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अहमक़ फफूंदवी: जेल की कोठरी से निकली शायरी की आवाज़ 

अहमक़ फफूंदवी का असली नाम मोहम्मद मुस्तफ़ा ख़ान था। वे उर्दू के शायर, लुग़त (शब्दकोश) बनाने वाले ज़बानदां और मुल्क की आज़ादी के मुजाहिद थे। उनकी पहचान ख़ास तौर पर तंज़-ओ-मज़ाह (व्यंग्य और हास्य) की शायरी से है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में अंग्रेज़ी हुकूमत पर खुलकर तंज़ किया। 

ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इंक़लाब देखेंगे

शुरुआती ज़िंदगी

मुस्तफ़ा ख़ान 1895 में उत्तर प्रदेश के फफूंद (ज़िला इटावा) में पैदा हुए। उनका ख़ानदान यूसुफ़ज़ई पठानों का था, जो मुग़ल दौर में फ़र्रुख़ाबाद आ बसा था। 1857 की बग़ावत में हिस्सा लेने के जुर्म में अंग्रेज़ों ने उनके दादा को फांसी दे दी। इसके बाद उनके वालिद फफूंद आ गए।

वो इक रोटी जो हम को बरहमन मुश्किल से देता है
हज़ारों बुत हुआ करते हैं उस के दाने दाने में

वालिद ने 1862 में एक छापाख़ाना (प्रेस) शुरू किया, जो 1921 तक चला। उसी साल अहमक़ जेल गए, तो प्रेस भी बिगड़ता चला गया और आख़िर बंद हो गया। 1912 में वालिद के इंतिक़ाल के बाद अहमक़ बदायूं के मदरसा-उल-उलूम में अरबी पढ़ने गए। फिर दिल्ली के तिब्बिया कॉलेज में ढाई साल तक हकीमी/तिब की तालीम ली।

आज़ादी की जंग और शायरी

बचपन से ही उनमें शायरी का हुनर दिखने लगा था। 1919 में वे कांग्रेस के कामों से मुतास्सिर होकर आज़ादी की तहरीक में शामिल हो गए। असहयोग आंदोलन और स्वराज की मुहिम में उन्होंने सरगर्मी से हिस्सा लिया। इसी वजह से 1921 में सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और उन्होंने कई साल अलीगढ़ जेल में गुज़ारे।

जो अर्ज़ां है तो है उन की मता-ए-आबरू वर्ना
ज़रा सी चीज़ भी बेहद गिरां है इस ज़माने में

जेल की सलाख़ें भी उनकी क़लम नहीं रोक सकीं। वे कोठरी में बैठकर भी लिखते रहे। उनकी ग़ज़लों के कई मजमूए छपे, जैसे संग-ओ-ख़िश्त, नक़्श-ए-हिकमत और मशहूर जोश-ओ-अमल । उनकी शायरी में वतन की मोहब्बत, अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ और समाज की कमज़ोरियों पर चुटकी, तीनों मिलते हैं। उन्होंने सियासी, समाजी और तहज़ीबी मसलों को अपने तंज़ का निशाना बनाया।

ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इंक़लाब देखेंगे

ज़बानदां और लुग़त-नवीस

अहमक़ कई ज़बानें जानते थे: उर्दू, हिंदी, अरबी, संस्कृत, पाली, फ़ारसी और तुर्की। उन्होंने पाली-उर्दू, संस्कृत-उर्दू और फ़ारसी-उर्दू जैसे कई शब्दकोश तैयार किए।

1950 में जेल के उनके पुराने साथी श्री नारायण प्रसाद ने उन्हें उर्दू-हिंदी शब्दकोश बनाने का मश्वरा दिया। उस वक़्त बहुत-से पुराने दस्तावेज़ फ़ारसी और उर्दू में थे और उन्हें हिंदी में लाना ज़रूरी था। साढ़े तीन साल की मेहनत के बाद यह लुग़त तैयार हुई। इसे उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्दू-हिंदी शब्दकोश के नाम से छापा, उस वक़्त मुख्यमंत्री संपूर्णानंद थे। यह शब्दकोश आज भी छपता है और इस्तेमाल में है।

वफ़ात और विरासत

अहमक़ फफूंदवी का इंतिक़ाल 8 अगस्त 1957 को हुआ। वे पीछे मुल्क की ख़िदमत, अदब और आज़ादी की जद्दोजहद की एक बड़ी विरासत छोड़ गए। उनके बेटे ख़ालिद अहमद भी शायर हुए। वे उनकी दूसरी बीवी अनवर जहां बेगम से थे, जो 1947 में पाकिस्तान चली गई थीं।

ये भी पढ़ें: आगा हसन अमानत: वो शायर जिसने उर्दू को दिया पहला स्टेज ड्रामा

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