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सुहैल आज़मी: वो अफ़साना-निगार, जिसने आम आदमी की आवाज़ बनकर लिखा

कुछ लेखक सिर्फ़ किस्से नहीं बुनते, वो अपने दौर के दर्द और उम्मीदों को सफ़्हों पर उतार देते हैं। सुहैल आज़मी (आज़मीबादी) ऐसे ही एक अफ़साना-निगार थे बिहार की सरज़मीन से उठा वो क़लमकार, जिसने उर्दू अदब को नई सिम्त दी और साथ ही आज़ादी की तहरीक में भी अपना किरदार निभाया।

पैदाइश और शुरुआती ज़िंदगी

सुहैल आज़मी का असली नाम सैयद मुजीबुर रहमान था। उनकी पैदाइश 16 जुलाई 1911 को पटना ज़िले के इस्लामपुर (शाहपुर भड़ौल) में एक मुअज़्ज़ज़ सैयद ख़ानदान में हुई। ये इलाक़ा आज नवादा ज़िले के वारिसलीगंज ब्लॉक में आता है। उनकी तालीम मुज़फ़्फ़रपुर के द्वारका हाई स्कूल से शुरू हुई और आगे चलकर पटना यूनिवर्सिटी से मुकम्मल हुई।

पटना, जिसे तारीख़ी तौर पर “आज़मआबाद” भी कहा जाता था, उस दौर में उर्दू शायरी और अदब का एक बड़ा मरकज़ था। यही वजह है कि इसी शहर से शाद आज़मी, बिस्मिल आज़मी और सुहैल आज़मी — ये तीनों नाम एक साथ अदबी हलक़ों में गूंजते रहे।

पत्थर तो हज़ारों ने मारे थे मुझे लेकिन
जो दिल पे लगा आ कर इक दोस्त ने मारा है

अदब और सहाफ़त की दोहरी राह

सुहैल आज़मी सिर्फ़ अफ़साना-निगार ही नहीं, बल्कि एक तरक़्क़ी-पसंद सहाफ़ी और नक़्क़ाद (आलोचक) भी थे। मौलवी अब्दुल हक़ की सरपरस्ती में उन्होंने बिहार में उर्दू की तरक़्क़ी के लिए एक तहरीक चलाई। उनका मशहूर अख़बार “साथी” – जो पटना से शाया होता था इस काम में उनका बड़ा हथियार बना। इसके अलावा माहनामा “तहज़ीब” भी इसी मक़सद की तकमील में मददगार साबित हुआ।

1936 में उन्होंने पटना में तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन तहरीक (Progressive Writers’ Movement) की एक शाख़ क़ायम की। वो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से भी जुड़े रहे यानी उनकी क़लम सिर्फ़ अदब तक महदूद नहीं थी, बल्कि सियासी और समाजी बेदारी का भी ज़रिया थी। कलीम आजिज़ के साथ उन्हें उर्दू के अंतरराष्ट्रीय नक़्क़ाद के तौर पर भी जाना जाता है।

आम आदमी की ज़िंदगी का आईना

सुहैल आज़मी ने बेशुमार कहानियां लिखीं और असल ज़िंदगी को उनमें उतारने की कामयाब कोशिश की। उनके अफ़सानों के मौज़ूआत का दायरा बड़ा वसीअ है। प्रेमचंद की रवायत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने देहाती ज़िंदगी को अपना मौज़ू बनाया, मगर शहरी दुनिया को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया। तरक़्क़ी-पसंद तहरीक का असर उनकी तहरीर पर साफ़ नज़र आता है उन्होंने ग़रीबों और मज़लूमों की आवाज़ बुलंद की और उनकी मुश्किलों को अपने अफ़सानों में बख़ूबी पेश किया।

तेरी बे-पर्दगी ही हुस्न का पर्दा निकली
काम कुछ कर गई हर हाल में ग़फ़लत मेरी

नक़्क़ाद वक़ार अज़ीम के अल्फ़ाज़ में, सुहैल के अफ़साने ज़िंदगी या फ़न पर तंज़ का बोझ नहीं डालते, न ही उनमें कोई तल्ख़ी है उनमें अदब तो है, मगर शायराना मुबालग़ा नहीं। यही ज़िंदगी की सच्चाई है, बस थोड़ी भीड़-भाड़ के साथ पेश की गई। उनके अफ़साने “आलाव” (1942) और “चार चेहरे” (1977) समेत कई किताबें उनके फ़न की गवाही देती हैं।

कोई महफ़िल से उठ कर जा रहा है
संभल ऐ दिल बुरा वक़्त आ रहा है

सुहैल आज़मी का इंतक़ाल 28 नवंबर 1979 को इलाहाबाद में हुआ, उस वक़्त उनकी उम्र 68 बरस थी। उन्हें पटना के शाहगंज क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

सुहैल आज़मी की शख़्सियत उस पटना (आज़मआबाद) की अदबी रिवायत का हिस्सा है, जिसने उर्दू अदब को शाद आज़मी की ग़ज़लगोई, बिस्मिल आज़मी की इन्क़लाबी शायरी, और सुहैल आज़मी की अफ़साना-निगारी और तरक़्क़ी-पसंद फ़िक्र जैसी अनमोल सौग़ातें दीं। उनका काम आज भी इस बात की गवाही देता है कि अदब सिर्फ़ ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि समाज की सच्चाई को आईना दिखाने का एक ज़रिया भी हो सकता है।

ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स  

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