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आदि ग्रंथ से श्री Guru Granth Sahib तक: 422 साल का ऐतिहासिक सफ़र

Guru Granth Sahib (गुरु ग्रंथ साहिब) पूरी इंसानियत के शब्द गुरु हैं। पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जन देव जी ने पूरी इंसानियत की भलाई के लिए गुरुओं, भक्तों और गुरु घर से जुड़े करीबी सिख श्रद्धालुओं की पवित्र बाणी को एक जगह जमा किया। इस काम में भाई गुरदास जी ने भी उनका साथ दिया। इसी तरह आदि ग्रंथ साहिब को तैयार किया गया।

आदि ग्रंथ साहिब में ऐसी बाणी को जगह दी गई, जो गुरमत की सोच के मुताबिक थी और धर्म, जाति, जगह, भाषा, गरीबी या अमीरी जैसी सीमाओं से ऊपर थी। इस बाणी ने उन लोगों को भी बराबरी का एहसास दिलाया, जिन्हें उस दौर में उनकी जाति और जन्म की वजह से समाज से दूर रखा जाता था। बाणी ने हर इंसान को बराबर समझने, अपने सम्मान के साथ जीने और जाति-धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का पैग़ाम दिया।

सिख गुरुओं में से छह गुरुओं की बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज है। इनमें श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी, श्री गुरु रामदास जी, श्री गुरु अर्जन देव जी और श्री गुरु तेग बहादुर जी शामिल हैं।

गुरुओं के अलावा 15 भक्तों की बाणी भी इसमें शामिल है। इनमें भक्त जैदेव, बाबा शेख़ फरीद, भक्त सदना, भक्त त्रिलोचन, भक्त नामदेव, भक्त सैन, भक्त रामानंद, भक्त रविदास, भक्त कबीर, भक्त बेनी, भक्त धन्ना, भक्त पीपा, भक्त सूरदास, भक्त भीखन और भक्त परमानंद के नाम शामिल हैं। इसके अलावा 11 भट्टों की बाणी भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज है। इनमें कल्ह, नल्ह, गयंद, भिखा, सल्ह, कीरत, भल्ह, मथुरा, बल्ह, जालप और हरिबंस शामिल हैं।

गुरुओं, भक्तों और भट्टों के अलावा गुरु घर से जुड़े चार करीबी सिखों की बाणी भी आदि ग्रंथ साहिब में शामिल की गई। इनमें भाई मरदाना, राय बलवंड, सत्ता डूम और बाबा सुंदर के नाम शामिल हैं। इस तरह Guru Granth Sahib (गुरु ग्रंथ साहिब) की बाणी अलग-अलग धर्मों, जातियों, जगहों और समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाली आवाज़ों को एक साथ जोड़ती है। इसका पैग़ाम इंसान को बराबरी, भाईचारे, रहम-दिली और इंसानियत के साथ जीने की राह दिखाता है।

Pic Credit: Social Media

पुराने समय से ही भारत में वेदों के चलन के बाद लोगों को उनके काम के आधार पर अलग-अलग वर्णों और तबकों में बांटा गया था। उस समय समाज में चार मुख्य वर्ण माने जाते थे—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ये चारों वर्ग हिंदू धर्म से जुड़े हुए थे। समय बीतने के साथ मध्यकाल में भारत में इस्लाम धर्म भी फैलने लगा। साल 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने पहली बार भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हमला किया और यहीं बस गया।

उसके साथ कई दूसरे लोग भी भारत आए, जो इस्लाम धर्म को मानते थे। उनके अपने रीति-रिवाज, रहन-सहन और पहनावे थे। इस तरह हिंदू धर्म के साथ-साथ इस्लाम भी भारत के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगा। इसके बाद गजनवी और गोरी के हमलों के बाद उत्तर भारत के कई इलाकों में मुस्लिम हुकूमत का असर बढ़ता गया। दिल्ली सल्तनत के दौर के बाद दिल्ली की गद्दी पर लोदी वंश का राज आया। लोदी वंश के तीन शासकों ने दिल्ली पर हुकूमत की—पहले बहलोल लोदी, फिर सिकंदर लोदी और उसके बाद इब्राहिम लोदी।

