सदियों से अपने हुस्न, अपनी शिकारों और अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर ये घाटी, इन दिनों एक नए किरदार में ढल रही है- सिनेमा की सरज़मीन के किरदार में। दुनियाभर से फ़िल्मकार, कलाकार और मेहमान वादी में पहुंच रहे हैं, मानो कश्मीर एक बार फिर दुनिया को अपनी तरफ़ बुला रहा हो। जम्मू-कश्मीर का पहला अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल (IFFJK) इन दिनों घाटी में चल रहा है। 7 सितंबर से शुरू हुआ ये चार दिन का ईवेंट दुनियाभर के फ़िल्मकारों, कलाकारों और मेहमानों को एक मंच पर ला रहा है। फेस्टिवल की थीम “रंग-ए-सिनेमा” है।
कितना बड़ा है IFFJK Festival?
इस फेस्टिवल के लिए दुनिया-भर के 92 देशों से क़रीब 1,100 फ़िल्में भेजी गई हैं, जिनमें से 40 से ज़्यादा देशों की 135 फ़िल्में चुनी गईं। इनमें भारत सबसे आगे है 64 फ़िल्मों के साथ उसके बाद फ्रांस और ईरान का नंबर आता है। फ़िल्में कई कैटेगरी में दिखाई जा रही हैं, जैसे इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन, भारत पैनोरमा, वर्ल्ड सिनेमा, डॉक्यूमेंट्री और जम्मू-कश्मीर सिलेक्ट।
इनाम की रक़म भी शानदार है कुल मिलाकर 96 लाख रुपये नौ अवॉर्ड्स के लिए रखे गए हैं। बेस्ट फ़िल्म को 25 लाख रुपये मिलेंगे, जबकि बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर को 15-15 लाख रुपये। स्थानीय कहानियों (local stories) को बढ़ावा देने के लिए एक ख़ास जम्मू-कश्मीर सिलेक्ट अवॉर्ड भी रखा गया है, जिसकी क़ीमत 10 लाख रुपये है।
कहां-कहां होगा नज़ारा
फेस्टिवल का ज़्यादातर हिस्सा डल झील के किनारे मौजूद शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (SKICC) और श्रीनगर के INOX में हो रहा है। इसके अलावा जम्मू में भी स्क्रीनिंग्स रखी गई हैं, और गुलमर्ग में एक ख़ास दिन का प्रोग्राम भी है वही गुलमर्ग, जो गर्मियों में फूलों की ख़ुशबू से महकता है और सर्दियों में एशिया के बेहतरीन स्की रिज़ॉर्ट्स में गिना जाता है।
डल झील पर चला तैरता सिनेमाघर
सबसे दिलचस्प चीज़ पहले ही दिन देखने को मिली। डल झील पर एक तैरता हुआ सिनेमाघर बनाया गया, जहां 1961 की क्लासिक फ़िल्म “जंगली” दिखाई गई, जिसकी शूटिंग बड़े पैमाने पर कश्मीर में हुई थी। आने वाले दिनों में “आरज़ू”, “कश्मीर की कली” और “कभी कभी” जैसी पुरानी, कश्मीर में फ़िल्माई गई फ़िल्में भी दिखाई जाएंगी।

फेस्टिवल का उद्घाटन (inauguration) चीफ़ सेक्रेटरी अटल डुल्लू ने INOX में किया। उन्होंने कहा कि यह फेस्टिवल जम्मू-कश्मीर को दुनिया की फ़िल्म इंडस्ट्री से दोबारा जोड़ने का एक मौक़ा है, साथ ही यहां के youngster को डायरेक्शन, सिनेमैटोग्राफ़ी, एक्टिंग, म्यूज़िक और तकनीकी कामों में आगे बढ़ने का रास्ता भी देगा। स्थानीय कलाकार बिंदिया टिक्कू और शब्बीर अहमद ने इस प्लेटफ़ॉर्म का स्वागत किया, जबकि दिग्गज अभिनेता-निर्माता अकबर ख़ान ने याद दिलाया कि कश्मीर कभी बॉलीवुड का “आउटडोर स्टूडियो” हुआ करता था।
