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सबई घास (Sabai Grass), एक विरासत – ओडिशा की पारंपरिक कला की कहानी

ओडिशा की सरज़मी सिर्फ़ अपने शानदार और ख़ूबसूरत नज़ारों और सांस्कृतिक विरासत के लिए ही नहीं पहचानी जाती है। इसके अलावा भी यहां काफी कुछ ऐसा है जो आपका मन मोह लेता है। इन्ही में से एक है यहां की ख़ास और पारंपरिक कारीगरी सबई घास दस्तकारी। जो न सिर्फ़ पर्यावरण के अच्छी है, बल्कि मेहनत, हुनर और विरासत की एक बेहतरीन मिसाल भी है।

सबई घास (Sabai Grass) से बने अनोखे और इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट बनाने वाले कलाकार पंकज कुमार, जो ओडिशा बाशिंदे हैं। उन्होंने DNN24 से इस ख़ूबसरत सबई घास (Sabai Grass) दस्तकारी के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वो पिछले कई सालों से इस कला को ज़िंदा रखने और आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

पंकज बताते हैं कि सबई घास असल में ओडिशा की नहीं है, बल्कि अफ्रीका से लाई गई एक घास है। इसे करीब सन 1870 में मयूर वंश के एक राजा अफ्रीका से ओडिशा लेकर आए थे और उन्होंने इसकी खेती करवाना शुरू करवाया। पहले इसका इस्तेमाल सिर्फ़ पेपर बनाने के लिए होता था। लेकिन धीरे-धीरे इससे फ्लावर बास्केट, रस्सी और आज के दौर में तरह-तरह के घरेलू सामान बनाए जा रहे हैं। आज सबई घास (Sabai Grass) को ओडिशा के 2 से 3 ज़िलों में उगाया जाता है और इसे नेचुरल फ़ाइबर कहा जाता है।

प्लास्टिक को कहें अलविदा – अपनाएं ईको फ्रेंडली सामान

पंकज का मानना है कि आज हर घर में प्लास्टिक से बने बर्तन और डिब्बे इस्तेमाल होते हैं, जो न सिर्फ़ एनवायरनमेंट के लिए, बल्कि हमारी हेल्थ लिए भी काफी नुकसानदायक हैं। इसी वजह से उन्होंने कुछ ऐसा बनाने की ठानी जो प्राकृतिक, साफ़-सुथरा और पर्यावरण के लिए बेहतर हो। पंकज बताते हैं कि उनकी शुरुआत आसान नहीं थी, लोगों को न सबई घास (Sabai Grass) के बारे में पता था, न उसके फायदे समझ में आते थे।

लेकिन पंकज ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने एग्ज़ीबिशन व सोशल मीडिया को अपना ज़रिया बनाया और धीरे-धीरे लोगों को इस घास और इसके प्रोडक्ट्स से जोड़ा। आज उनके साथ 300 से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं और रोज़गार पा रहे हैं।

ग्राहकों से मिलती है प्रेरणा, बनते हैं नए डिज़ाइन

पंकज बताते हैं, “जब हम एग्ज़ीबिशन में जाते हैं, लोग हमारे प्रोडक्ट्स को देखकर हैरान हो जाते हैं। वे पूछते हैं – ये किस चीज़ से बने हैं? जब उन्हें बताते हैं कि ये सबई घास (Sabai Grass) और खजूर के पत्तों से बने हैं, तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है।” कुछ डिज़ाइन वे खुद बनाते हैं, तो कुछ डिज़ाइन ग्राहकों की पसंद से तैयार किए जाते हैं। पंकज कहते हैं कि एग्ज़ीबिशन में लोगों से मिलने के बाद उन्हें ये समझ आया कि हर ग्राहक की पसंद अलग होती है। इससे उन्हें नए आइडिया और डिज़ाइन बनाने में मदद मिलती है।

सबई घास (Sabai Grass) से बने 350 से ज़्यादा प्रोडक्ट्स

आज उनके पास 350 से ज़्यादा आइटम्स हैं जिसमें पेन स्टैंड, रोटी बॉक्स, ईयररिंग बॉक्स, वॉल डेकोरेशन, लॉन्ड्री बास्केट, प्लांटर होल्डर, मैट्स और बहुत कुछ शामिल है। सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि अगर इन पर पानी गिर जाए, तो इन्हें बस अच्छे से सूखा लें, ये दोबारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं और बहुत समय तक चलते हैं। पंकज बताते हैं कि कोविड से पहले ये कारीगरी सीमित लोगों तक ही पहुंची थी। लोग इसके बारे में नहीं जानते थे। लेकिन महामारी के बाद जैसे-जैसे लोग प्राकृतिक चीज़ों की ओर लौटे, सबई घास (Sabai Grass) की दस्तकारी ने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली।

इन प्रोडक्ट्स की कीमत 40 रुपये से शुरू होकर 5000 रुपये तक जाती है। ये इस पर निर्भर करता है कि एक प्रोडक्ट को बनाने में कितना समय और मेहनत लगी है। जैसे कि लॉन्ड्री बास्केट 500 रुपये में भी मिलती है और कुछ ख़ास डिज़ाइनों में 2000 रुपये तक की भी। कई प्रोडक्ट्स को आप अपने अनुसार अलग-अलग कामों में इस्तेमाल कर सकते हैं – जैसे रोटी बॉक्स को स्टोरेज बॉक्स की तरह।

एक डिब्बा बनाने में 2 से 3 दिन का समय लगता है, क्योंकि ये सिर्फ़ चीज़ नहीं, एक कहानी, एक कला और एक कलाकार की मेहनत होती है। सबई घास (Sabai Grass) से बनी ये दस्तकारी सिर्फ़ प्रोडक्ट नहीं है – ये ओडिशा की मिट्टी की ख़ुशबू, वहां की परंपरा की ताकत, और हुनरमंद हाथों की मेहनत की पहचान है।

ये भी पढ़ें: वेस्ट मटेरियल से Eco-friendly products: केरल स्टेट कॉयर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की अनोखी पहल

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