गहरी समझ दी।
1997 में वे प्रांतीय सिविल सर्विस के लिए चुने गए। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि सरकारी नौकरी और शायरी का साथ मुश्किल है, मगर मनीष शुक्ला ने दोनों को साथ निभाया। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने उर्दू लिपि नौकरी के दौरान सीखी। यानी ज़बान से मोहब्बत इतनी थी कि काम की मसरूफ़ियत भी रुकावट न बनी। आजकल वे लखनऊ में कार्यरत हैं।
शायरी की शुरुआत
उनकी शायरी का सिलसिला बचपन में शुरू हुआ। घर का माहौल और अंदर उठने वाली भावनाओं की हलचल, यही उनकी शायरी की जड़ें बनीं। इसी अहसास को उन्होंने आगे चलकर ग़ज़लों में ढाला। उनके दो ग़ज़ल-संग्रह छप चुके हैं: 2012 में “ख़्वाब पत्थर हो गए” और 2017 में “रौशनी जारी करो”। दोनों नामों में ही एक कहानी है, ख़्वाबों के टूटने की और फिर रौशनी की उम्मीद की।
मनीष शुक्ला की शायरी में आवारगी भी है, इश्क़ भी, बचपन की मासूमियत भी और ज़िंदगी से जूझने का हौसला भी।
किसी के इश्क़ में बर्बाद होना
हमें आया नहीं फ़रहाद होना
ज़िंदगी देख ले नज़र भर के
हम हैं शामिल तिरे ख़राबों में
हौसले का पैग़ाम
उनके एक शेर में ज़िंदगी से कहा गया है कि वह नज़र भर के देख ले, हम भी तेरे ख़राबों यानी वीरानों में शामिल हैं। और एक शेर में सफ़र के ज़लज़लों की बात है: वे लोग रुक जाएं जिन्हें गिरने का डर है। यह बात हिम्मत देती है कि जो गिरने से डरता है वह चल ही नहीं सकता।
सफ़र में अब मुसलसल ज़लज़ले हैं
वो रुक जाएं जिन्हें गिरने का डर है
मनीष शुक्ला की शायरी सादा ज़बान में गहरी बात कहने का हुनर है। उन्होंने साबित किया कि उर्दू किसी एक तबके की नहीं, हर उस दिल की ज़बान है जो उससे मोहब्बत करता है। उनकी ग़ज़लें पढ़कर लगता है कि लफ़्ज़ों में अदब भी है और अपनापन भी।
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