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पंजाबी साहित्य का सुनहरा दौर

भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में पांच नदियों की उपजाऊ ज़मीन पंजाब स्थित है। इसके उत्तर में हिमालय के पहाड़, पश्चिम में सुलेमान की पहाड़ियां, दक्षिण में बड़े-बड़े मैदान और पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। यहां के ख़ूबसूरत कुदरती नज़ारे इस इलाके को भारतीय उपमहाद्वीप में एक ख़ास पहचान देते हैं। दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथों में से एक ऋग्वेद की रचना भी इसी धरती पर हुई थी। वैदिक काल में इस इलाके से सात नदियां बहती थी। इनके नाम सरस्वती, सिंधु, सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम थे। इन सात नदियों की वजह से इस ख़ूबसूरत इलाके को ‘सप्तसिंधु’ कहा जाता था।

मुसलमानों के शासन के दौरान इसका नाम पंजाब पड़ गया। पंजाब का मतलब है पांच नदियों की ज़मीन। इसकी वजह ये थी कि पूर्व की तरफ़ बहने वाली सरस्वती नदी सूखने लगी थी और पश्चिम की तरफ़ सिंधु नदी का इलाका पंजाब से अलग हो चुका था। रामायण और महाभारत में इस इलाके को ‘पंचनद’ कहा गया है। पंजाब शब्द फारसी के दो शब्दों ‘पंज’ और ‘आब’ से मिलकर बना है। इसका मतलब है पांच पानी यानी पांच नदियां।

पंजाब शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अमीर खुसरो ने अपनी एक शोक कविता ‘मर्सिया’ में किया था। पंजाब के इतिहास की शुरुआत आर्य जाति के लोगों से मानी जाती है। उन्होंने इस धरती पर रहने वाले मूल निवासियों ‘दस्यु’ की सभ्यता को ख़त्म कर दिया और उन्हें दक्षिण की तरफ़ जाने पर मजबूर किया। इसके बाद ईरानी, विदेशी कबीले, पार्थियन, कुषाण, हूण, तुर्क, मंगोल, अफ़गान और मुग़ल जैसे कई लोगों ने यहां हमले किए।

Pic Credit: Hamdard Media Group

इनमें से कई लोग हमेशा के लिए यहीं बस गए। इस तरह पंजाब अलग-अलग संस्कृतियों के मेल की धरती बन गया। उस समय यहां राजनीतिक उथल-पुथल, अशांति, आपसी टकराव और कई युद्ध होते रहते थे। इन हालात की वजह से पंजाबी साहित्य को न तो ठीक से लिखा जा सका और न ही संभालकर रखा जा सका।

लगातार होने वाले हमलों और संघर्षों ने पंजाब के लोगों के मिज़ाज को भी बदल दिया। उनके एक हाथ में तलवार होती थी और दूसरे हाथ में हल। पंजाब ने हमेशा भारत की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। इसी वजह से यहां के लोग बहादुर, मेहनती, हिम्मती और मुश्किल हालात का सामना करने वाले बने। पंजाबी साहित्य में इंसानी ज़िंदगी के तजुर्बों, सामाजिक संघर्षों, रूहानियत, प्रेम, विद्रोह, लोक-संस्कृति और इंसानी मूल्यों को जगह मिली है। पंजाब की धरती ने बहादुरी, कुर्बानी, मेहनत, आपसी भाईचारे और लोक-जीवन की कई परंपराओं को जन्म दिया है।

साहित्य के इतिहास में ‘सुनहरा दौर’ उस समय को कहा जाता है, जब साहित्य में लिखने-पढ़ने का काम, नए विचार, कला और समाज पर उसका असर अपनी ऊंचाई पर पहुंचता है।पंजाबी साहित्य के संदर्भ में ये सवाल अहम है कि आख़िर इसका सुनहरा दौर कौन-सा था? इतिहासकारों ने पूरे पंजाबी साहित्य को तीन हिस्सों में बांटा है।आदि काल: 8वीं-9वीं सदी से 12वीं सदी तक। मध्य काल: 12वीं सदी से 18वीं सदी तक, आधुनिक काल: 19वीं सदी के बाद का समय। आदि काल में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक हालात काफी उथल-पुथल भरे थे।

