नई दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट्स म्यूज़ियम में इन दिनों एक ऐसा बाज़ार सजा है, जहां दुनिया की सरहदें सिमट कर एक छोटे से आंगन में समा गई हैं। ब्रिक्स समिट के साथ-साथ चल रहे इस बाज़ार का नाम है। BRICS Bazaar: Crafting Cultures, Connecting People। यहां ब्राज़ील की मिट्टी से ढली कलाकृतियां हैं, बेलारूस की विलो-बुनाई की टोकरियां हैं, ईरान की बलूची कढ़ाई के नफ़ीस टुकड़े हैं, कज़ाख़स्तान की चांदी में जड़े अमूर्त नग़्मे हैं, चीन की सूज़ौ कढ़ाई की बारीकियां हैं, और दक्षिण अफ़्रीका की ज़ुलु चमड़ा-शिल्प की महक है।

मिट्टी से रूह तक
ब्राज़ील की मिट्टी कला (clay art) अमेरिकी महाद्वीप की सबसे पुरानी जीवित परंपराओं में से एक है। आदिवासी समुदाय नदियों के किनारे की चिकनी मिट्टी से बर्तन गढ़ते थे, फिर पुर्तगाली और अफ़्रीकी तकनीकों ने इसमें घुल-मिल कर एक नया रंग भर दिया। इस बाज़ार में ब्राज़ील के कलाकार की मिट्टी की मूर्तियां दर्शकों को यह एहसास कराती हैं कि कला की जड़ें जितनी गहरी हों, उतनी ही वह सरहदों से ऊपर उठती हैं।

बेलारूस की विलो बुनाई की बात करें तो यह एक ऐसी विरासत है जो मिट्टी के बर्तनों और कपड़े बुनने से भी पुरानी है। लचीली विलो टहनियों से टोकरियां, फ़र्नीचर और सजावटी चीज़ें बनाई जाती हैं। बेलारूस की मशहूर कारीगर लाना स्लास्ट्सियोन के लिडरशिप में वर्बाचका समूह यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा है।

धागों में क़ैद तारीख़ें
ईरान की बलूची कढ़ाई (Balochi embroidery) को नादिया करीमी ने यहां ज़िंदा रखा है। यह कला बलूच महिलाओं की पहचान और विरासत से जुड़ी है, जो मां से बेटी तक पीढ़ियों से चली आ रही है। हर नक़्श और मोटिफ़ बिना मशीन के, सिर्फ़ रेशम के धागे और सुई से हाथ से तैयार होता है। इसी बाज़ार में ईरान की गीलान प्रांत की अमेनेह सिद्दीक़ी रश्ती-दोज़ी (Rashti-doozi) कढ़ाई लेकर आई हैं। एक ऐसी कला जो ईसा से 330 से 550 साल पहले की है और जिसे पहले मर्द किया करते थे, अब औरतें करती हैं।

चीन की सूज़ौ कढ़ाई का ज़िक्र होते ही दोनों हाथों की बारीकी का ख़याल आता है—एक ही धागे को इतने हिस्सों में बांटना कि आंखें धोखा खा जाएं। यह कला यहां भारतीय दर्शकों के लिए भी किसी जादू से कम नहीं।

चांदी और चमड़े की ज़ुबां
कज़ाख़स्तान के कलाकार-जौहरी सेरिक रिस्बेकोव की चांदी की कलाकृतियां पारंपरिक कज़ाख़ नक़्शों को मॉडर्न डिज़ाइन के साथ पेश करती हैं। गर्म इनेमल, नैचुरल पत्थर और चांदी तीनों मिलकर एक ऐसी ज़ुबां बोलते हैं जिसे सरहद की भाषा समझने की ज़रूरत नहीं होती।

दक्षिण अफ़्रीका की ज़ुलु चमड़ा कला में जंगली जानवरों की खाल से बने बैग, जूते और सजावटी सामान अपनी मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए हैं। ये कला ज़ुलु संस्कृति की वीरता और प्रकृति से जुड़ाव की कहानी कहती है।
क्या ये सिर्फ़ बाज़ार है?
ब्रिक्स बाज़ार इसका जीता-जागता सबूत है कि जब देश एक-दूसरे की मिट्टी, धागे, चांदी और चमड़े को छूते हैं, तो कूटनीति से पहले संस्कृति बात करती है।

भारत के विदेश मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह बाज़ार 10 से 15 सितंबर तक चलेगा। ईरानी राष्ट्रपति की बेटी ज़हरा पेज़ेशकियान भी इस बाज़ार में आईं और उन्होंने ईरानी शिल्प को करीब से देखा। कश्मीर और ईरान की कढ़ाई में जो समानता दिखती है, वह सदियों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों की गवाह है।
ब्रिक्स बाज़ार सिर्फ़ हस्तशिल्प की प्रदर्शनी नहीं है। ये उस दुनिया की तस्वीर है जहां ब्राज़ील की मिट्टी, ईरान का धागा, कज़ाख़स्तान की चांदी और दक्षिण अफ़्रीका का चमड़ा एक ही मेज़ पर अपनी-अपनी कहानी बयान करते हैं और सब मिलकर एक ही बात कहते हैं- हम अलग-अलग हैं, मगर एक ही मिट्टी से बने हैं।
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