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लिफ़्टिनेंट Sampuran Singh, MVC और VrC: बेदोरी के अमर नायक

भारतीय फ़ौज के गौरवशाली इतिहास में ऐसे कई जांबाज़ सैनिक हुए हैं, जिन्होंने मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपनी बहादुरी, समझदारी और शानदार लीडरशिप से जंग का रुख़ बदल दिया। ऐसे ही बहादुर फ़ौजी अफ़सरों में से एक थे लिफ़्टिनेंट कर्नल और बाद में ब्रिगेडियर बने Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह)। 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान उन्होंने अपने हौसले और लीडरशिप की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे आज भी याद किया जाता है। Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) भारतीय फ़ौज के उन चुनिंदा अफ़सरों में शामिल हैं, जिन्हें बहादुरी और शानदार लीडरशिप के लिए महावीर चक्र (MVC) और वीर चक्र (VrC), दोनों सम्मान मिले।

लिफ़्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) की पैदाइश पंजाब के लुधियाना ज़िले के नाथोवाल गांव में हुआ था। पंजाब की मिट्टी में पले-बढ़े संपूर्ण सिंह के अंदर बचपन से ही देश के लिए कुछ करने का जज़्बा था। उन्होंने भारतीय फ़ौज में कमीशन हासिल किया और देश की पुरानी और मशहूर पैदल रेजिमेंट पंजाब रेजिमेंट का हिस्सा बने। अपनी मेहनत, अनुशासन और काबिलियत के दम पर उन्होंने फ़ौज में लगातार तरक्की की और आगे चलकर 19 पंजाब के कमांडिंग अफ़सर बने।

1965 का माहौल और हाजी पीर की अहमियत

अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर घुसपैठ के लिए ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ शुरू किया। इसके बाद भारतीय फ़ौज ने उन अहम रास्तों को बंद करने का फ़ैसला किया, जिनका इस्तेमाल घुसपैठ के लिए किया जा रहा था। इस जवाबी कार्रवाई को 19 इन्फैंट्री डिवीजन के तहत 68 ब्रिगेड ने अंजाम दिया। इस ऑपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन बख़्शी’ रखा गया था। इसकी कमान 68 इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर ज़ोरावर चंद ‘ज़ोरू’ बख़्शी के हाथ में थी।

हाजी पीर की तरफ़ जाने वाले रास्तों को सुरक्षित करने के लिए बेदोरी की चोटी पर क़ब्ज़ा करना बेहद ज़रूरी था। इस चोटी की हिफ़ाज़त पाकिस्तान की 6 आज़ाद कश्मीर बटालियन के जवान कर रहे थे। बेदोरी एक ऊंची और बेहद अहम पहाड़ी चोटी थी। यहां से पूरे इलाके पर नज़र रखी जा सकती थी। यही वजह थी कि जब तक भारतीय फ़ौज बेदोरी पर क़ब्ज़ा नहीं कर लेती, तब तक हाजी पीर की तरफ़ आगे बढ़ना काफ़ी मुश्किल हो सकता था।

बेदोरी की मुश्किल चढ़ाई और पहली नाकाम कोशिशें

बेदोरी पर क़ब्ज़ा करना बिल्कुल आसान नहीं था। करीब 12,330 फीट की ऊंचाई पर मौजूद ये चोटी ऊबड़-खाबड़ चट्टानों और संकरी पहाड़ी धारों से घिरी हुई थी। यहां दुश्मन ने पहले से ही मज़बूत मोर्चे बना रखे थे। 25 अगस्त 1965 की रात को 19 पंजाब ने पहली बार बेदोरी पर हमला किया, लेकिन ये कोशिश नाकाम रही। इसके बाद 28 अगस्त को 7 बिहार बटालियन को भी इसी मक़सद से भेजा गया, लेकिन उन्हें भी पीछे हटना पड़ा। पाकिस्तानी फ़ौज की तरफ़ से इस कड़े मुक़ाबले को एक बड़ी कामयाबी माना गया।

दो कोशिशें नाकाम होने के बाद कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) ने ब्रिगेड हेडक्वार्टर पहुंचकर पूर्व की तरफ़ से नए हमले की योजना सामने रखी। ब्रिगेडियर ने Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) की योजना और उनकी काबिलियत पर भरोसा जताते हुए इसे मंज़ूरी दे दी।

मुश्किल रास्ता और भारी सामान

Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) के जवानों के सामने सिर्फ़ दुश्मन की भारी गोलीबारी का ख़तरा नहीं था, बल्कि मौसम और पहाड़ भी उनका इम्तिहान ले रहे थे। मानसून की तेज़ बारिश, घना कोहरा, सीधी और पथरीली चढ़ाई और फिसलन भरी कीचड़ के बीच बटालियन ने बेहद मुश्किल रास्ता तय किया। जवान अपने कंधों पर भारी हथियार, गोला-बारूद और वायरलेस सेट लेकर ऊंची-नीची पहाड़ियों को पार कर रहे थे।

