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नियाज़ फ़तेहपुरी: उर्दू अदब में फ़िक्र, फ़न और बेबाकी की आवाज़ 

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ़ शायरी या अफ़साने तक अपने फ़न को महदूद नहीं रखा, बल्कि इतिहास, फ़लसफ़ा, मज़हब, तहज़ीब और सहाफ़त जैसे कई मैदानों में अपनी पहचान बनाई। नियाज़ फ़तेहपुरी भी ऐसे ही अदीब और मुफ़क्किर थे। उनकी शख़्सियत में एक शायर का दिल, एक फ़लसफ़ी की सोच और एक सहाफ़ी की बेबाक नज़र दिखाई देती है।

बचपन और तालीम

नियाज़ फ़तेहपुरी की पैदाइश 1884 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में हुई। उनकी वालिदा ने उनका नाम नियाज़ मोहम्मद ख़ान रखा, जबकि उनके वालिद की तरफ़ से उनका नाम लियाक़त अली ख़ान था।

उनकी शुरुआती तालीम मदरसा इस्लामिया, फ़तेहपुर और बाद में दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ में हुई। उनके वालिद मोहम्मद अमीर ख़ान पुलिस विभाग में मुलाज़िम थे और नौकरी की वजह से उन्हें अक्सर अलग-अलग जगहों पर रहना पड़ता था। इस वजह से नियाज़ फ़तेहपुरी को मुख़्तलिफ़ शहरों और लोगों को करीब से देखने-समझने का मौक़ा मिला।

यही तजुर्बे आगे चलकर उनकी फ़िक्र और तहरीर में दिखाई दिए। उन्होंने सिर्फ़ किताबों से दुनिया को नहीं जाना, बल्कि समाज और इंसानी ज़िंदगी को भी क़रीब से देखा।

“घड़ी-घड़ी न इधर देखिए कि दिल पे मुझे
है इख़्तियार, पर इतना भी इख़्तियार नहीं।”

नौकरी से अदब तक का सफ़र

1900 में नियाज़ फ़तेहपुरी ने मुरादाबाद में सब-इंस्पेक्टर की ट्रेनिंग हासिल की, लेकिन दो साल बाद यानी 1902 में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी। इसके बाद 1903 से 1905 तक उन्होंने मदरसा इस्लामिया में हेड मास्टर के तौर पर काम किया।

हालांकि उन्होंने अलग-अलग काम किए, लेकिन उनका असल झुकाव अदब और इल्मी दुनिया की तरफ़ था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने लिए वह रास्ता चुना, जिसने उन्हें उर्दू अदब की दुनिया में एक अलग मक़ाम दिया।

“न दुनिया का हूं मैं, न कुछ फ़िक्र-ए-दीन की
मोहब्बत ने रखा न मुझको कहीं का।”

‘निगार’ और सहाफ़त की नई रवायत

नियाज़ फ़तेहपुरी की सबसे अहम अदबी ख़िदमात में उनका रिसाला ‘निगार’ भी शामिल है। 1922 में उन्होंने ‘निगार’ का आग़ाज़ किया। बाद में यह रिसाला लखनऊ, भोपाल और कराची से भी शाया हुआ।

‘निगार’ सिर्फ़ एक आम अदबी रिसाला नहीं था, बल्कि उर्दू की इल्मी और फ़िक्री दुनिया में उसका अपना एक ख़ास मक़ाम बन गया। इसमें अदब के साथ-साथ इतिहास, मज़हब, फ़लसफ़ा और समाज से जुड़े विषयों पर भी बहस होती थी।

नियाज़ फ़तेहपुरी की यही ख़ासियत थी कि वह किसी एक दायरे में क़ैद होकर लिखने वाले अदीब नहीं थे। उनकी तहरीर में सवाल उठाने की हिम्मत और चीज़ों को नए नज़रिए से देखने की कोशिश साफ़ दिखाई देती है।

“जब क़फ़स में मुझको याद-ए-आशियां आ जाता है
सामने आंखों के इक बिजली सी लहरा जाता है।”

शायर और अफ़साना निगार

नियाज़ फ़तेहपुरी ने शायरी और अफ़साना निगारी में भी अपनी पहचान बनाई। उनकी शायरी में इश्क़, हिज्र, तन्हाई और जुनून के साथ इंसानी ज़िंदगी की पेचीदगियां भी दिखाई देती हैं।