बहलोल लोदी के दौर में ही गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ। गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं के दौरान भारत और दूसरे इलाकों में जाकर लोगों को इंसानियत, बराबरी और एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहने का पैग़ाम दिया। गुरु नानक देव जी की यही सोच और उनकी दी हुई सीख आगे चलकर एक अलग धार्मिक राह के रूप में सामने आई। इसी वजह से नानक पातशाह, गुरु नानक देव जी को सिख धर्म का संस्थापक और पहला गुरु माना जाता है।

15वीं सदी की शुरुआत में भारत के सामाजिक हालात बहुत ख़राब हो चुके थे। हिंदू और मुस्लिम समाज में कई तरह की कुरीतियां और गलत रिवाज बढ़ गए थे। पूरा समाज ऐसे रीति-रिवाजों में उलझा हुआ था, जिनका इंसान की असली ज़िंदगी और सच्चाई से कोई सीधा ताल्लुक नहीं था। लोग ज़िंदगी की असली सच्चाई से बहुत दूर हो चुके थे।

ऐसे दौर में गुरु नानक पातशाह ने अपनी बाणी के ज़रिए लोगों को सही राह दिखाई। उन्होंने इंसानियत, बराबरी और सच्चाई का पैगाम दिया। गुरु नानक देव जी के बाद सिख धर्म के दूसरे गुरु गुरु अंगद देव जी ने लंडा लिपि में सुधार करके गुरमुखी लिपि को आगे बढ़ाया। उन्होंने गुरु नानक देव जी की बाणी और उनके ज़रिए जमा किए गए दूसरे भक्तों और भट्टों के शब्दों को एक जगह इकट्ठा करके उन्हें एक सिलसिले में रखा। गुरु अंगद देव जी के बाद गुरु अमरदास जी और फिर गुरु रामदास जी ने भी इस काम को आगे बढ़ाया।

गुरु रामदास जी के बाद उनके सबसे छोटे बेटे गुरु अर्जन देव जी पांचवें गुरु बने। गुरु अर्जन देव जी के लिए बचपन से ही एक आशीर्वाद कहा जाता था—“दोहिता बाणी का बोहिथा”। ये आशीर्वाद गुरु अमरदास जी ने उनकी पैदाइश के समय दिया था।

गुरु अर्जन देव जी ने पहले चार गुरुओं की बाणी के साथ 15 भक्तों और 11 भट्टों की बाणी भी इकट्ठा की। इसके साथ उन्होंने अपनी 2216 बाणियां भी इसमें शामिल की। इस पूरी बाणी को उन्होंने उस दौर के ज्ञानी और विद्वान भाई गुरदास जी से लिखवाकर एक बीड़ तैयार करवाई। इसे आदि ग्रंथ का नाम दिया गया। गुरुओं, भक्तों और भट्टों के अलावा आदि ग्रंथ में गुरु घर से जुड़े चार करीबी सिखों की बाणी भी शामिल की गई। इनकी बाणी को सिख सोच और उसूलों के मुताबिक सही माना गया।

Pic Credit: Social Media

आदि ग्रंथ में टोटल 1430 अंग (पन्ने) हैं। ये बाणी का एक बड़ा और विस्तृत ग्रंथ है। सिख धर्म में इसे सबसे पाक और अहम ग्रंथ माना गया और इसमें दर्ज बाणी को सिखों के लिए राह दिखाने वाली माना गया। आदि ग्रंथ का संकलन अगस्त 1604 ईस्वी में श्री गुरु अर्जन देव जी ने भाई गुरदास जी से पूरा करवाया। इसके बाद सितंबर 1604 ईस्वी में पहली बार अमृतसर के हरमंदिर साहिब में आदि ग्रंथ को स्थापित किया गया।

धुर की वाणी आई ॥
तिन सगली चिंता मिटाई ॥

सितंबर 1604 ईस्वी में श्री हरमंदिर साहिब में आदि ग्रंथ को सजाकर स्थापित कर दिया गया। अब गुरु घर के सामने एक बड़ा सवाल था कि आदि ग्रंथ की देखरेख कौन करेगा? उस समय सिख धर्म में सबसे समझदार और गुरुओं के साथ सबसे ज़्यादा वक़्त गुज़ार चुके शख़्स बाबा बुड्ढा जी थे। बाबा बुड्ढा जी धार्मिक और रूहानी सोच रखने वाले इंसान थे। उनकी इसी सोच और समझ को देखते हुए उन्हें हरमंदिर साहिब का पहला हेड ग्रंथी भी बनाया गया।

