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शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार: तसव्वुफ़, इश्क़-ए-इलाही और फ़ारसी अदब के अज़ीम सूफ़ी शायर

शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार निशापुरी फ़ारसी अदब और तसव्वुफ़ की तारीख़ का एक ऐसा नाम हैं, जिनकी तालीमात और तहरीरों ने सदियों तक सूफ़ियाना फ़िक्र को नई रौशनी बख़्शी। उनकी पैदाइश करीब 1145 या 1146 ईस्वी में ईरान के मशहूर शहर निशापुर के क़रीब कदगन गांव में हुयी। उनका अस्ल नाम अबू हमीद इब्न-ए-अबू बक्र इब्राहीम था, लेकिन दुनिया उन्हें फ़रीदुद्दीन अत्तार के नाम से जानती है। “अत्तार” का मतलब इत्र और दवाइयों का कारोबार करने वाला होता है, क्योंकि उनका ख़ानदानी पेशा यही था।

शैख़ अत्तार के वालिद इत्र और दवाइयों के ताजिर थे। वालिद के इंतिक़ाल के बाद उन्होंने यही काम संभाल लिया। उनका मतब (दवाख़ाना) निशापुर में बहुत मशहूर था। दूर-दराज़ से लोग उनके पास सिर्फ़ जिस्मानी नहीं, बल्कि रूहानी अमराज़ का इलाज कराने भी आते थे। ख़ुद शैख़ अत्तार ने अपनी मशहूर मसनवी “ख़ुसरौनामा” में लिखा है कि रोज़ाना सैकड़ों लोग उनके मतब में इलाज के लिए आते थे।

मगर उनकी ज़िंदगी का रुख़ एक वाक़िये ने पूरी तरह बदल दिया। रिवायत है कि एक दिन उनकी दुकान पर एक फ़क़ीर आया। शैख़ ने उसे जाने को कहा तो फ़क़ीर ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “मेरा जाना आसान है, अपनी फ़िक्र करो।” इतना कहकर वह वहीं लेट गया और कुछ ही देर में उसका इंतिक़ाल हो गया। इस मंज़र ने शैख़ अत्तार के दिल पर गहरा असर छोड़ा। उन्होंने दुनिया की रंगीनियों से किनारा कर लिया, अपना कारोबार छोड़ दिया और तसव्वुफ़ की राह इख़्तियार कर ली।

इसके बाद शैख़ अत्तार ने ईरान, इराक़, बग़दाद, बसरा, दमिश्क़, तुर्किस्तान और ख़्वारिज़्म जैसे इलाक़ों का सफ़र किया। उन्होंने कई बुज़ुर्गों और सूफ़िया-ए-किराम की सोहबत हासिल की और मशहूर सूफ़ी शैख़ रुक्नुद्दीन से बैअत की। उनकी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की याद, इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इंसानियत की ख़िदमत में गुज़री।

शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार सिर्फ़ सूफ़ी बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि फ़ारसी ज़बान के अज़ीम मुसन्निफ़ भी थे। उन्होंने तसव्वुफ़, अख़लाक़ और रूहानियत पर दर्जनों किताबें तहरीर कीं। कहा जाता है कि उन्होंने 100 से ज़्यादा किताबें लिखीं, लेकिन मंगोल हमलों में ज़्यादातर तहरीरें ज़ाया हो गईं। आज उनकी तक़रीबन 35 किताबें ही दस्तयाब हैं।

उनकी सबसे मशहूर किताब “तज़किरत-उल-औलिया” है, जिसमें उन्होंने सूफ़ी बुज़ुर्गों की ज़िंदगी, उनके किरदार और रूहानी तजुर्बों को बेहद दिलकश अंदाज़ में बयान किया है। वहीं उनकी मशहूर मसनवी “मंतिक़ुत-तैर” (पक्षियों की सभा) को फ़ारसी अदब का शाहकार माना जाता है। इस किताब में परिंदों के सफ़र के ज़रिए इंसान की रूहानी तलाश और अल्लाह तक पहुंचने की मंज़िल को बड़ी ख़ूबसूरती से समझाया गया है।

शैख़ अत्तार की शायरी का मरकज़ इश्क़-ए-इलाही, फ़ना, सब्र और ख़ुद की पहचान है। उनकी ग़ज़लों और रुबाइयों में बार-बार यह पैग़ाम मिलता है कि जब तक इंसान अपने नफ़्स, घमंड और दुनियावी ख़्वाहिशों से आज़ाद नहीं होगा, तब तक उसे अस्ल हक़ीक़त का एहसास नहीं हो सकता।

शैख़ अत्तार की ग़ज़लें आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ख़ानक़ाहों में क़व्वाल बड़ी अकीदत के साथ गाते हैं। उनकी शायरी दिल को अल्लाह की तरफ़ मोड़ने और दुनिया की फ़ानी हक़ीक़त का एहसास दिलाने का ज़रिया बनती है।

साल 1221 ईस्वी में मंगोल हमलों के दौरान उनका इंतिक़ाल हुआ। रिवायतों के मुताबिक़ उन्होंने आख़िरी लम्हों तक सब्र, तवक्कुल और इश्क़-ए-हक़ीक़ी का दामन नहीं छोड़ा। आज भी उनका मज़ार निशापुर (ईरान) में मौजूद है, जहां दुनिया भर से अकीदतमंद हाज़िरी देने आते हैं।

शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार ने अपने इल्म, फ़िक्र और तसव्वुफ़ के ज़रिए फ़ारसी अदब को ऐसी बुलंदी अता की, जिसका असर बाद के बड़े सूफ़ी शाइरों, ख़ास तौर पर मौलाना जलालुद्दीन रूमी, पर भी साफ़ दिखाई देता है। उनकी तहरीरें आज भी इंसान को इश्क़, फ़ना, तौबा और रूहानी सुकून की राह दिखाती हैं।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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