“मैं अब तो ऐ जुनूं तेरे हाथों से तंग हूं
लाऊं कहां से रोज़ गरेबां नए नए।”

यहां आशिक़ की बेबसी और जुनून का अंदाज़ बेहद दिलकश है। जुनून ऐसा है कि रोज़ नया गरेबां चाहिए, लेकिन आशिक़ खुद इस कैफ़ियत से परेशान हो चुका है।

“तुम तो ठुकरा कर गुज़र जाओ, तुम्हें टोकेगा कौन
मैं पड़ा हूं राह में तो क्या तुम्हारा जाएगा।”

इस शेर में मोहब्बत की शिकस्त, बेबसी और ख़ुद्दारी तीनों एक साथ महसूस होती हैं।

कई इल्मी मैदानों में काम

नियाज़ फ़तेहपुरी की शख़्सियत का सबसे अहम पहलू उनकी बहुआयामी फ़िक्र थी। उन्होंने साहित्य के साथ इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और पत्रकारिता पर भी लिखा।

उन्होंने 50 से ज़्यादा किताबें लिखीं। उनकी मशहूर किताबों में ‘शायर का अंजाम’, ‘निगारिस्तान’, ‘जमालिस्तान’, ‘शहाब की सरगुज़श्त’, ‘इंतक़ादियात’, ‘माला व मा अलैह’, ‘मज़ाहिब-ए-आलम का तक़ाबुली मुतालआ’ और ‘तरग़ीबात-ए-जिन्स’ शामिल हैं।

इन किताबों से अंदाज़ा होता है कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ़ अदब तक सीमित नहीं थी। वह इंसान, समाज, मज़हब और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं को समझने और उन पर अपनी राय पेश करने में दिलचस्पी रखते थे।

नियाज़ फ़तेहपुरी की फ़िक्र

नियाज़ फ़तेहपुरी की तहरीरों की एक अहम ख़ूबी उनका सवाल करने वाला अंदाज़ था। वह रवायती बातों को सिर्फ़ इसलिए क़ुबूल करने के बजाय उन पर सोचने और बहस करने की कोशिश करते थे।

उनकी फ़िक्र में इंसान और उसकी ज़िंदगी अहम थी। यही वजह है कि उनकी तहरीरें सिर्फ़ अपने दौर के पाठकों तक महदूद नहीं रहीं, बल्कि उर्दू अदब में फ़िक्री बहस का हिस्सा बनीं।

उनकी शख़्सियत को समझने के लिए उन्हें सिर्फ़ शायर या सहाफ़ी कहना शायद काफ़ी नहीं होगा। वह एक ऐसे अदीब, मुफ़क्किर, नक़्क़ाद और फ़िक्र करने वाले इंसान थे, जिन्होंने अपने दौर के कई अहम सवालों को अपनी तहरीरों का मौज़ू बनाया।

“दिल मेरा वो ख़ाना-ए-वीरां है जल बुझने पे भी
राख से जिसकी धुआं ता-देर उठता जाए है।”

हिंदुस्तान से पाकिस्तान तक

1962 में नियाज़ फ़तेहपुरी पाकिस्तान चले गए। ज़िंदगी के आख़िरी 4 साल उन्होंने वहीं गुज़ारे। इस दौरान भी उनका इल्मी और अदबी सफ़र जारी रहा।

उनकी अदबी और इल्मी ख़िदमात के एतराफ़ में उन्हें भारत में पद्म भूषण और पाकिस्तान में निशान-ए-सिपास से नवाज़ा गया।

24 मई 1966 को कैंसर की बीमारी के बाद उनका इंतक़ाल हो गया।

एक ज़िंदा अदबी विरासत

नियाज़ फ़तेहपुरी की ज़िंदगी और फ़िक्र हमें यह बताती है कि एक अदीब की दुनिया सिर्फ़ काग़ज़ और क़लम तक महदूद नहीं होती। वह अपने दौर को देखता है, सवाल करता है, बहस करता है और अपने अल्फ़ाज़ के ज़रिए आने वाली नस्लों के लिए एक फ़िक्री विरासत छोड़ जाता है।

नियाज़ फ़तेहपुरी भी ऐसी ही शख़्सियत थे जिनके यहां इश्क़ की कैफ़ियत से लेकर फ़लसफ़े की गहराई, अदब की नफ़ासत से लेकर सहाफ़त की बेबाकी तक, ज़िंदगी के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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