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सज्जाद ज़हीर: तरक़्क़ीपसंद अदब और नई फ़िक्र के अलमबरदार

“जहन्नुम को भर देंगे शायर हमारे” यह जुमला सज्जाद ज़हीर की उस बेबाक और बाग़ी अदबी सोच की याद दिलाता है, जिसने उर्दू अदब में एक नए दौर की बुनियाद रखी। वे सिर्फ़ शायर या मुसन्निफ़ नहीं थे, बल्कि तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अहम रहनुमा, साहित्यिक चिंतक और समाजी बदलाव के हामी भी थे।

सज्जाद ज़हीर की पैदाइश 5 नवंबर 1905 को लखनऊ के गोलागंज में हुई थी। उनके वालिद सर सैयद वज़ीर हसन अपने दौर के मशहूर वकील थे और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस बने। सज्जाद ज़हीर का बचपन एक ऐसे माहौल में गुज़रा, जहां इल्म, सियासत और समाजी मसाइल पर बातचीत होती थी। शायद यही वजह थी कि उनके अंदर शुरू से ही समाज और इंसान के हालात को समझने की जिज्ञासा पैदा हुई।

उन्होंने जुबली हाई स्कूल से मैट्रिक किया और लखनऊ यूनिवर्सिटी से बी.ए. की तालीम हासिल की। उच्च शिक्षा के लिए वे 1927 में इंग्लैंड गए और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया। इंग्लैंड का यह सफ़र उनके लिए सिर्फ़ तालीम हासिल करने का सफ़र नहीं था, बल्कि उनकी फ़िक्र और राजनीतिक चेतना के लिए भी एक नया मोड़ साबित हुआ।

यूरोप में उस दौर के राजनीतिक हालात, समाजी बदलाव और नई फ़लसफ़ियाना बहसों ने सज्जाद ज़हीर को गहराई से प्रभावित किया। वे समाजवाद और मार्क्सवादी विचारों की तरफ़ आकर्षित हुए। उन्हें महसूस हुआ कि समाज में मौजूद नाइंसाफ़ी, ग़रीबी और तबक़ाती फ़र्क़ को समझने के लिए एक नई फ़िक्र की ज़रूरत है।

इसी दौरान उन्होंने दूसरे भारतीय छात्रों के साथ मिलकर साहित्यिक और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया। ‘अंगारे’ की तहरीक और उसकी तैयारी भी इसी अदबी माहौल की देन थी।

‘अंगारे’ से नई अदबी बहस की शुरुआत

1931 में ‘अंगारे’ नाम से एक कहानी-संग्रह सामने आया। इसमें दस कहानियां शामिल थीं। इन कहानियों में समाज, मज़हब, औरत की स्थिति और इंसानी ज़िंदगी के उन पहलुओं को सामने लाया गया जिन पर उस समय खुलकर बात करना आसान नहीं था।

‘अंगारे’ पर ज़बरदस्त विवाद हुआ और उसे बाग़ियाना और आपत्तिजनक करार दिया गया। आखिरकार ब्रिटिश हुकूमत ने इस किताब को ज़ब्त कर लिया। मगर इस पाबंदी ने सज्जाद ज़हीर और उनके साथियों की आवाज़ को ख़ामोश करने के बजाय बहस को और तेज़ कर दिया।

यहीं से उर्दू अदब में एक ऐसी तहरीक के लिए ज़मीन तैयार हुई जो साहित्य को सिर्फ़ हुस्न और ख़याल तक सीमित नहीं रखना चाहती थी, बल्कि उसे समाज और इंसान की ज़िंदगी से जोड़ना चाहती थी।

तरक़्क़ीपसंद मुसन्निफ़ीन की तहरीक

सज्जाद ज़हीर ने लंदन में ही तरक़्क़ीपसंद मुसन्निफ़ीन की एक अदबी जमाअत बनाने में अहम किरदार अदा किया। उनके साथ मुल्क राज आनंद, ज्योति घोष, के. एस. भट्ट और मोहम्मद दीन तासीर जैसे लेखक भी जुड़े।

इस तहरीक का मक़सद ऐसा अदब पैदा करना था जो समाज की हक़ीक़तों से आंख न चुराए। ग़रीबी, मज़दूर, किसान, औरत, साम्राज्यवाद, आज़ादी और इंसानी बराबरी जैसे विषय साहित्य का हिस्सा बनें. यह तरक़्क़ीपसंद अदब की बुनियादी सोच थी।

