दक्षिण भारत की धरती कर्नाटक संगीत के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां के लोगों के दिलों में संगीत ऐसे बसता है, जैसे मंदिर में दीपक की लौ। स्वर, श्रुति, राग और ताल का जो पैमाना यहां के संगीत में है, वो सुनने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता है और आंध्र प्रदेश के बोब्बिली शहर में मिलती है एक ऐसी अनमोल चीज़, जिसका नाम है बोब्बिली वीणा। संगीत की दुनिया में ये एक ऐसा साज़ है जो सुरों का दरबार सजाता है। ये वही वीणा है, जिसे मां सरस्वती—विद्या और ज्ञान की देवी का साज़ कहा जाता है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अनोखी विरासत
बोब्बिली वीणा की गूंज सदियों से संगीत के रसिकों के दिलों को छूती आ रही है। ये सिर्फ़ एक साज़ नहीं, बल्कि आंध्र प्रदेश की संस्कृति, इतिहास और धर्म का एक अहम हिस्सा है। इसकी जड़ें 16वीं सदी तक जाती हैं, जब बोब्बिली समस्तानम का राज था। कहा जाता है कि आज के कारीगरों के पुरखे 1757 में विजयनगरम से आकर बोब्बिली में बस गए। पहले यहां वीणा नहीं बनती थी, बल्कि राजा इसे बाहर से मंगवाते थे। बाद में जब यहां बनने लगी, तो सिर्फ़ राजाओं के मनोरंजन के लिए ही बजाई जाती थी।
भारत में वीणा की चार मुख्य किस्में हैं, रुद्र वीणा, सरस्वती वीणा, विचित्र वीणा और चित्रवीणा। बोब्बिली में बनने वाली सरस्वती वीणा ही बोब्बिली वीणा कहलाती है।

कारीगरी की मिसाल
बोब्बिली वीणा (Bobbili Veena) हाथ से बनाई जाती है। अक्सर कटहल की लकड़ी के एक ही टुकड़े से। इसमें बारीक नक्काशी और अट्रेक्टिव डिज़ाइन की जाती है। सही लकड़ी चुनने से लेकर आख़िरी रंग-रोगन तक, ये काम बेहद मेहनत का है। लेकिन नतीजा होता है एक लाजवाब कलात्मक और संगीतमय शाहकार।

इसकी बनावट बेमिसाल है। चमकदार लकड़ी को एक ही लट्ठे से एकंडी के रूप में बनाया जाता है, या फिर कमलम, नेमली या स्वर्ण मंडल के आकार में तराशा जाता है। इसका मेन गोल हिस्सा यानी कुंडा फूलों की नक्काशी से सजा होता है। दंडी यानी फ्रेट बोर्ड पर 24 पीतल के फ्रेट मोम और कोयले में जड़े होते हैं। नीचे की तरफ़ खोखले कद्दू से बना तुंबा लगा होता है। दंडी का आख़िरी हिस्सा शेर, मोर या कमल की नक्काशी में ढलता है। इसे ‘याली’ कहते हैं। आजकल कारीगर छोटी वीणाएं भी बनाते हैं, जो सजावट या तोहफ़े के तौर पर इस्तेमाल होती हैं।

सुरों का जादू
बोब्बिली वीणा की सबसे ख़ास बात है इसकी मधुर गूंज। ये साज़ नरम लेकिन दिलकश आवाज़ पैदा करता है, जिससे कलाकार अपनी काबिलियत दिखाते हैं और श्रोताओं को सम्मोहित कर देते हैं। कर्नाटक संगीत के हर उस्ताद और रसिक के लिए यह वीणा इज़्ज़त की चीज़ है।
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