Thursday, October 15, 2026
24.8 C
Delhi

मौलवी मुहम्मद बक़र: हिंदू-मुस्लिम इत्तिहाद का वो अलमबरदार, जिसे कलम की सज़ा मिली 

आज ही के दिन 16 सितंबर ठीक 169 साल पहले, 1857 में, दिल्ली की गलियों में एक क़लम हमेशा के लिए ख़ामोश कर दी गई थी। ये क़लम थी मौलवी मुहम्मद बक़र की, जिन्हें आज हिंदुस्तानी सहाफ़त (पत्रकारिता) का पहला शहीद माना जाता है। उनकी बरसी हमें ये याद दिलाने का मौक़ा देती है कि सच बोलने और लिखने की क़ीमत कभी-कभी जान देकर चुकानी पड़ती है।

दिल्ली की मिट्टी से उठा एक रोशन ज़ेहन

मौलवी मुहम्मद बक़र की पैदाइश तक़रीबन 1780 में दिल्ली में हुई। उनकी शुरुआती तालीम उनके वालिद के साये में हुई, जो ख़ुद एक बड़े आलिम थे। बाद में 1825 में उन्होंने दिल्ली कॉलेज का रुख़ किया, जहां अरबी, फ़ारसी और मग़रिबी (पश्चिमी) फ़िक्र से भी उनका वास्ता पड़ा। 1828 में वो उसी कॉलेज में मुदर्रिस (अध्यापक) मुक़र्रर हुए और क़रीब छह बरस तक तदरीस (शिक्षण) से जुड़े रहे। उस दौर की दिल्ली इल्मी सरगर्मियों का मरकज़ थी, और इसी माहौल ने बक़र की सोच को नई सिम्त (दिशा) दी।

1843 में उन्होंने कश्मीरी गेट के नज़दीक एक इमामबाड़ा आज़ाद मंज़िल तामीर करवाया, जो सिर्फ़ शियों के लिए नहीं बल्कि सुन्नियों और हिंदुओं तक के लिए एक साझा मजलिस-गाह था। यहां तक कि इब्राहीम ज़ौक़ और मोमिन ख़ान मोमिन जैसे बड़े शायर भी मर्सिया-ख़्वानी में शरीक होते थे। बक़र ने अपने इमामबाड़े में तबर्रा (फ़िरक़ावाराना नारेबाज़ी) की मनाही कर रखी थी ये उनकी उस वसीअ-उल-क़ल्बी (उदार सोच) की मिसाल है, जो आगे चलकर उनकी सहाफ़त में भी नज़र आई।

देहली उर्दू अख़बार: सच की आवाज़

1834 में जब अंग्रेज़ी हुकूमत ने प्रेस एक्ट में तरमीम करके अख़बार निकालने की इजाज़त दी, तो बक़र ने इस मौक़े को हाथों-हाथ लिया। एक छापाख़ाना ख़रीदा, और 1835 में “देहली उर्दू अख़बार” के नाम से हफ़्तावार अख़बार जारी किया। ये दिल्ली का पहला उर्दू अख़बार था, और तक़रीबन 21 साल तक छपता रहा। उर्दू सहाफ़त की तारीख़ में एक संगे-मील।

उस दौर में ज़्यादातर अख़बार अंग्रेज़ हुकूमत की तरफ़दारी करते थे, मगर बक़र का अख़बार अलग राह पर चला। इसमें किसानों, कारीगरों और आम अवाम की तकलीफ़ों को जगह मिलती थी, और नौआबादियाती (औपनिवेशिक) नीतियों पर बेबाक तन्क़ीद होती थी। दिल्ली की गलियों में कहा जाता था  “बक़र का अख़बार पढ़ो, सच का पता चल जाएगा।”

1857 का इन्क़लाब और बक़र की बेबाक सहाफ़त

जब मई 1857 में मेरठ से उठी बग़ावत की चिंगारी दिल्ली तक पहुंची, तो देहली उर्दू अख़बार इस इन्क़लाब की सबसे बुलंद आवाज़ बन गया। 12 जुलाई 1857 को बक़र ने अपने अख़बार का नाम बदलकर “अख़बार-उज़-ज़फ़र” रख दिया। आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र, जिनके इर्द-गिर्द बाग़ी फ़ौजें जमा हुई थीं, उनके नाम पर ये एक ख़िराज-ए-तहसीन था। यहां तक कि अंग्रेज़ों के सबत की मुख़ालफ़त में उन्होंने अख़बार निकालने का दिन भी शनिवार से बदलकर इतवार कर दिया।