1936 में लखनऊ में तरक़्क़ीपसंद मुसन्निफ़ीन की पहली अहम कॉन्फ़्रेंस हुई। मुंशी प्रेमचंद ने अपने मशहूर ख़ुत्बे में साहित्य की सामाजिक ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया। सज्जाद ज़हीर इस पूरी तहरीक के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।

उनकी कोशिश थी कि अदब सिर्फ़ महफ़िलों की ज़ीनत न रहे, बल्कि समाज की आवाज़ बने।

शायरी में भी बग़ावत का रंग

सज्जाद ज़हीर की अदबी पहचान सिर्फ़ तरक़्क़ीपसंद तहरीक तक सीमित नहीं थी। उनकी शायरी में भी अपने दौर के समाज और साहित्य की तस्वीर दिखाई देती है। उनके व्यंग्य और बग़ावती तेवर का अंदाज़ा इन अशआर से लगाया जा सकता है।

“वो शेर-ओ-क़सीदों का नापाक दफ़्तर,
अफ़ूनत में संडास से जो है बदतर।


ज़मीं जिससे है ज़लज़ले में सरासर,
मुल्क जिससे शरमाते हैं आसमां पर।


हुआ इल्म-ओ-दीन जिससे ताराज सारा,
वो है हफ़-नज़र इल्म-ओ-इंशा हमारा।”

इन अशआर में सज्जाद ज़हीर सिर्फ़ ख़राब शायरी पर तंज़ नहीं करते, बल्कि उस अदब पर सवाल उठाते हैं जो समाज की हक़ीक़त से दूर हो और इंसान के दर्द को महसूस न करे।

उनका व्यंग्य तल्ख़ ज़रूर है, लेकिन उसके पीछे एक बेहतर समाज और बेहतर अदब की तलाश दिखाई देती है।

‘लंदन की एक रात’: उर्दू फ़िक्शन में नया प्रयोग

सज्जाद ज़हीर की अहम किताबों में ‘लंदन की एक रात’ का नाम बहुत महत्वपूर्ण है। यह उपन्यास 1938 में प्रकाशित हुआ। इसमें लंदन में गुज़री एक रात के बहाने नौजवानों की ज़िंदगी, उनके ख़्वाब, रिश्ते, तन्हाई और मानसिक उलझनों को सामने लाया गया है।

इस उपन्यास की ख़ास बात इसका अंदाज़-ए-बयान और तकनीकी प्रयोग है। एक छोटी-सी रात के दायरे में ज़िंदगी के कई पहलुओं को समेटने की कोशिश की गई है। 

सियासत और पत्रकारिता से रिश्ता

सज्जाद ज़हीर ने साहित्य के साथ-साथ सियासत में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इलाहाबाद में उन्होंने कांग्रेस की गतिविधियों में हिस्सा लिया और जवाहरलाल नेहरू के साथ भी काम किया। बाद में वे कम्युनिस्ट तहरीक से जुड़े और किसान-मज़दूरों से जुड़े सवालों को अपनी गतिविधियों का हिस्सा बनाया।

पत्रकारिता के मैदान में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। ‘चिंगारी’, ‘नया अदब’ और ‘क़ौमी जंग’ जैसे प्रकाशनों के ज़रिए उन्होंने तरक़्क़ीपसंद विचारों को आगे बढ़ाया।

उनकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा सियासी संघर्षों, गिरफ़्तारी और जेल में गुज़रा। 1940 में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और करीब दो साल बाद रिहाई मिली। इसके बाद भी उनकी राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं।

1948 में वे पाकिस्तान गए, लेकिन वहां भी उनकी ज़िंदगी आसान नहीं रही। कुछ समय भूमिगत रहने के बाद 1951 में उन्हें रावलपिंडी साज़िश केस में गिरफ़्तार किया गया और कई साल तक जेल में रहना पड़ा।

आख़िरी सफ़र

सज्जाद ज़हीर ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा किताबों, सियासत, पत्रकारिता और अदबी तहरीकों के नाम कर दिया। उन्होंने हिंदुस्तान और दुनिया के कई मुल्कों का सफ़र किया और अलग-अलग देशों के साहित्यकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से मुलाक़ातें कीं।

सितंबर 1973 में उनका इंतिक़ाल हुआ। उनकी मौत से उर्दू अदब ने एक ऐसे शख़्स को खो दिया जिसने साहित्य को समाजी ज़िम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश की थी।

सज्जाद ज़हीर की सबसे बड़ी विरासत उनकी किताबें ही नहीं, बल्कि वह फ़िक्र और अदबी रवैया है जिसमें इंसान, बराबरी, आज़ादी और समाजी इंसाफ़ को अहमियत हासिल है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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