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कश्मीर की विरासत का एक अहम हिस्सा है फ़िरोज़ा की कला

कश्मीर, अपनी खूबसूरत वादियों और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। इस खूबसूरत राज्य में सदियों से कई तरह की हस्तशिल्प कलाएं फलती-फूलती रही हैं। इनमें से एक है फ़िरोज़ा (Turquoise) की कला। फ़िरोज़ा, एक खूबसूरत नीला रत्न है, जो न सिर्फ़ अपनी आकर्षक चमक के लिए बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता के लिए भी जाना जाता है।कश्मीर में फ़िरोज़ा (Turquoise) की कला का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि यह कला यहां शाय हमदान के आने के साथ आई थी। शाय हमदान न सिर्फ़ इस्लाम मज़हब लेकर आए थे बल्कि उन्होंने कई तरह के हुनर भी कश्मीरवासियों को सिखाए थे। फ़िरोज़ा की कला भी उनमें से एक थी।

श्रीनगर के पुराने फतेह कदल इलाके के रहने वाले मोहम्मद हनीफ़ इस कला के एक मशहूर कारीगर हैं। उन्होंने यह कला अपने पिता से विरासत में पाई है। मोहम्मद हनीफ़ याद करते हैं कि एक समय था जब फतेह कदल में करीब 50 कारीगर इस शिल्प में जुड़े हुए थे और अपनी कला के ज़रिए अच्छी कमाई करते थे। उनके द्वारा बनाए गए फ़िरोज़ा के ज़ेवरों की मांग विदेशों में भी थी।लेकिन समय के साथ इस कला का स्वरूप बदल गया। पहले जहां इस काम को पूरी तरह हाथ से किया जाता था, वहीं अब मशीनों का इस्तेमाल होने लगा है। मशीनों से बने उत्पादों में भले ही फिनिशिंग अच्छी हो लेकिन हाथ से बने उत्पादों में एक अलग ही निखार होता है।

फ़िरोज़ा (Turquoise) के आभूषण बनाने में लद्दाख से आने वाले खूबसूरत पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पत्थरों को बहुत बारीकी से काटकर और घिसकर आभूषणों में तब्दील किया जाता है। इस काम में बहुत सब्र और मेहनत की ज़रूरत होती है।आजकल फ़िरोज़ा (Turquoise) की कलाआहिस्ता-आहिस्ताखत्म होती जा रही है। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। एक तो यह कि नई पीढ़ी इस कला में ज़्यादा रुचि नहीं ले रही है। दूसरी वजह यह है कि मशीनों से बने उत्पादों की मांग ज़्यादा है।

ये भी पढ़ें: जयपुर की वीणा, मीणा जनजाति की कला को दे रहीं नई पहचान

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