महाराष्ट्र की धरती, जहां वीरों की गाथाएं जन्म लेती हैं। इसी धरती पर बसा है ‘डेक्कन की मल्लिका’ कहलाने वाला शहर पुणे। ये शहर जितना मॉडर्न है, उतना ही तारीख़ से भरा हुआ भी। कभी ये मराठा साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था, और आज ये एजुकेशन, IT और स्टार्टअप्स का गढ़ है। लेकिन इस शहर की रूह में जो चीज़ बसी है, वो है पुणेरी पगड़ी (Puneri Pagri) जो सिर पर बांधी जाने वाली कपड़े की एक ऐसी पहचान है, जो इज़्ज़त, शान और रिवायत का प्रतीक है।

कोस्टी समुदाय: पगड़ी के असली हुनरमंद
पुणेरी पगड़ी (Puneri Pagri) की जड़ें करीब 400 साल पुरानी हैं। उस दौर में समाज कई वर्गों में बंटा था, जिनमें एक था-कोस्टी। ये सिर्फ़ पगड़ी बनाने वाले कारीगर नहीं थे, बल्कि इस रिवायत के असली पासबान थे। कोस्टी हर पंद्रह दिन में घर-घर जाते और वहीं बैठकर अपने मर्द ग्राहकों के लिए हाथ से बनी पगड़ियां तैयार करते। ये अनोखी परंपरा पुणेरी पगड़ी और शहर की संस्कृति के गहरे रिश्ते को ज़ाहिर करती है।
पगड़ी बनाने का अमल बड़ा नफ़ीस था। हर पगड़ी के लिए 65 मीटर कपड़ा, जो नौ इंच चौड़ा होता, इस्तेमाल होता था। कपड़े को पानी में भिगोकर मांड़ लगाया जाता, ताकि नफ़ीस तहें अपनी शक्ल बनाए रखें। दिलचस्प बात ये है कि आकार देने के लिए हमेशा सांचा नहीं होता था। कभी-कभी कोस्टी अपने सिर, घुटनों या लकड़ी के लट्ठों का इस्तेमाल करते। मांड़ के कारण पगड़ी की उम्र करीब 15 दिन होती, इसीलिए कोस्टी हर पखवाड़े घर जाते। ताज़ा पगड़ी बनाने और रिवायत ज़िंदा रखने।

पगड़ी के छह हिस्से
पुणेरी पगड़ी (Puneri Pagri) की बनावट बेमिसाल है। पहले इसका रंग सफ़ेद होता था, मगर हुनरमंद कारीगर सब्ज़ियों-फलों से निकाले गए प्राकृतिक रंगों से इसमें रंगत लाते। आज लाल रंग आम है। कपड़ा आमतौर पर सूती, जबकि रेशम और साटन ऐश-ओ-आराम के लिए।
छह अहम हिस्से मिलकर यह शानदार पहनावा बनाते हैं- कोका (दायीं आंख के ऊपर), जरतार (माथे के दायें से लटकती सुनहरी रिबन), मठ (कोका से निकलने वाला सपाट हिस्सा), जरी (जरतार के पास रेशमी सुनहरी पट्टी), घेरा (पूरी पगड़ी के चारों ओर लिपटा नफ़ीस कपड़ा, जो सिर के नाप पर तैयार होता), और अस्तर (अंदर की सूती परत, जो आराम देती है)। आख़िरी हिस्सा कमल है, जो माथे पर टिकता है। स्टाइल के साथ महाराष्ट्र की तपती धूप से हिफ़ाज़त भी करता है।

मराठा दौर से जुड़ी तारीख़
पुणेरी पगड़ी (Puneri Pagri) की तारीख़ मराठा सल्तनत से जुड़ी है। बखरों में इसका ज़िक्र इख़्तियार की अलामत के तौर पर मिलता है, जिसे मराठा योद्धा और हुक्मरान पहनते थे। पेशवा दौर में पुणे राजधानी बना, और पेशवा यही पहनावा पहनते थे। यही वक़्त था जब यह पहनावा मक़बूल हुआ और शहर की सक़ाफ़ती पहचान बना। बाद में पगड़ी दो हिस्सों में बंटी। जवाहरातों से सजी शाही पगड़ी, और सादा मगर शानदार पुणेरी पगड़ी, जो आलिमों, उस्तादों और समाज सुधारकों से जुड़ गई।

पुणेरी पगड़ी (Puneri Pagri) आमतौर पर सूती या रेशम से बनती है, क्योंकि कपड़ा नरम होना चाहिए वरना तह करते वक़्त तकलीफ़ होगी और पगड़ी भारी लगेगी। सूती कपड़ा महाराष्ट्र के मौसम के लिहाज़ से भी मुफ़ीद है। रंग आमतौर पर सफ़ेद या केसरिया, लंबाई पांच फुट से ज़्यादा नहीं। पगड़ी बांधने का हुनर आसान नहीं है। इसमें कई तहें एक-दूसरे में फंसी होती हैं। ये भारत की बाक़ी पगड़ियों से छोटी और ऊपर से सपाट होती है, जो संतुलन और अनुशासन का इज़हार करती है। यही सादगी इसे सबसे अलग बनाती है।
नाज़ और इज़्ज़त का एहसास
पुणेरी पगड़ी महाराष्ट्र की माला-माल सक़ाफ़ती तारीख़ और इज़्ज़त की अलामत है। त्योहारों, रस्मों और जश्नों में सम्मान का प्रतीक। सन 2009 में इसे भारत सरकार से ज्योग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI) का दर्जा मिला।
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