उद्घाटन फ़िल्म रही लेबनान की “डेड डॉग” (सारा फ्रांसिस की बनाई हुई), जिसके बाद मलेशिया की “द लास्ट राइट्स” और कई ईरानी फ़िल्में भी दिखाई गईं।
जूरी की कमान संभाल रहे हैं मशहूर सिनेमैटोग्राफ़र संतोष सिवन, और उनके साथ हैं बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल की डोरोथी वेनर, जापान की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर केइको बांग, नेशनल अवॉर्ड विजेता हिमांशु शेखर खटुआ, और मशहूर डायरेक्टर श्रीराम राघवन।
फेस्टिवल में विधु विनोद चोपड़ा, रमेश सिप्पी, इम्तियाज़ अली, पंकज त्रिपाठी, अनिल मेहता जैसे बड़े नाम भी बतौर ख़ास मेहमान मौजूद रहे । दुनिया-भर से 300 से ज़्यादा डेलिगेट्स इस Festival में हिस्सा ले रहे हैं। मास्टरक्लास, वर्कशॉप और राउंडटेबल सेशंस भी रखे गए हैं, जहां university के छात्रों को इंडस्ट्री के दिग्गजों से सीधे बातचीत का मौक़ा मिल रहा है।

संगीत की सुरीली शाम
opening ceremony में जान निसार लोन, रानी हज़ारिका और पलक मुच्छल की परफ़ॉर्मेंस ने माहौल में रंग भर दिए। जान निसार लोन जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक़ रखने वाले गायक, संगीतकार और म्यूज़िक एंटरप्रेन्योर हैं, जो ARMS रिकॉर्ड लेबल के फ़ाउंडर भी हैं और कश्मीरी संगीत को दुनिया-भर तक पहुंचाने की कोशिशों में जुटे रहे हैं। वे फ़िलहाल BRICS कल्चर मीडिया फ़ोरम के ग्लोबल प्रेसिडेंट हैं और मॉस्को में हुए इंटरविज़न म्यूज़िक कॉम्पिटिशन में भारत की नुमाइंदगी भी कर चुके हैं, जहां उन्होंने इंटरनेशनल जूरी में भी हिस्सा लिया।
बॉलीवुड सिंगर सुनिधि चौहान भी डेलिगेट्स से रूबरू होंगी। गाना गाने के बजाय वे अपने करियर के अनुभव (Experience) साझा करेंगी, एक बातचीत सेशन के ज़रिए। और फेस्टिवल की Closing उषा उत्थुप की आवाज़ के साथ के साथ होगा, जिनका संगीत सफ़र दशकों पुराना और बेमिसाल है।
DIPR के जॉइंट डायरेक्टर शाहनवाज़ बुख़ारी कहते हैं कि इस पूरी कोशिश का मक़सद कश्मीर को फिर से “फ्रेम में” लाना है याद दिलाना कि बॉलीवुड की तरक़्क़ी के दिनों में फ़िल्में बड़े पैमाने पर इसी ख़ूबसूरत घाटी में शूट होती थीं। Administration ने डेलिगेट्स की मदद के लिए 25 लायज़न ऑफ़िसर तैनात किए हैं, और VVIP मूवमेंट की वजह से SKICC के आस-पास ट्रैफ़िक पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं।
सरकार का इरादा साफ़ है इस फेस्टिवल को हर साल कराना, कान्स जैसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल्स को देखकर सीखते हुए। फ़िल्मों के ज़रिए यहां घूमने-फिरने वालों को बढ़ावा देना, यहां की पुरानी परंपराओं, खान-पान और हाथ से बनी चीज़ों को दुनिया के सामने लाना।
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