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नानक नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत दा भला

दुनिया के अलग-अलग धर्मों में कई ऐसी ख़ास बातें हैं, जो उन्हें एक-दूसरे से अलग पहचान देती हैं। हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म की अपनी-अपनी खूबियां हैं। इसी तरह सिख धर्म की भी कुछ ऐसी ख़ास बातें हैं, जो उसे बाकी धर्मों से अलग पहचान देती हैं। सिख धर्म की शुरुआत गुरु नानक देव जी की उदासियों यानी धार्मिक यात्राओं के दौरान हुई। गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं के दौरान लोगों को जो शिक्षाएं दी, धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें अपनाना शुरू कर दिया।

जब बड़ी तादाद में लोग उनकी बताई राह पर चलने लगे और सच का रास्ता तलाशने लगे, तो सिख धर्म की पहचान बनने लगी। सिख गुरुओं ने सिखों के जीवन के लिए कई मर्यादाएं तय की। इनमें से एक अहम मर्यादा है कि हर सिख रोज़ाना परमात्मा के सामने अरदास करे। सिख अरदास के आख़िर में परमात्मा से चार ख़ास बरकतें मांगते हैं।

नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे और सरबत दा भला

इसका मतलब है कि इंसान हमेशा परमात्मा का नाम याद रखे, ज़िंदगी में हौसला और उम्मीद बनाए रखे, परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहे और पूरी दुनिया की भलाई की दुआ करे।
सरबत दा भला का मतलब है पूरी कायनात की भलाई। यानी सिर्फ़ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि हर जीव, पशु-पक्षी और दुनिया की हर चीज़ की सलामती और भलाई की दुआ करना। इस सोच को सिख धर्म की एक अहम पहचान माना जाता है।

सिख गुरुओं की दी गई ये शिक्षाएं गुरु काल में और उसके बाद भी पंजाबियों के लिए बड़ी ताकत बनी। गुरु काल में अरदास के ज़रिए पूरी इंसानियत की भलाई मांगी जाती थी। लोगों को सही रास्ते पर चलने और बेहतर ज़िंदगी जीने की सीख मिलती थी।

बाद के दौर में जब सिखों पर अलग-अलग हमलावरों और हुकूमतों ने जुल्म किए, तब भी ‘चढ़दी कला’ और ‘सरबत दा भला’ के ये शब्द उन्हें हौसला देते रहे। गुरु गोबिंद सिंह जी के ज्योति-जोत समाने के बाद बंदा सिंह बहादुर ने भी सिखों को इसी हौसले के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वो पहले माधोदास के नाम से जाने जाते थे। बाद में गुरु के बंदे बने और मुग़लों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ने के लिए महाराष्ट्र से पंजाब आए।

Pic Credit: Social Media

बंदा सिंह बहादुर के बाद भी कई सिखों को धर्म और अपने उसूलों के लिए बड़ी कुर्बानियां देनी पड़ीं। किसी के शरीर के टुकड़े किए गए, तो किसी की खोपड़ी उतार दी गई। लेकिन इन मुश्किल हालात में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मौत सामने होने के बावजूद वो चढ़दी कला और सरबत दा भला की अरदास करते रहे और अपनी कौम के लिए जान कुर्बान कर दी।
महाराजा रणजीत सिंह ने भी खुद को गुरु नानक देव जी और गुरु गोबिंद सिंह जी का सेवक माना।

उनके शासन में नानकशाही और गोबिंदशाही सिक्के चलाए गए। उन्होंने पंजाब और पंजाबियों को हमेशा चढ़दी कला में रहने की प्रेरणा दी। उनके जीवित रहते अंग्रेज़ों की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनके सिख साम्राज्य को चुनौती देने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। सिख कौम के हौसले और अपनी हिफाज़त के लिए लड़ने के जज़्बे को इसकी एक वजह माना जाता है। महाराजा रणजीत सिंह के बाद भी सिखों को कई मुश्किल दौर से गुज़रना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना हौसला बनाए रखा।

Pic Credit: Nukkad Tales

उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे होने की वजह से पंजाब ने इतिहास में कई हमले और मुश्किलें झेली हैं। सिकंदर के हमले से लेकर अहमद शाह अब्दाली के हमलों तक पंजाब ने बाहरी हमलावरों का सामना किया। जब सिकंदर ने भारत पर हमला किया, तब झेलम नदी के किनारे पंजाब के राजा पोरस ने उसे रोकने की कोशिश की थी। कुछ लोग उन्हें राजा पोरू के नाम से भी जानते हैं। उस समय सिख धर्म की शुरुआत नहीं हुई थी, लेकिन पंजाबियों ने अपनी ज़मीन की हिफाज़त के लिए मुकाबला किया था।

ऐसी ऐतिहासिक मिसालों और गुरुओं की शिक्षाओं से प्रेरित होकर पंजाब ने देश की आज़ादी की लड़ाई में भी बड़ा योगदान दिया। इस लड़ाई में पंजाब का योगदान बंगाल और महाराष्ट्र के साथ अहम माना जाता है। कई पंजाबी देशभक्तों ने देश की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, जबकि कई लोगों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ने के बाद आज़ाद भारत में ज़िंदगी भी बिताई।

Pic Credit: Sikh Coins

धीरे-धीरे ‘चढ़दी कला’ और ‘सरबत दा भला’ की सोच पंजाब से निकलकर दूसरे देशों तक भी पहुंचने लगी। विदेशी लोगों ने भी इन शब्दों का मतलब समझा और सिख कौम की इस सोच से प्रभावित हुए। कई विदेशी लोग पगड़ी सजाने लगे और नानक नाम, चढ़दी कला और सरबत दा भला की अरदास को अपनाने लगे। विदेशों में भी सरबत दा भला के नाम से कई ट्रस्ट और संस्थाएं बनाई गईं।

आज भी इस सोच पर चलते हुए कई लोग इंसानियत की भलाई के लिए काम कर रहे हैं। पंजाब के मशहूर सिख परिवार से ताल्लुक रखने वाले एस.पी. सिंह ओबरॉय भी ‘सरबत दा भला’ नाम से एक ट्रस्ट चलाते हैं। ये ट्रस्ट ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए कई काम करता है। इसी तरह ‘चढ़दी कला’ नाम से पंजाब में कई अख़बार भी मशहूर हैं। चढ़दी कला टाइम टीवी के नाम से एक टीवी चैनल भी काम कर रहा है।

Pic Credit: Social Media

कुछ साल पहले जब पंजाब के किसानों ने आंदोलन शुरू किया, तो बड़ी तादाद में किसान दिल्ली पहुंचे। पंजाब के अलग-अलग जिलों से लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे और लंबे समय तक धरना दिया। आखिरकार किसानों को कामयाबी मिली। इस जीत के बाद कई पंजाबी नौजवानों ने इसका श्रेय गुरु नानक देव जी की इसी सीख को दिया:
नानक नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत दा भला।

लेख: प्रो. रविंद्र सिंह

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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