काशी की गलियों में एक ऐसी कला सदियों से ज़िंदा है, जो न सिर्फ़ देखने में हसीन है, बल्कि अपने आप में एक पूरी दास्तान है। नाम है गुलाबी मीनाकारी। चांदी पर बारीक हाथों से उकेरी जाने वाली ये कारीगरी बनारस की उस पहचान का हिस्सा है, जो बनारसी साड़ी और पान के साथ-साथ दुनिया भर में नाम कमा रही है।
इस कला की जड़ें फारस यानी आज के ईरान से जुड़ी हैं। मुगलों के दौर में ये हुनर भारत आया, राजस्थान से होते हुए बनारस के कारीगरों तक पहुंचा। लेकिन बनारस के मीनाकारों ने इसे वो रंग दिया जो कहीं और नहीं मिलता वो है गुलाबी रंग। यही गुलाबी शेड इस कला को दुनिया की बाकी मीनाकारी से अलग और ख़ास बनाता है।

कैसे बनती है ये कारीगरी?
गुलाबी मीनाकारी सिर्फ़ एक शिल्प नहीं, बल्कि सब्र और हुनर का इम्तिहान है। पहले शुद्ध चांदी या सोने की सतह पर बेहद बारीक डिज़ाइन उकेरे जाते हैं। फिर प्राकृतिक पत्थरों और खनिजों से तैयार किए गए रंग भरे जाते हैं। इन रंगों को 850 डिग्री सेल्सियस तक की भट्टी में तपाया जाता है, ताकि रंग धातु के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाएं। ये प्रोसेस कई बार दोहराया जाता है। तब कहीं जाकर वो ट्रांसपेरेंट गुलाबी चमक निकलती है जो इस कला की जान है।

मुगल रानियों से लेकर आज तक
मुगल काल में ये कला राजपरिवारों की पसंद थी। रानियों के श्रृंगार में गुलाबी मीनाकारी वाले हार, झुमके और अंगूठियां खूब पसंद की जाती थीं। लेकिन वक्त के साथ ये कला गायब होने की कगार पर पहुंच गई। 20वीं सदी की शुरुआत में बनारस के आख़िरी हेरिटेज मास्टर बब्बू सिंह के निधन के बाद ये कला लगभग ख़त्म हो गई थी। फिर कुछ समर्पित कारीगरों ने इसे फिर से ज़िंदा किया।

आज की तस्वीर
साल 2015 में बनारस की गुलाबी मीनाकारी को GI टैग मिला, जिसने इसकी अलग पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई। और जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की तत्कालीन उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को गुलाबी मीनाकारी से बना शतरंज का सेट तोहफ़े में दिया, तो इस कला की चमक सात समुंदर पार तक पहुंच गई। आज अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों से लगातार ऑर्डर आ रहे हैं।

एक अनोखा तजुर्बा
अगर आप वाराणसी जाएं, तो सिर्फ़ घाट और मंदिर देखकर न लौटें। लालघाट और गायघाट की गलियों में जाकर उन कारीगरों की वर्कशॉप को देखें, जहां चांदी पर गुलाबी रंग भरा जाता है। कई जगह तो पर्यटकों के लिए वर्कशॉप भी होती हैं, जहां आप खुद इस कला को आज़मा सकते हैं। झुमके, हार, ब्रेसलेट से लेकर सजावटी बक्से और देवी-देवताओं की मूर्तियों तक, हर चीज़ में इस कला की झलक मिलती है।
बनारस की गुलाबी मीनाकारी सिर्फ़ एक हस्तशिल्प नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की कलात्मक विरासत का वो नगीना है जो हर पीढ़ी में नए रंग बिखेरता है। काशी आएं, तो इस कला को ज़रूर देखें शायद चांदी पर उकेरी गई वो गुलाबी चमक आपके दिल में भी उतर जाए।
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