उर्दू अदब की दुनिया में नसीम अमरोहवी एक ऐसे अदीब, शायर, फ़लसफ़ी और लुग़त-नवीस के तौर पर याद किए जाते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान और अदब की ख़िदमत में गुज़ारी। उनका असली नाम सैयद क़ायम रज़ा तक़वी था। उनकी पैदाइश 24 अगस्त 1908 को अमरोहा में एक मशहूर तक़वी सैयद ख़ानदान में हुई था।
उनके वालिद का नाम सैयद बर्जीस हुसैन तक़वी और वालिदा का नाम सैयदा ख़ातून था। उनके दादा शमीम अमरोहवी को फ़रज़दक़-ए-हिंद का ख़िताब दिया गया था। अदब और शायरी का माहौल उन्हें विरासत में मिला और आगे चलकर उन्होंने अपने लिए ‘नसीम’ तख़ल्लुस पसंद किया।
तक़सीम के बाद पाकिस्तान का सफ़र
1947 में हिंदुस्तान की तक़सीम के बाद नसीम अमरोहवी 1950 में पाकिस्तान चले गए और ख़ैरपुर में रहने लगे। बाद में 1961 में उन्होंने कराची को अपना मस्कन बनाया। 28 फ़रवरी 1987 को कराची में उनका इंतिक़ाल हुआ।
उनकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा उर्दू ज़बान की ख़िदमत में गुज़रा। वे उर्दू लुग़त बोर्ड से जुड़े रहे और कई सालों की मेहनत से नसीम-उल-लुग़ात जैसी अहम किताब तैयार की।
ज़बान की एक अहम ख़िदमत
नसीम अमरोहवी सिर्फ़ शायर नहीं थे, बल्कि उर्दू के बड़े लुग़त-नवीस भी थे। उनकी मशहूर किताब ‘नसीम-उल-लुग़ात’ में शब्दों के अर्थ के साथ-साथ उनके इस्तेमाल, मुहावरे और कहावतें भी मिलती हैं। ख़ास बात यह है कि कई अल्फ़ाज़ के साथ उनसे जुड़े अशआर भी दर्ज किए गए हैं।
इस तरह उनकी यह कोशिश महज़ एक डिक्शनरी तैयार करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने उर्दू ज़बान के लफ़्ज़ों, उनके मानी और उनके अदबी इस्तेमाल को भी सुरक्षित करने का काम किया।
शायरी में जज़्बात और रूहानी रंग
नसीम अमरोहवी की शायरी में मोहब्बत, उम्मीद, दर्द, वतन, इंसानियत और रूहानी एहसास की झलक दिखाई देती है। उनके अशआर में ज़िंदगी की सच्चाइयों के साथ-साथ एक गहरी उम्मीद भी नज़र आती है।
“जब कोई नाव डगमगाती है
आस जब दिल की टूट जाती है
सब ख़ुदाई नज़र फिराती है
सिर्फ़ उम्मीद काम आती है।”
इन पंक्तियों में ज़िंदगी के मुश्किल दौर का बयान है। जब इंसान हर तरफ़ से मायूस हो जाता है, तब उम्मीद ही उसका सहारा बनती है।
उनकी शायरी में वतन से मोहब्बत का रंग भी बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में सामने आता है।
“अमृत की धार ले कर गंगोत्री से उतरी
मेरे वतन में आई मोती है साफ़-सुथरी।”
नदी और वतन के रिश्ते को उन्होंने जिस सादगी और ख़ूबसूरती से पेश किया, वह उनके शायराना अंदाज़ की ख़ासियत है।
गंगा की रवानी और उसके किनारों का मंज़र भी उनके अल्फ़ाज़ में कुछ यूं उभरता है।
“फैला हुआ है कोसों चमकीला पाट तेरा
लहरों से खेलता है हर एक घाट तेरा।”
इन पंक्तियों में सिर्फ़ कुदरती मंज़र नहीं, बल्कि अपने वतन की ख़ूबसूरती के लिए एक गहरा एहसास भी मौजूद है।
सुबह और उम्मीद का पैग़ाम
नसीम अमरोहवी की शायरी में सुबह का मंज़र भी उम्मीद की एक नई किरण बनकर आता है।
“रात सिधारी, सूरज आया
किरनों का इक लश्कर लाया
सोते-सोते ख़िल्क़त जागी
शब की स्याही डर कर भागी।”
रात का ख़त्म होना और सूरज का निकलना यहां सिर्फ़ कुदरत का एक मंज़र नहीं, बल्कि अंधेरे के बाद उजाले और मायूसी के बाद उम्मीद की निशानी भी बन जाता है।
“दाता है तू जहां का और किर्दगार तू है
परवरदिगार तू है, परवरदिगार तू है।”
इन पंक्तियों में इंसान और उसके परवरदिगार के बीच यक़ीन और बंदगी का जज़्बा महसूस किया जा सकता है।
अदब का एक बड़ा ख़ज़ाना
नसीम अमरोहवी ने शायरी के अलावा कई अहम किताबें लिखीं। उनके मशहूर कामों में ‘ख़ुतबात-ए-मुशीरान’, ‘अदबी कहानियां’, ‘नसीम-उल-लुग़ात’, ‘मुसद्दस-ए-नसीम’, ‘फ़रहंग-ए-इक़बाल’ और ‘नज़्म-ए-उर्दू’ शामिल हैं।
उन्होंने मर्सिया भी लिखे और करबला के शहीदों की याद में दर्द और अकीदत से भरे कलाम पेश किए। इसके अलावा उन्होंने अल्लामा इक़बाल की फ़िक्र और शायरी पर भी गहरा काम किया।
नसीम अमरोहवी की अहमियत इस बात में भी है कि उन्होंने उर्दू को सिर्फ़ शायरी की ज़बान नहीं समझा, बल्कि उसके अल्फ़ाज़, मानी, मुहावरों और अदबी विरसे को संभालने की ज़िम्मेदारी भी निभाई।
उनकी शायरी में एहसास है, उनकी तहरीरों में इल्म है और उनकी लुग़त-निगारी में ज़बान से मोहब्बत। यही वजह है कि नसीम अमरोहवी का नाम उर्दू अदब की उन शख़्सियतों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी क़लम से ज़बान और अदब दोनों की ख़िदमत की।
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