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ख़्वाजा एहसानुल्लाह ख़ां: सादा अल्फ़ाज़ में गहरी कैफ़ियत के शायर

उर्दू अदब की तारीख़ में ख़्वाजा एहसानुल्लाह ख़ां ‘बयां’ का नाम उन शाइरों में शुमार होता है जिन्होंने अपनी ग़ज़लों के ज़रिये इश्क़, हुस्न, जुदाई और इंसानी जज़्बात को बेहद ख़ूबसूरती से पेश किया। उनकी पैदाइश आगरा में हुयी। ज़िंदगी के बाद के दिनों में वह हैदराबाद चले गए, जहां उन्होंने हैदराबाद के हुक्मरानों के दरबार से भी वाबस्तगी रखी। उन्हें मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानां और मौलाना मोहम्मद फ़ख़रुद्दीन जैसे बुज़ुर्ग अहल-ए-इल्म की शागिर्दी हासिल हुई। ‘बयां’ ज़्यादातर ग़ज़ल के शाइर थे और अपने दौर के मशहूर शाइर यक़ीन फ़ुग़ां के हमअसर माने जाते हैं।

‘बयां’ की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सादगी और असरअंदाज़ी है। वह मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आसान और दिल में उतर जाने वाली ज़बान का इस्तेमाल करते हैं। उनके अशआर में इश्क़ की नर्मी भी है, जुदाई का दर्द भी और ज़िंदगी के तजुर्बों की गहराई भी।

“इश्वा है, नाज़ है, ग़म्ज़ा है, अदा है क्या है,
क़हर है, सहर है, जादू है, बला है क्या है।”

इस शेर में महबूब की अदाओं को इतने ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया गया है कि शाइर ख़ुद हैरत में पड़ जाता है। वह समझ नहीं पाता कि यह हुस्न है, जादू है या कोई और कैफ़ियत।

एक और शेर में ‘बयां’ इंसानी फ़ितरत और दुनिया की हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हैं।

“कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा,
सिवाए उसके इन आंखों ने क्या नहीं देखा।”

यह शेर सिर्फ़ मोहब्बत की बात नहीं करता, बल्कि इंसानी रिश्तों की नापायदारी और एक सच्चे साथी की अहमियत को भी उजागर करता है।

उनकी शायरी में रिन्दाना रंग भी नज़र आता है। मय, साक़ी और पैमाने की अलामतों के ज़रिये वह ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं को बयान करते हैं। साथ ही, जुदाई का दर्द और वफ़ा की क़ीमत भी उनके कलाम का अहम हिस्सा है।

“ख़ूब-सी तंबीह करना ऐ जुदाई तू मुझे,
गर किसी से फिर कभी क़स्द-ए-आशनाई का करूं।”

इस शेर में जुदाई को एक नसीहत देने वाले एहसास की तरह पेश किया गया है। शाइर कहता है कि अगर वह फिर कभी किसी से दिल लगाने की कोशिश करे, तो जुदाई उसे पहले ही आगाह कर दे।

ख़्वाजा एहसानुल्लाह ख़ां ‘बया’ की ग़ज़लें आज भी उर्दू शायरी के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा हैं। उनकी शायरी में न बनावट है और न दिखावा, बल्कि सच्चे जज़्बात, ख़ालिस एहसास और दिल की आवाज़ है। यही वजह है कि उनका कलाम हर दौर के क़ारी को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करता है और उर्दू अदब की रिवायत में उन्हें एक अहम मुक़ाम अता करता है।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

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