इसलिए इतिहासकार मध्य काल को पंजाबी साहित्य का सुनहरा दौर मानते हैं। इस समय मुग़लों का शासन राजनीतिक तौर पर स्थिर हो चुका था। वहीं, कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी एक नई जागृति देखने को मिली। इस तरह पंजाबी साहित्य के विकास के लिए एक नया दौर शुरू हुआ। मध्यकाल में सूफ़ी और गुरमत काव्य ने पंजाबी साहित्य की सोच और लेखन की बुनियाद को मज़बूत किया। पंजाबी साहित्य के शुरुआती दौर की ज़्यादातर रचनाएं लोगों की जुबानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही। कविता, लोकगीत, पहेलियों और कहानियों ने पंजाबी साहित्य की नींव तैयार की। वहीं, किस्सा-काव्य ने आम लोगों की ज़िंदगी और प्रेम कहानियों को साहित्य में एक ख़ास जगह दी।

12वीं और 13वीं सदी में बाबा फ़रीद पंजाबी सूफ़ी काव्य के मशहूर कवि के तौर पर उभरे। उनके 112 श्लोक और 4 शब्द श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। बाबा फ़रीद की वाणी की सबसे बड़ी ख़ूबी इसकी सादगी और गहरे मायने हैं। उनकी कविताएं इंसान को अपने अंदर झांकने, अहंकार से दूर रहने और ज़िंदगी की सच्चाई को समझने की सीख देती हैं। उनकी वाणी इंसान को उसके नैतिक फर्ज़ भी याद दिलाती है। उनकी भाषा आम लोगों की बोलचाल के करीब थी। यही वजह है कि उन्हें पंजाबी साहित्य के सुनहरे दौर की बुनियाद रखने वाले अहम कवियों में गिना जाता है।

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गुरु नानक देव जी के आगमन से पंजाब की धरती को एक ऐसे महान व्यक्तित्व का साथ मिला, जिन्होंने सदियों से दबे-कुचले लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने का हौसला दिया। उनके संदेश से कमज़ोर और मज़लूम लोगों में नया जोश और समझ पैदा हुई। उन्होंने लोगों को धर्म, भाषा, लिपि, आत्मसम्मान और अपने हक़ के साथ जीने का रास्ता दिखाया। उनके विचारों ने लोगों की सोच और शख़्सियत को एक नई दिशा दी। साथ ही, पंजाबियों के मन में सदियों की गुलामी से बाहर निकलने की चाह भी पैदा की।

गुरु नानक देव जी ने जपुजी साहिब, सिद्ध गोष्ठि, पट्टी, बारहमाह, थिती, सो दर, अलाहणियां, आरती, चौपदे, अष्टपदियां और श्लोक जैसी कई रचनाएं की। इसके अलावा उन्होंने राग आसा, राग माझ और राग मल्हार में तीन वारों की रचना भी की। अपनी वाणी के ज़रिए उन्होंने इंसानियत, सच्चाई, बराबरी, मेहनत और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का संदेश दिया। उन्होंने धर्म के नाम पर होने वाले दिखावे, अंधविश्वास, पाखंड और इंसानों के बीच भेदभाव पर सवाल उठाए। गुरु नानक देव जी के लिए सच्चाई सिर्फ़ एक विचार नहीं, बल्कि ऐसी चीज़ थी जिसे इंसान को अपनी ज़िंदगी में अपनाना चाहिए।

उनकी वाणी की एक बड़ी खूबी इसमें रागों का इस्तेमाल है। उन्होंने 19 रागों में अपनी वाणी की रचना की। इसके अलावा उन्होंने प्रकृति का खूबसूरत चित्रण किया और उपमा, रूपक, उदाहरण, अतिशयोक्ति और अनुप्रास जैसे काव्य तरीकों का इस्तेमाल करके अपनी रचनाओं को और असरदार बनाया। गुरु नानक देव जी ने आम लोगों की भाषा में अपना संदेश दिया। उनकी वाणी की मुख्य भाषा पंजाबी थी, लेकिन इसमें फारसी और साध भाषा का असर भी साफ दिखाई देता है।

गुरु अंगद देव जी ने 63 श्लोकों की रचना की। उनकी वाणी में विनम्रता, गुरु की महिमा, गुरु के प्रति श्रद्धा और प्रेम जैसे विषय प्रमुख हैं। उन्होंने गुरुमुखी लिपि को एक व्यवस्थित रूप दिया और इसके पढ़ने-लिखने को बढ़ावा देने के लिए ख़ास कोशिशें की। गुरुमुखी लिपि के प्रचार से पंजाबी भाषा में धार्मिक वाणी, ऐतिहासिक लेख और दूसरी साहित्यिक रचनाओं को संभालकर रखना और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आसान हुआ।

