उर्दू शायरी की तारीख़ में जब भी सूफ़ियाना रंग और रुहानियत की बात होगी, आसी ग़ाज़ीपुरी का नाम बड़े एहतिराम से लिया जाएगा। इनका शुमार उन शायरों में होता है जिन्होंने अपनी शायरी को महज़ लफ़्ज़ों की आराइश नहीं बल्कि इश्क़-ए-हक़ीक़ी यानी ख़ुदा की मोहब्बत का ज़रिया बनाया।
आसी ग़ाज़ीपुरी की पैदाइश 21 दिसंबर 1834 को बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुई। इनका असल नाम मुहम्मद अब्दुल अलीम था और तारीख़ी नाम “ज़हूर उल-हक़” रखा गया। इनका ख़ानदान इल्मी और रुहानी अज़्मत के लिए मशहूर था। इनके वालिद शैख़ क़म्बर हुसैन अपने ज़माने के कामिल बुज़ुर्ग थे और इनका नसब हज़रत उमर फ़ारूक़ तक जाता है।
अफ़सोस की बात यह है कि अभी 10 माह के भी नहीं हुए थे कि वालिदा का इंतक़ाल हो गया। नानी साहिबा ने इस मासूम बच्चे को अपनी गोद में पनाह दी और उसे अपने साथ आरा ले गईं, जहां 11 साल तक इनकी परवरिश और तालीम हुई।
आसी ने शुरुआती तालीम अपने नाना मुफ़्ती एहसान अली से अरबी और फ़ारसी में हासिल की। 12 साल की उम्र में सिकंदरपुर आकर ख़ानक़ाह रशीदिया के सज्जादा नशीन शाह ग़ुलाम मुईनुद्दीन रशीदी से मुरीद हुए, जो इन्हें अपने साथ जौनपुर ले गए। वहां मौलाना अब्दुल हलीम फ़िरंगी महली से फ़िक़्ह और साइंस की तालीम ली। इसके अलावा इन्होंने हकीम सय्यद जाफ़र हुसैन काशिफ़ लखनवी की सोहबत में इल्म-ए-तिब्ब (हिकमत) भी सीखा, हालांकि इसकी कोई बाक़ायदा तालीम नहीं ली थी यह इनकी ज़ाती दिलचस्पी और मेहनत का नतीजा था।
रौशन हुआ ये मुझ पे कि फ़ानूस में है शम्अ
हाथ उस का जल्वागर जो तह-ए-आस्तीं हुआ
शायरी का शौक़ आसी को बचपन ही से था। शुरू में इन्होंने “आसी” तख़ल्लुस से रिवायती अंदाज़ में ग़ज़लें कहनी शुरू कीं। बाद में नासिख़ लखनवी के शागिर्द शाह ग़ुलाम इमाम-ए-आज़म इलाहाबादी से इस्लाह ली। इनकी शायरी में तसव्वुफ़ की गहराई और तग़ज़्ज़ुल की मिठास दोनों का हसीन इम्तिज़ाज मिलता है। कहा जाता है कि मीर दर्द के बाद अगर किसी शायर ने तसव्वुफ़ को शायरी में सबसे कामयाबी से बरता, तो वह आसी ही थे।
इनके कलाम में इश्क़ की पाकीज़गी और सोज़-ओ-गुदाज़ की जो कैफ़ियत मिलती है, उसकी वजह यह थी कि आसी ख़ुद इश्क़-ए-हक़ीक़ी में फ़ना हो चुके थे।
“मेरी आंखें और दीदार आप का
या क़यामत आ गई या ख़्वाब है”
आसी का दीवान “ऐनुल मुआरिफ़” के नाम से शाया हुआ। इनके शागिर्दों में अब्दुल अहद शमशाद लखनवी, हकीम फ़रीदुद्दीन फ़रीद और हकीम सय्यद मुहम्मद शाद ग़ाज़ीपुरी जैसे नाम शामिल हैं।
आसी ग़ाज़ीपुरी ने अपनी पूरी ज़िंदगी ग़ाज़ीपुर में गुज़ारी। 24 फरवरी 1917 को इस रुहानी शायर का इंतक़ाल हो गया और इन्हें महल्ला नूरुद्दीन-पूरा, ग़ाज़ीपुर में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। आज भी इनका आस्ताना अक़ीदतमंदों के लिए फ़ैज़-ओ-बरकत का मरकज़ है।
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