आदि ग्रंथ में 1430 अंग (पन्ने) और 5894 शब्द दर्ज हैं। इसका बड़ा हिस्सा 31 मुख्य रागों में बांटा गया है। आदि ग्रंथ को लिखने के लिए भाई गुरदास जी ने कई भाषाओं का इस्तेमाल किया। ये ग्रंथ गुरमुखी लिपि में लिखा गया, लेकिन इसमें पंजाबी, संस्कृत, हिंदी, ब्रज, बागड़ी, अवधी, भोजपुरी, सिंधी, मराठी, मारवाड़ी, बंगाली, फारसी और अरबी जैसी अलग-अलग भाषाओं के शब्द और बोलियां मिलती हैं।

इन अलग-अलग भाषाओं को शामिल करने की वजह ये थी कि अलग-अलग इलाकों और तबकों के लोगों तक बाणी का पैग़ाम पहुंच सके। गुरु अर्जन देव जी ने भाई गुरदास जी से आदि ग्रंथ लिखवाने से पहले पहले तीन गुरुओं की बाणी और शब्द बाबा मोहन जी से हासिल किए थे। बाबा मोहन जी, गुरु अमरदास जी के बेटे थे।

गुरु अर्जन देव जी के बाद उनके भतीजे गुरु हरगोबिंद साहिब जी, जिन्हें सिख परंपरा में नानक पातशाह की छठी ज्योत माना जाता है, ने गुरु गद्दी संभाली। गुरु हरगोबिंद साहिब जी के घर पांच बेटे और एक बेटी हुई। उनके नाम थे—बाबा गुरदित्ता जी, अनी राय, अटल राय, तेग मल, सूरज मल और बीबी वीरो जी।

Pic Credit: SikhiWiki

बाबा गुरदित्ता जी बहुत नेक और रूहानी शख्स़ियत थे। उनके बेटे गुरु हर राय जी को नानक पातशाह की सातवीं ज्योत के रूप में गुरु गद्दी दी गई। लेकिन बाबा गुरदित्ता जी के दूसरे बेटे बाबा धीर मल जी को ये बात अच्छी नहीं लगी। गुरु घर से ताल्लुक रखने की वजह से उनके पास हाथ से लिखी हुई आदि ग्रंथ की बीड़ भी थी।

गुरु हर राय जी के बाद उनके बेटे गुरु हरकृष्ण जी को गुरु गद्दी मिली। इसके बाद गुरु हरकृष्ण जी के बाद गुरु हरगोबिंद साहिब जी के बेटे तेग मल जी, जो आगे चलकर गुरु तेग बहादुर जी के नाम से जाने गए, को सिख धर्म का नौवां गुरु बनाया गया।

लेकिन बाबा धीरमल जी के दिल में गुरु गद्दी को लेकर ख़्वाहिश अभी भी बाकी थी। साथ ही, उनके अंदर गुरु घर की तरफ़ से आगे बढ़ रहे गुरुओं को लेकर जलन और नाराज़गी भी बनी हुई थी। जब मक्खन शाह लुबाना ने बाबा बकाला में “गुरु लाधो रे” का ऐलान किया और गुरु तेग बहादुर जी को सिख धर्म का नौवां गुरु माना गया, तो बाबा धीर मल ईर्ष्या और गुस्से से भर गया। उसने अपने कई मसंदों को लालच देकर गुरु तेग बहादुर जी पर हमला भी करवाया।

धीरमल के एक मसंद शीहा ने गुरु तेग बहादुर जी पर गोली तक चला दी। लेकिन परमात्मा की मेहर से गुरु जी बच गए और उन्हें सिर्फ मामूली चोट आई। इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी ने वहां की मुश्किलें छोड़कर माझे का इलाका भी छोड़ दिया और कीरतपुर साहिब आ गए। यहां उन्होंने एक नया नगर बसाया, जिसका नाम चक्क नानकी रखा गया। वक़्त के साथ यही चक्क नानकी आगे चलकर श्री आनंदपुर साहिब के नाम से जाना गया।

इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी ने इंसानियत और धर्म की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उनकी शहादत के बाद सिख इतिहास में कई बड़े और अहम वाक़ये हुए। खालसा पंथ की स्थापना हुई। गुरु गोबिंद सिंह जी को आनंदपुर साहिब का किला छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद चमकौर में ज़बरदस्त जंग हुई, जहां बड़े साहिबज़ादों ने 40 सिखों के साथ शहादत पाई।

वहीं छोटे साहिबज़ादों को भी ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया गया। इन तमाम मुश्किल दौर से गुज़रने के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी तलवंडी साबो पहुंचे। मुग़ल और पहाड़ी फौजों के साथ जंग के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने आदि ग्रंथ में अपने पिता गुरु तेग बहादुर जी की बाणी को शामिल करने का फैसला किया। इसके बाद आदि ग्रंथ को आगे बढ़ाने और पूरा करने का काम शुरू हुआ।

Pic Credit: Social Media

जब आनंदपुर का किला छोड़ने के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी का परिवार सिरसा के तट पर बिछड़ गया, तब सरसा के तेज़ बहाव में गुरु जी के पास मौजूद लिखित स्वरूप भी बह गए। इसके बाद गुरु जी ने अपने कुछ सिंहों को तलवंडी साबो से बाबा धीर मल जी के पास भेजा, ताकि पुरानी बीड़ वापस लाई जा सके। लेकिन बाबा धीरमल जी ने वो बीड़ देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये हमारे पुरखों की निशानी है, इसे हम क्यों दें?

उन्होंने गुरु जी से कहा कि अगर आप नानक पातशाह की दसवीं ज्योत कहलाते हैं और इतने ही सामर्थ्यवान हैं, तो खुद ही क्यों नहीं लिख लेते। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने ये सेवा भाई मनी सिंह जी को सौंपी। गुरु जी बाणी का उच्चारण करते जाते और भाई मनी सिंह जी उसे लिखते जाते।

गुरु गोबिंद सिंह जी पूरे नौ महीने दमदमा साहिब बठिंडा की धरती पर रहे। इसी दौरान उन्होंने एक नए ग्रंथ को तैयार करवाया। इसमें पहले पांच गुरुओं, 15 भक्तों, 11 भट्टों, गुरु घर से जुड़े चार करीबी सिखों और नौवें पातशाह गुरु तेग बहादुर जी की बाणी को शामिल किया गया।

इस नए स्वरूप को आगे चलकर Guru Granth Sahib (गुरु ग्रंथ साहिब) जी का नाम दिया गया। ग्रंथ, जिसे गुरु अर्जन देव जी ने तैयार करवाया था, उसमें रहरास साहिब के पांच शब्द दर्ज थे। बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी ने जिस स्वरूप को तैयार करवाया, उसमें रहरास साहिब के नौ शब्द दर्ज किए गए। इनका पाठ आज भी संगत हर रोज़ करती है। दोनों रूपों का आनंद अठारह दस बीस पर ही है।

दोनों स्वरूपों का भोग एक ही अंग पर—1430वें अंग पर—होता है। साल 1708 ईस्वी में नांदेड़ साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने आखिरी समय में Guru Granth Sahib (गुरु ग्रंथ साहिब) जी को सिखों का अगला और सदा के लिए गुरु घोषित किया। इसके बाद से सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शब्द गुरु के रूप में माना जाता है।

आज पंजाब और देश के दूसरे हिस्सों में मौजूद सिख गुरुद्वारों में गुरु गोबिंद सिंह जी के बाद Guru Granth Sahib (गुरु ग्रंथ साहिब) जी का प्रकाश किया जाता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के संशोधित नानकशाही कैलेंडर के मुताबिक, साल 2026 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का 422वां पहला प्रकाश पर्व मनाया जा रहा।

इस मौके पर श्री दरबार साहिब, अमृतसर में गुरु घर के श्रद्धालुओं और प्रबंधकों की तरफ़ से फूलों से सजावट की सेवा शुरू की गई। करीब 50 से 60 किस्मों के रंग-बिरंगे देशी और विदेशी ख़ुशबूदार फूलों से सजावट की गई। ये सजावट 11 सितंबर तक पूरी हो गई और 12 सितंबर को 422वां पहला प्रकाश पर्व श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया गया।

लेख: प्रो. रविंदर सिंह

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