तेज़ ठंड, ऊंचाई, भारी सामान और लगातार बढ़ती थकान के बावजूद वो आगे बढ़ते रहे। इस मुश्किल सफ़र के दौरान कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) खुद जवानों के साथ मौजूद रहे। उनकी मौजूदगी और हौसला बढ़ाने वाली बातों ने जवानों का हौसला टूटने नहीं दिया। उनके लीडरशिप में जवान हर मुश्किल का सामना करते हुए अपने मक़सद की तरफ़ बढ़ते रहे।

आगे बढ़कर की जवानों की अगुवाई

जब 19 पंजाब के जवान चढ़ाई करते हुए बेदोरी की चोटी के क़रीब पहुंचे, तो ऊंचाई पर बैठे दुश्मन ने ऑटोमैटिक हथियारों और तोपों से ज़ोरदार गोलीबारी शुरू कर दी। एक वक़्त ऐसा आया जब दुश्मन की लगातार फायरिंग के बीच जवानों के लिए आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो गया। ऐसे नाज़ुक वक़्त में लिफ़्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) पीछे रहकर सिर्फ़ हुक्म देने के बजाय खुद आगे आ गए और जवानों की कमान संभाल ली।

उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना गोलियों की बौछार के बीच जवानों के बीच लीडरशिप की और उनका हौसला बनाए रखा। अपने कमांडिंग अफ़सर को ख़तरे के सामने डटकर खड़ा देखकर जवानों में नया जोश भर गया। उन्होंने पूरी ताक़त के साथ दुश्मन के बंकरों पर हमला बोल दिया और बेदोरी की चोटी की तरफ़ आगे बढ़ते रहे।

हाजी पीर का रास्ता साफ़

लिफ़्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) की शानदार लीडरशिप में 19 पंजाब के जांबाज़ जवानों ने आख़िरी हमला किया और दुश्मन को संभलने का कोई मौक़ा नहीं दिया। आमने-सामने की इस लड़ाई के बाद 29 अगस्त 1965 को भारतीय जवानों ने बेदोरी पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लिया। बेदोरी की इस जीत ने पूरे ऑपरेशन का रुख़ बदल दिया। इस ऊंची चोटी पर क़ब्ज़ा होने के बाद एक पैरा के लिए हाजी पीर तक पहुंचने का रास्ता साफ़ हो गया।

जीत को पक्का करना: आगे के ऑपरेशन

बेदोरी पर क़ब्ज़ा करने के बाद भी कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) का मिशन ख़त्म नहीं हुआ था। दुश्मन की तरफ़ से जवाबी हमले का ख़तरा लगातार बना हुआ था। इसीलिए उन्होंने बिना वक़्त गंवाए तुरंत मोर्चाबंदी करवाई और भारतीय पोज़ीशन को मज़बूत करने के लिए आगे के ऑपरेशन की कमान संभाली। उनकी समझदारी और सही फ़ैसलों की वजह से दुश्मन को दोबारा संभलने का मौक़ा नहीं मिला और भारतीय फ़ौज ने इस इलाके पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाए रखी।

वीर चक्र और महावीर चक्र से सम्मान

जंग के मैदान में अपनी बेमिसाल बहादुरी, मुश्किल वक़्त में शानदार लीडरशिप और हिम्मत से लिए गए फ़ैसलों के लिए लिफ़्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) को पहले वीर चक्र (Vir Chakra) और बाद में देश के दूसरे सबसे बड़े वीरता सम्मान महावीर चक्र (Maha Vir Chakra) से नवाज़ा गया। वो 1965 की जंग के दौरान महावीर चक्र और वीर चक्र, दोनों सम्मान पाने वाले चुनिंदा फ़ौजी अफ़सरों में शामिल हुए।

एक अमर और गौरवशाली विरासत

आज लिफ़्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी की कहानी हमेशा ज़िंदा रहेगी। पंजाब के लुधियाना ज़िले के नाथोवाल गांव से निकलकर कश्मीर की बर्फ़ीली और मुश्किल पहाड़ियों पर देश का झंडा बुलंद करने वाले इस जांबाज़ ने अपनी बहादुरी की ऐसी मिसाल छोड़ी, जो आज भी नौजवानों और भारतीय फ़ौज के जवानों को हौसला देती है। 19 पंजाब रेजिमेंट और पूरा देश लेफ्टिनेंट कर्नल Sampuran Singh (संपूर्ण सिंह) की इस क़ुर्बानी, बहादुरी और लीडरशिप को हमेशा इज़्ज़त और एहतराम के साथ याद रखेगा।

लेख: मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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