बक़र सिर्फ़ बादशाह की हुकूमत की बहाली नहीं चाहते थे। उनके लिए ये लड़ाई पूरे मुल्क की आज़ादी की लड़ाई थी। उन्होंने अपने अख़बार के ज़रिए हिंदू-मुस्लिम इत्तिहाद पर ख़ास ज़ोर दिया। 4 जून 1857 के अंक में उन्होंने दोनों फ़िरक़ों से अपील की कि ये मौक़ा हाथ से न जाने दें, क्योंकि अंग्रेज़ी हुकूमत से नजात पाने का ऐसा मौक़ा दोबारा नहीं आएगा। जब कारतूसों में गाय की चर्बी इस्तेमाल होने की ख़बर फैली, तो बक़र ने साफ़ लिखा कि अगर आज हिंदुओं की दिल-आज़ारी हो रही है तो कल मुसलमानों की बारी आ सकती है। इसलिए दोनों को मुत्तहिद रहना चाहिए।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शफ़े क़िदवई उन्हें उर्दू सहाफ़त का पहला “स्पॉट रिपोर्टर” क़रार देते हैं। बक़र ख़ुद सड़कों पर निकलकर हालात का जायज़ा लेते, गोलियों की आवाज़ के बीच से गुज़रते, और अपने क़ारेईन (पाठकों) तक चश्मदीद ग़वाही पहुंचाते। ये आज की इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म का पहला नमूना कहा जा सकता है।

गिरफ़्तारी और शहादत

14 सितंबर 1857 को अंग्रेज़ी फ़ौज ने कश्मीरी गेट से दिल्ली में दाख़िल होकर शहर पर क़ब्ज़ा जमा लिया। उसी दिन मौलवी मुहम्मद बक़र को गिरफ़्तार कर लिया गया। दो दिन बाद, 16 सितंबर 1857 को, मेजर विलियम स्टीफन रेक्स हडसन के सामने उन्हें पेश किया गया और बग़ैर किसी मुक़दमे के उनकी शहादत का हुक्म सुना दिया गया। कुछ रिवायतों के मुताबिक़ उन्हें गोली मारी गई, जबकि कुछ तवारीख़ी बयानात जिनमें मशहूर रूसी मुसव्विर वसीली वेरेशचागिन की 1884 की पेंटिंग भी शामिल है उन्हें तोप के मुंह से उड़ाए जाने का मंज़र पेश करते हैं। तफ़सील चाहे जो भी हो, ये तय है कि बक़रको इंसाफ़ का कोई मौक़ा दिए बग़ैर मौत के घाट उतार दिया गया।

दिलचस्प बात ये है कि जब बक़र की जान ली जा रही थी, उस वक़्त तक मुग़ल सल्तनत रस्मी तौर पर ख़त्म भी नहीं हुई थी और बादशाह ज़फ़र अब भी क़िले में मौजूद थे।

विरासत जो आज भी ज़िंदा है

मौलवी मुहम्मद बक़र की शहादत ने हिंदुस्तानी सहाफ़त को एक नई पहचान दी। उनके बाद गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी जैसी शख़्सियतों ने भी क़लम को हथियार बनाया। मगर पहली मिसाल बक़र ने ही क़ायम की थी।

आज, जब हिंदुस्तान दुनिया के सबसे बड़े जम्हूरी (लोकतांत्रिक) मुल्क के तौर पर जाना जाता है, प्रेस की आज़ादी और सहाफ़ियों की हिफ़ाज़त के सवाल अब भी बाक़ी हैं। मौलवी मुहम्मद बक़र की 169वीं बरसी हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि सहाफ़त का मक़सद ताक़तवर की ख़िदमत नहीं, बल्कि अवाम की आवाज़ बनना है  और कभी-कभी इस ख़िदमत की क़ीमत सबसे बड़ी क़ुर्बानी होती है।

ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स  

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories