भारतीय फ़ौज के इतिहास में कुछ ऐसे जांबाज़ जनरलों के नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी बेहतरीन रणनीति और हौसले से जंग के मैदान में हारती बाज़ी को भी जीत में बदल दिया। ऐसे ही एक बहादुर अफ़सर थे Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह), जिन्हें पूरा देश प्यार और सम्मान से ‘Sparrow’ के नाम से जानता है। वह उन चुनिंदा बहादुर सैनिकों में शामिल हैं, जिन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार ‘महावीर चक्र’ (MVC & Bar) से दो बार नवाज़ा गया।
शुरुआती ज़िंदगी और फ़ौजी सफ़र
Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह) का जन्म 3 अक्टूबर 1911 को पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में एक सिख शेरगिल जाट परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई ख़ालसा कॉलेज, अमृतसर से की। बचपन से ही उन्हें खेलों और फ़ौज की ज़िंदगी में गहरी दिलचस्पी थी। अपनी काबिलियत के दम पर वह आर्मी कैडेट कॉलेज, नौगांव के ज़रिए फ़ौज में आए। जनवरी 1938 में उन्हें भारतीय फ़ौज की मशहूर रेजिमेंट 7 Light Cavalry में अफ़सर के तौर पर कमीशन मिला। दूसरी विश्व जंग के दौरान भी उन्होंने इसी रेजिमेंट के साथ शानदार सेवा दी।
‘Sparrow’ नाम कैसे मिला?
Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह) के नाम के साथ ‘Sparrow’ जुड़ने की भी एक दिलचस्प कहानी है। बताया जाता है कि स्कूल के दिनों में उन्होंने “I am a Little Sparrow” नाम की एक लंबी अंग्रेज़ी कविता पूरी तरह याद करके बहुत अच्छे अंदाज़ में सुनाई थी। उनकी इस काबिलियत से प्रभावित होकर उन्हें ‘Sparrow’ नाम दिया गया। बाद में यह नाम उनकी पहचान का ऐसा हिस्सा बन गया, जिसे उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने नाम के साथ बनाए रखा।
कश्मीर ऑपरेशन: पहला महावीर चक्र
आज़ादी के बाद 1947-48 के कश्मीर ऑपरेशन के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल रजिंदर सिंह ‘Sparrow’ ने अपनी काबिल लीडरशिप का लोहा मनवाया। उन्होंने झांगर को दुश्मन के कब्ज़े से छुड़ाने में अहम किरदार निभाया। इसके अलावा, जब पाकिस्तानी फ़ौज ने लद्दाख को भारत से अलग करने की कोशिश की, तब उन्होंने 11,575 फीट ऊंचे ज़ोजिला पास (Zoji La Pass) पर कब्ज़ा करने की मुहिम में अहम भूमिका निभाई।
दुश्मन पहाड़ों की चोटियों पर मज़बूत मोर्चाबंदी करके बैठा था। इसकी वजह से भारतीय पैदल फ़ौज के कई हमले भारी नुकसान के बाद नाकाम हो चुके थे। ऐसे हालात में मेजर जनरल के. एस. थिमैया ने यहां टैंकों के इस्तेमाल की योजना बनाई। यह ज़िम्मेदारी 7 Light Cavalry के कमांडिंग अफ़सर लेफ्टिनेंट कर्नल रजिंदर सिंह ‘Sparrow’ को दी गई।
उस दौर में दुनिया भर के फ़ौजी माहिरों का मानना था कि इतने ऊंचे और बर्फ़ीले इलाके में टैंकों को पहुंचाना लगभग नामुमकिन है। लेकिन कर्नल Sparrow ने पूरी गोपनीयता के साथ Stuart Tanks को खोलकर उनके हिस्सों को अलग किया और तिरपालों के नीचे रात के वक्त बालटाल पहुंचाया।

1 नवंबर 1948 को भारी बर्फ़बारी के बीच भारतीय टैंकों ने दुश्मन के मोर्चों पर अचानक हमला कर दिया। बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर टैंकों की गरज सुनकर पाकिस्तानी फ़ौज में अफ़रा-तफ़री मच गई और वह अपने मोर्चे छोड़कर पीछे हट गई।
टैंकों के इस अचानक और कामयाब इस्तेमाल ने कारगिल और लेह-लद्दाख के इलाकों को भारत के साथ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। कश्मीर ऑपरेशन में उनकी बहादुरी और बेहतरीन रणनीति के लिए उन्हें पहला महावीर चक्र दिया गया।
फिलौरा और पगोवाल की जंग: दूसरा महावीर चक्र
1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह) ‘Sparrow’ भारत की अहम 1st Armoured Division की कमान संभाल रहे थे। सियालकोट-शकरगढ़ सेक्टर में भारतीय फ़ौज का सामना पाकिस्तान की 6 Armoured Division से था, जो अमेरिका में बने आधुनिक Patton Tanks से लैस थी।
जनरल Sparrow ने अपनी बेहतरीन रणनीति के ज़रिए फिलौरा और पगोवाल के इलाके में पाकिस्तानी फ़ौज को घेर लिया। उनकी अगुवाई में भारतीय टैंकों ने दुश्मन के खिलाफ़ ज़बरदस्त कार्रवाई की और इस जंग में अपनी ताक़त का दम दिखाया।