गुरमत काव्य की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दूसरे गुरु साहिबान ने भी अपनी वाणी में रूहानियत, सेवा, प्रेम, विनम्रता और आपसी भाईचारे जैसे विषयों को जगह दी। गुरु अमरदास जी ने आनंद साहिब, पट्टी, अलाहणियां और वारों के अलावा चौपदे, अष्टपदियां और श्लोक भी लिखे। उनकी पूरी वाणी 18 रागों में है। उन्होंने जात-पात और सती प्रथा का विरोध किया और लोगों को सेवा का रास्ता दिखाया। वहीं, गुरु रामदास जी ने 30 रागों में वाणी की रचना की। उन्होंने चौपदे, अष्टपदियां, श्लोक और करहले के अलावा आठ बारहमाह भी लिखे। उनकी वाणी में भी गुरु नानक देव जी के विचारों की झलक दिखाई देती है।

उन्होंने अपनी रचनाओं में परमात्मा की सर्वोच्चता के बारे में बताया। उनके विचारों के अनुसार गुरु अर्जन देव जी ने सभी गुरु साहिबान में सबसे ज़्यादा वाणी की रचना की। उन्होंने 30 रागों में सुखमनी साहिब, बावन अखरी, बारहमाह, थिती और ऋतुओं से जुड़ी वाणी की रचना की। सुखमनी साहिब उनकी सबसे ख़ास रचनाओं में से एक है। वहीं, बारहमाह भी उनकी एक अहम रचना है, जिसका धार्मिक और संस्थागत, दोनों ही लिहाज़ से विशेष महत्व है।

उनकी पूरी वाणी साहित्यिक और कलात्मक खूबियों से भरपूर है। गुरु अर्जन देव जी ने 1604 ईस्वी में आदि ग्रंथ का संकलन करवाया। इसमें सिख गुरु साहिबान की वाणी के साथ-साथ भगतों और भट्टों की रचनाओं को भी शामिल किया गया। इस ग्रंथ में अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों के शब्द देखने को मिलते हैं।

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श्री गुरु ग्रंथ साहिब मध्यकालीन निर्गुण काव्य का एक बड़ा खज़ाना है। इसे मध्यकालीन उत्तर भारत की साहित्यिक और भाषाई विरासत को समझने के एक अहम स्रोत के तौर पर भी देखा जाता है। सिख सिद्धांतों की शुरुआती व्याख्या करने वालों में भाई गुरदास जी का नाम भी शामिल है। उनकी वारों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी को समझने की कुंजी कहा जाता है। उन्होंने पंजाबी भाषा में 39 वारों की रचना की और ब्रज भाषा में 600 से ज्यादा कवित्त और सवैये लिखे। उनकी वारों में गुरु इतिहास, सिख इतिहास और गुरमत के अलग-अलग सिद्धांतों को समझाया गया है।

श्री गुरु तेग बहादुर जी ने 59 शब्द और 57 श्लोक लिखे। उनकी पूरी वाणी में दुनिया की नश्वरता, जीवन की अस्थिरता और मोह-माया से दूर रहने जैसे विषय देखने को मिलते हैं।
उन्होंने दुनिया की नश्वरता को समझाने के लिए बादल की छाया, रेत की दीवार और पानी के बुलबुले जैसे उदाहरणों का इस्तेमाल किया। उनकी वाणी में इस्तेमाल किए गए प्रतीक और अलंकार काफी अलग और असरदार हैं। उनकी काव्य भाषा पंजाबी और ब्रज भाषा के करीब है।

वहीं, गुरु गोबिंद सिंह जी ने जाप साहिब, अकाल उस्तति, बचित्र नाटक, चंडी दी वार और ज़फरनामा जैसी रचनाएं लिखकर पंजाबी साहित्य को और विस्तार दिया। पंजाबी साहित्य को आगे बढ़ाने और उसकी रचनाओं को संभालकर रखने के लिए उन्होंने अपने दरबार में 52 मशहूर कवियों को जगह दी। उनके समय में श्री आनंदपुर साहिब साहित्य रचना के एक अहम केंद्र के तौर पर उभरा। उन्होंने पंजाबी भाषा में चंडी दी वार और फारसी भाषा में ज़फरनामा लिखा।