इस ऐतिहासिक टैंक जंग के अहम पहलू
दूसरी विश्व युद्ध के बाद बड़ी टैंक जंग
11 सितंबर 1965 को फिलौरा में हुई टैंकों की आमने-सामने की लड़ाई को दूसरी विश्व जंग के बाद दुनिया की सबसे बड़ी और खतरनाक टैंक लड़ाइयों में गिना जाता है।
पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान
इस लड़ाई में भारतीय जवानों ने दुश्मन के 69 टैंक तबाह कर दिए, जबकि भारत के सिर्फ़ 9 टैंक नुकसान का शिकार हुए।
आगे रहकर की अगुवाई
जनरल Sparrow सिर्फ़ हेडक्वार्टर में बैठकर अपनी फ़ौज को निर्देश नहीं दे रहे थे, बल्कि ख़ुद आगे की लाइन में मौजूद रहते थे। उनका मक़सद जवानों का हौसला बढ़ाना था। 16 सितंबर तक उनकी डिवीजन ने फिलौरा को दुश्मन के कब्ज़े से पूरी तरह आज़ाद करा लिया।
जनरल Sparrow की रणनीति, हौसले और लीडरशिप को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘Bar to MVC’ देकर दूसरी बार महावीर चक्र से नवाज़ा।
फ़ौज से रिटायरमेंट के बाद सियासी सफ़र
26 सितंबर 1966 को फ़ौज से रिटायर होने के बाद जनरल Sparrow ने देश की ख़िदमत का रुख़ सियासत की तरफ़ किया। वो पंजाब की सियासत में सक्रिय हुए और 1967 में जस्टिस गुरनाम सिंह की अगुवाई वाली पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। उन्होंने जालंधर लोकसभा सीट से 1980 और 1984 में दो बार चुनाव जीता और सांसद बने। संसद में उन्होंने सुरक्षा और डिफेंस से जुड़े मामलों पर भी काम किया।
सियासत के साथ-साथ उन्हें खेलों का भी बहुत शौक़ था। वह एक अच्छे पोलो खिलाड़ी (+4 हैंडीकैप) थे और हॉकी में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। उनकी याद में भारतीय फ़ौज में ‘जनरल Sparrow Polo Cup’ भी शुरू किया गया। परिवार की बहादुरी देशभक्ति और फ़ौज से जुड़ाव Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह) ‘Sparrow’ के परिवार में भी नज़र आता है। उनके दोनों बेटों ने भारतीय फ़ौज में लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंचकर मुल्क की ख़िदमत की।

- लेफ्टिनेंट जनरल मलविंदर सिंह ‘बिन्नी’ शेरगिल:
उन्होंने अपने पिता की तरह 7 Light Cavalry में सेवा की। 1971 की जंग के दौरान शकरगढ़ सेक्टर में बहादुरी दिखाने के लिए उन्हें वीर चक्र से नवाज़ा गया। यह फ़ौजी इतिहास की एक दिलचस्प मिसाल है, जहां पिता और बेटे दोनों ने एक ही सेक्टर में बहादुरी के लिए वीरता पुरस्कार हासिल किए।
- लेफ्टिनेंट जनरल तजिंदर सिंह ‘मौन’ शेरगिल:
वो Deccan Horse रेजिमेंट से जुड़े रहे। 1965 की जंग में उन्होंने पंजाब के खेमकरण सेक्टर में बेख़ौफ़ होकर दुश्मन का सामना किया।
याद और विरासत
मई 1994 में 83 साल की उम्र में Major General Rajinder Singh (मेजर जनरल रजिंदर सिंह) का इंतक़ाल हो गया। मेजर जनरल रजिंदर सिंह ‘Sparrow’ को भारतीय फ़ौजी इतिहास में हमेशा एक ऐसे बेहतरीन रणनीतिकार के तौर पर याद किया जाएगा, जिन्होंने बर्फ़ीले पहाड़ों से लेकर मैदानों तक टैंकों के ज़रिए कई मुश्किल हालात का सामना किया और अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया।
लेख: मनमीत कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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