पंजाबी साहित्य की सुनहरी विरासत का दूसरा अहम हिस्सा सूफ़ी काव्य है। सूफ़ी कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रेम, जुदाई, रूहानियत, खुद की पहचान और समाज में फैले पाखंड जैसे विषयों को जगह दी। शाह हुसैन (1538–1599), सुल्तान बाहू (1630–1691) और बुल्ले शाह (1680–1757) पंजाबी सूफ़ी काव्य के मशहूर नाम हैं। बुल्ले शाह की कविताओं में पुरानी और रूढ़िवादी सोच, धर्म के नाम पर होने वाले दिखावे और इंसानों के बीच भेदभाव पर सवाल उठाए गए हैं।

उनकी भाषा आम लोगों की बोलचाल के काफी करीब थी। सूफ़ी काव्य की सबसे बड़ी ख़ीसियत ये रही कि इसने पंजाबी साहित्य को आम लोगों की ज़िंदगी और उनके जज़्बात से जोड़ा। इसके ज़रिए इंसानी अनुभवों के ऐसे पहलुओं को सामने लाया गया, जिनकी अहमियत आज भी बनी हुई है।

मध्यकालीन पंजाबी साहित्य के विकास में किस्सा-काव्य की भी अहम भूमिका रही। किस्सा एक ऐसा काव्य रूप है, जिसमें प्रेम कहानियों, सामाजिक टकराव, पारिवारिक रिश्तों, रीति-रिवाजों और इंसानी जज़्बातों को कविता के ज़रिए पेश किया जाता है। पंजाबी किस्सा-काव्य की परंपरा में पीलू, हाशम शाह और वारिस शाह जैसे मशहूर किस्साकारों का नाम लिया जाता है। हीर-रांझा, सस्सी-पुन्नू और सोहनी-महिवाल जैसी प्रेम कहानियां पंजाबी लोक-जीवन का अहम हिस्सा हैं। इनमें वारिस शाह की ‘हीर’ पंजाबी किस्सा-काव्य की सबसे मशहूर रचनाओं में से एक है।

वारिस शाह की ‘हीर’ सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि इसके ज़रिए उस दौर के पंजाब के सामाजिक जीवन, पारिवारिक रिश्तों, जाति और औरत-मर्द से जुड़ी सोच, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक नियमों को भी समझा जा सकता है। किस्सा-काव्य को पंजाबी साहित्य की सुनहरी विरासत का हिस्सा मानने की एक बड़ी वजह ये है कि इसने आम लोगों की कहानियों को बेहतरीन काव्य कला के साथ पेश किया। इसकी ख़ास खूबियों में बातचीत का अंदाज़, व्यंग्य, मुहावरेदार भाषा, गांव की ज़िंदगी का चित्रण और इंसानी स्वभाव की गहरी समझ शामिल हैं।

पंजाबी साहित्य की अमीर विरासत में लोक साहित्य का भी ख़ास स्थान है। लोकगीत, बोलियां, टप्पे, माहिया, सुहाग, घोड़ियां, वार, लोककथाएं और पहेलियां इसके प्रमुख रूप हैं।
लोक साहित्य बोलचाल और मौखिक परंपरा के ज़रिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा। इसमें शादी-ब्याह, खेती-किसानी, मौसम, जुदाई, मेहनत, त्योहारों और पारिवारिक ज़िंदगी की झलक देखने को मिलती है। लोक साहित्य ने आम लोगों के तजुर्बों और उनकी ज़िंदगी को साहित्य में एक ख़ास जगह दी।

इस तरह पंजाबी साहित्य का सुनहरा दौर यानी मध्यकाल एक लगातार चलने वाली रचनात्मक परंपरा का दौर रहा। इस समय के साहित्य ने इंसानी ज़िंदगी की मुश्किलों को समझने, समाज में फैले अन्याय पर सवाल उठाने और भाषा व संस्कृति की विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम किया। ये वो दौर था जब साहित्य समाज का आईना बनकर सामने आया।

इसने लोगों में सोचने-समझने की ताकत और अपने हक़ के प्रति जागरूकता पैदा की। आगे चलकर यही जागरूकता समाज में बदलाव लाने का एक ज़रिया बनी। इस दौर के साहित्य की बेहतरीन रचनाएं, अलग-अलग विषय, व्यापक सोच, मज़बूत लेखन शैली, साहित्यिक जागरूकता और पुरानी रचनाओं को संभालकर रखने की परंपरा जैसी खूबियों की वजह से मध्यकाल को पंजाबी साहित्य का सुनहरा दौर कहा जाता है।

लेख: एस सुखविंदर सिंह

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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